ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच क्या किसानों की आय बढ़ा सकता है हाइब्रिड मॉडल?

भारतीय किसानों के लिए निष्पक्ष दाम की खोज: क्या फ्रांस का मॉडल भारत में कारगर होगा?

भारत अमेरिका ट्रेड डील के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कड़ी चुनौती है। उसे न केवल एक आर्थिक महाशक्ति के लिए बिना किसी आयात शुल्क (इम्पोर्ट टैरिफ) के दरवाजे खोलने हैं बल्कि अमेरिका यह भी तय कर रहा है कि भारत की एनर्ज़ी (तेल और गैस) का आयात कहां से होगा। यह हमारी अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी चोट है विशेषकर कृषि क्षेत्र में।

यह ध्यान देने की बात है कि भारत के बाजार को अमेरिकी माल से पाट देने का लक्ष्य साधे डोनाल्ड ट्रम्प का नारा अपने देश में बी अमेरिकन, बाइ अमेरिकन (अमेरिकी बनो और अमेरिका निर्मित खरीदो) है। यानी एक ओर भारत के बाजार पर कब्ज़ा और दूसरी ओर अपने घरेलू बाज़ार में अमेरिकी उत्पाद को बढ़ावा। ऐसे में भारत की सरकार और ग्राहकों को अपने घरेलू निर्माताओं और विशेषकर कृषकों का ध्यान रखना होगा।

अब सवाल यह है कि किसान की मेहनत का सही दाम देने में क्या कठिनाइयां हैं और उसका समाधान क्या हो सकता है। खासकर ऐसे वक्त में जब जलवायु परिवर्तन जनित संकट उसके लिए कृषि को और अधिक दुश्वार बना रहा है और उसके लिए खर्च और आय का फासला बढ़ता जा रहा है। इसे बताने से पहले फ्रांस की एक नजीर देखना जरूरी है।

वर्ष 2010 के बाद फ्रांस के दुग्ध उत्पादकों का घाटा लगातार बढ़ रहा था और उनमें से कई यह काम छोड़ रहे थे। विक्रेता कंपनियों द्वारा ग्राहक को सस्ता दूध मुहैया कराने की प्रतिस्पर्धा ने उनके लिए इसे मुनाफे लायक न छोड़ा। ऐसे में निकोलस शाबे नाम के एक व्यक्ति ने यह हिसाब लगाया कि फ्रांस में एक व्यक्ति कितना दूध प्रयोग करता है और अगर किसान को सही दाम मिले तो प्रति उपभोक्ता सालाना कितना खर्च बढ़ेगा।

शाबे की गणना में हर उपभोक्ता को साल में सिर्फ 4 यूरो (करीब 400 रुपये) अधिक खर्च करने से किसान बच सकता था और उसे उत्पाद की बेहतर क्वॉलिटी मिल सकती थी। शाबे द्वारा 2016 में शुरु किया गया सीक्यूएलपी मूवमेंट ( यानी बॉस कौन है?) आज शाबे का ब्रांड ‘CQLP’ दूध ही नहीं कई उत्पादों को अपनी लिस्ट में जोड़ चुका है।

यानी उपभोक्ता की जेब से पैसा किसान तक पहुंचाने का सपना फ्रांस में हकीकत बन चुका है। यह आंदोलन उपभोक्ताओं को ‘मालिक’ बनाता है, जो किसानों को बाजार की मार से बचाने के लिए खुद दाम तय करते हैं। भारत के संदर्भ में यह कोई नई बात नहीं है जहां सहकारी समितियों ने किसानों को सही दाम दिलाने में अहम रोल अदा किया है। सवाल यह है कि अमूल जैसे सहकारी मॉडल के साथ शाबे के प्रयोग का मिश्रण क्या भारत में किसानों की आय को सम्मानजनक बना सकता है?

यूरोपीय संघ का सब्सिडी तंत्र: किसानों का मजबूत कवच

चीज़ों के सही संदर्भ में देखने के लिए यह ज़रूरी है कि यूरोपीय संघ का सब्सिडी तंत्र फ्रांस में किसानों का मजबूत कवच बनता है। यूरोपीय संघ की कॉमन एग्रीकल्चरल पॉलिसी (सीएपी) के तहत फ्रांस के किसानों को सालाना 90 अरब रुपए से ज्यादा की सीधी आय सहायता मिलती है।

छोटे-मध्यम किसानों के लिए यह रकम उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा है — खासकर पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास के नाम पर। लेकिन सीक्यूएलपी इस सब्सिडी के ऊपर चढ़ता है। 2016 में दूध संकट के बीच शुरू हुआ शाबे का यह मॉडल उपभोक्ताओं से स्वैच्छिक अधिक कीमत वसूलता है — जैसे दूध के लिए बाजार से 25% ज्यादा (€0.54 प्रति लीटर)।

यह क्यों खास है? क्योंकि यह बाजार की खामियों को ठीक करता है। सीएपी कृषि और डेयरी को स्थिरता देता है, तो सीक्यूएलपी मूल्य श्रृंखला में संतुलन लाता है। 1.5 करोड़ उपभोक्ता वोट देकर तय करते हैं कि किसान को लागत और परिवार का गुजारा वेतन मिले।

परिणाम? किसान बाजार पर निर्भर नहीं, उपभोक्ता उनका ‘बॉस’ बन जाता है! लेकिन भारत में उपभोक्ता या तो धनवान नहीं है या फिर बहुत प्राइस सेंसटिव है। ऐसे में अमूल मॉडल हमें सहकारिता की स्वदेशी ताकत याद दिलाता है।

घरेलू नुस्खा: सहकारिता की स्वदेशी ताकत

भारत में सीधी सब्सिडी कम है लेकिन एमएसपी (केवल 23 फसलों पर) और सहकारी आंदोलन मजबूत किया जा सकता है। अमूल इसका बेहतरीन उदाहरण है — 1940 के दशक में गुजरात से शुरू आंदोलन आज 36 लाख किसानों का सामूहिक साम्राज्य बन चुका है। एनडीडीबी के ऑपरेशन फ्लड ने देश में दूध उत्पादन को दोगुना किया, बिचौलियों को हटाया, ब्रांडिंग से मूल्य बढ़ाया।

यहां फर्क साफ है यूरोप में पब्लिक सब्सिडी और मार्केट रिफोर्म ने असर दिखाया है लेकिन भारत में सामूहिक मालिकाना हक और बड़े बाजार की शक्ति यह कर सकती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन की अतिरिक्त मार झेल रहे छोटे जोत किसानों (90% किसान 2 हेक्टेयर से कम) को महंगाई के दौर में यह रास्ता बिना सरकार की इच्छाशक्ति के नहीं हो सकता।

भारत की चुनौतियां: गरीबी और डिजिटल खाई का आईना

फ्रांस की समृद्धि (प्रति व्यक्ति $45,000) से अलग, भारत में 60% लोग सालाना 2.5 लाख रुपए से कम कमाते हैं। भोजन महंगाई (फूड इंफ्लेशन 6-8% है, ग्रामीण गरीबी 25%। डिजिटल डिवाइड कई राज्यों में गंभीर है — ग्रामीण इंटरनेट केवल 40%।

बिचौलिए शोषक हैं, लेकिन वे कई बार ऋण और बाजार भी देते हैं इसलिए उनका प्रभाव बना रहता है। जाति, क्षेत्रवाद और सहकारी घोटालों का भय समस्या का ऐसा पहलू है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भी आज 90 करोड़ इंटरनेट यूजर और यूपीआई जैसे हथियार अवसर का आकाश भी खोल रहे हैं।

आगे का रास्ता: सीक्यूएलपी-अमूल हाइब्रिड से क्रांति

सवाल है कि क्या भारत चरणबद्ध हाइब्रिड मॉडल अपना सकता है। जैसे कि एक डिजिटल पायलट लाकर जिसमें एनडीडीबी-अमूल ऐप पर ‘फेयर प्राइस’ लेबल हो। गुजरात-महाराष्ट्र से शुरू, दूध-फल-सब्जी पर 5-15% प्रीमियम। क्यूआर कोड से ट्रेसिबिलिटी, ब्लॉकचेन (एक डिजिटल सार्वजनिक रजिस्टर) से पारदर्शिता।

नीतिगत सहारे में कृषि उपज मंडी समिति यानी एपीएमसी कानून में बदलाव, पीएम-किसान से शुरुआती फंड और डिलीवरी एप्स के ज़रिए शहरी क्षेत्र में विस्तार।

उपभोक्ता जागरूकता: यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया पर किसानों की कहानियां — ‘कोई किसान भूखा नहीं, कोई उपभोक्ता पछताएगा नहीं’। एफएसएसएआई सर्टिफिकेशन से भरोसा।

इसके अलावा जोखिम नियंत्रण के लिए मुद्रास्फीति-आधारित कैप, बेसिक vs फेयर टियर। फेयरट्रेड से निर्यात। यह मॉडल छोटे किसानों की आय ₹50,000-1 लाख सालाना बढ़ा सकता है, 2030 तक 1 करोड़ तक फैल सकता है। इसे जलवायु संकट से लड़ने में भी मदद मिलेगी।

लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर उपभोक्ता 10-20% ज्यादा भुगतान क्यों करे? इसका जवाब गुणवत्ता और विश्वास से दिया जा सकता है जहां बाजार दूध में मिलावट से त्रस्त उपभोक्ता को ट्रेसिबल, एंटीबायोटिक-मुक्त उत्पाद मिलेंगे। जैविक फल-सब्जियाँ कैंसर-रोगों से बचाव कर स्वास्थ्य लाभ का भरोसा देंगी और यह गर्व कि ‘मैंने किसान को मजबूत बनाया’। सरकार इसके लिए जीएसटी में 5% जीएसटी छूट और यूपीआई कैशबैक जैसे प्रोत्साहन दे सकती है।

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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