जलवायु संकट की मार: विश्व के सबसे महंगे आपदाओं की सच्चाई, भारत-पाक रिपोर्ट में दिखा स्थानीय विनाश

वर्ष 2025 जलवायु आपदाओं के हिसाब से इतिहास का एक सबसे महंगा और विनाशकारी साल बन गया है। वर्ष भर में तेज हवाएं, दुर्लभ साइक्लोन, बाढ़ और भीषण जंगल की आग जैसी घटनाओं ने विश्व स्तर पर नुकसान को 120 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंचा दिया, और यह आंकड़ा केवल बीमे का तहत कवर हानि है — वास्तविक लागत कहीं अधिक मानी जा रही है।

क्रिस्चियन एड की नई वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण-पूर्व एशिया में साइक्लोन और बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ली और अरबों डॉलर का नुकसान किया, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलिफोर्निया की जंगल आग से सैकड़ों की मौत और भारी आर्थिक तबाही हुई। चीन में बाढ़ से हजारों विस्थापित हुए और अरबों डॉलर का नुकसान हुआ।

रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि प्रदूषण और जीवाश्म ईंधन का उपयोग लगातार आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ा रहा है, और विकसित देशों के बजाय विकासशील देशों पर इसके विनाशकारी सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़े हैं। दुनिया भर में लाखों लोग घरों, रोजगार और भविष्य खो चुके हैं, जिन्हें बीमा कवरेज में भी नहीं गिना जाता।

वैश्विक नेताओं ने कॉप30 में अनुकूलन निधियों को बढ़ाने पर सहमति जताई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है और वैश्विक स्तर पर स्थायी कार्बन उत्सर्जन में कटौती और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता समाप्त करने के कदम जरूरी हैं। इस रिपोर्ट को भारत-पाकिस्तान के नजरिए से देखा जाये तो हिमालय और मानसून बेल्ट में वर्ष 2025 की बाढ़ और प्रतिकूल मौसम की स्थिति ने इस क्षेत्र को सबसे अधिक प्रभावित किया है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापक मानसून बाढ़ और भारी बारिश की घटनाओं ने संयुक्त रूप से लगभग 5 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान किया, और इन घटनाओं में 1,800 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई। यह दक्षिण एशियाई मानसून की बदलती चरित्र का सीधा परिणाम है, जिसने पारंपरिक कृषि अवधि और जल संसाधनों को बंटाधार कर दिया। इन जलवायु आपदाओं ने स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे को तहस-नहस किया, हजारों लोगों को विस्थापित किया और सरकारी तथा समुदाय स्तर पर पुनर्निर्माण की लागत को भारी बोझ बना दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर तत्काल नियंत्रण और अनुकूलन रणनीतियां नहीं अपनाई गईं, तो इसी तरह की घटनाएं आने वाले वर्षों में और अधिक विनाशकारी होंगी।

लातूर की झीलों में दिखे दुर्लभ प्रवासी पक्षी, मराठवाड़ा में इको-टूरिज़्म को नई उड़ान

लातूर ज़िले की रेनापुर तहसील स्थित पांगांव और कमखेड़ा झीलों में इन दिनों दुर्लभ प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल पहली बार यहां 60 से अधिक बार-हेडेड गीज़ और छह कॉमन क्रेन दर्ज किए गए हैं। बार-हेडेड गीज़ मंगोलिया-रूस सीमा से हिमालय पार कर आती हैं, जबकि कॉमन क्रेन अफगानिस्तान और यूरोप से लंबी उड़ान भरकर भारत पहुंचती हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि ये पक्षी हर साल सर्दियों में मध्य एशिया और साइबेरिया से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर भारत के मीठे पानी वाले झीलों में विश्राम और भोजन के लिए आते हैं। बार-हेडेड गीज़ अपनी ऊँचाई पर उड़ान की क्षमता के लिए जानी जाती है, जबकि कॉमन क्रेन इस क्षेत्र में दुर्लभ शीतकालीन अतिथि मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों में जल उपलब्धता में सुधार, पर्याप्त भोजन और मानव गतिविधियों में कमी से इन पक्षियों के लिए अनुकूल माहौल बना है।

यह दृश्य न केवल स्थानीय पर्यावरण के लिए उत्साहजनक है बल्कि मराठवाड़ा को प्रवासी पक्षी पर्यटन के नए केंद्र के रूप में उभरने का संकेत भी देता है। प्राणीशास्त्र विभाग के विशेषज्ञों ने बताया कि यह घटना स्थानीय जलाशयों की सेहत और पारिस्थितिक संतुलन में सुधार का प्रमाण है। साथ ही, झीलों में रड्डी शेलडक (चक्रवाक), नॉर्दर्न शोवलर, नॉर्दर्न पिंटेल और टफ्टेड डक जैसी अन्य प्रवासी प्रजातियों की उपस्थिति ने इस क्षेत्र की जैव-विविधता की समृद्धि को और बढ़ा दिया है।

लोणार झील का बढ़ता जलस्तर निगल रहा है प्राचीन मंदिर, आईआईटी बॉम्बे करेगा रहस्य की जांच

महाराष्ट्र की विश्वप्रसिद्ध लोणार झील में जलस्तर में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने यहां कई प्राचीन मंदिरों को पानी में डुबो दिया है, जिससे संरक्षण और वैज्ञानिक समुदाय में चिंता गहराती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से जारी यह असामान्य घटना अब गंभीर रूप ले चुकी है, जिसके बाद प्रशासन ने आईआईटी बॉम्बे के विशेषज्ञों को कारणों की जांच के लिए जोड़ा है।

करीब 50,000 वर्ष पहले उल्का पिंड के टकराने से बनी यह झील बुलढाणा ज़िले में स्थित है और इसे रामसर साइट यानी अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि घोषित किया गया है। खारे और क्षारीय जल की यह झील अपने अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जानी जाती है, लेकिन अब यही तंत्र संकट में है। झील के किनारे स्थित कमलजा देवी मंदिर समेत कई प्राचीन मंदिर अब आंशिक रूप से जलमग्न हो चुके हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारियों के अनुसार, झील के निचले किनारे पर करीब 15 मंदिर हैं, जिनमें से कई खतरे में हैं। गैमुख मंदिर से निकलने वाले प्राकृतिक झरने से लगातार झील में पानी पहुंच रहा है, वहीं हाल के वर्षों में बदलते वर्षा पैटर्न, क्लाउडबर्स्ट और झील के आसपास सक्रिय झरनों ने जलस्तर और बढ़ा दिया है। पुरातत्वविद् अरुण मलिक का कहना है कि आरक्षित वन घोषित होने के बाद झील के आसपास की वनस्पति और मिट्टी में हुए बदलावों से जलधारण क्षमता बढ़ी है, जिससे झील का सूक्ष्म पर्यावरण प्रभावित हुआ है।

जिला कलेक्टर किरण पाटिल ने बताया कि झील में कोई कृत्रिम जल प्रवाह नहीं है और जलस्तर में वृद्धि प्राकृतिक कारणों से हो रही है। आईआईटी बॉम्बे की टीम जल के नमूनों का विश्लेषण कर रही है ताकि रासायनिक और पर्यावरणीय कारणों की पहचान की जा सके।

प्रशासन ने कमलजा मंदिर के चारों ओर सुरक्षात्मक दीवार और प्लेटफॉर्म बनाने की योजना तैयार की है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं — अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह दुर्लभ भूवैज्ञानिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थायी क्षति झेल सकती है।

ग्लेशियर लुप्त होने की दर मध्य-सदी में अपने चरम पर पहुंचेगी, तापमान वृद्धि ने बढ़ाई जलवायु संकट की भयावहता

एक नए वैश्विक अध्ययन ने संकेत दिया है कि दुनिया में ग्लेशियर लुप्त होने की दर इस सदी के मध्य यानी 2041 से 2055 के बीच अपने चरम पर पहुंच जाएगी।

नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित शोध के मुताबिक, अगर वैश्विक तापमान वृद्धि +1.5°C तक सीमित रहती है, तो उस समय लगभग 2,000 ग्लेशियर प्रति वर्ष गायब हो सकते हैं, जबकि यदि तापमान वृद्धि +4.0°C तक बढ़ती है, तो यह संख्या बढ़कर लगभग 4,000 ग्लेशियर प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है, जो यूरोपीय आल्प्स के सभी ग्लेशियरों के समान हो जाता है।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि ग्लेशियर को ‘लुप्त’ तब माना जाता है जब उसका आकार 0.01 वर्ग किमी से कम हो जाए या उसकी मात्रा उसके प्रारंभिक मान का 1 प्रतिशत से भी नीचे गिर जाए। इस शोध के अनुसार दुनिया भर में अब लगभग 2,10,000 ग्लेशियर मौजूद हैं और इनमें से एक तिहाई ग्लेशियर हाई-माउंटेन एशिया में स्थित हैं। यह क्षेत्र मध्य-सदी में ग्लेशियर लुप्त होने की वैश्विक तेज़ी का प्रमुख योगदान देता है।

क्षेत्रों में अंतर इस बात के कारण है कि कुछ जगह छोटे और तेजी से प्रतिक्रिया देने वाले ग्लेशियर पहले ही बड़े पैमाने पर गायब हो रहे हैं, जबकि बड़े ग्लेशियरों का क्रमिक पतन बाद में होता है। अध्ययन ने स्पष्ट किया है कि ग्लेशियरों का यह उत्थान-पतन केवल इस सदी में ही नहीं रुकेगा, बल्कि 2100 के बाद भी ग्लेशियरों की महत्वपूर्ण हानि जारी रहेगी, जिससे कई ग्लेशियर 22वीं सदी में भी समाप्त होंगे। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को +1.5°C तक सीमित नहीं किया गया, तो सदी के अंत तक केवल कुछ ही ग्लेशियर बच पाएंगे, और अत्यधिक तापमान वृद्धि के परिदृश्यों में अधिकांश ग्लेशियरों के गायब होने की संभावनाएं और अधिक गंभीर होंगी।

ग्लेशियरों के समापन का यह संकट ना केवल पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर गहरा प्रभाव डालता है, बल्कि व्यापक रूप से जल संसाधनों, समुद्र तल वृद्धि और स्थानीय समुदायों की जीविका पर भी दीर्घकालिक खतरे पैदा करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक नीति में तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

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