ज़हरीली हवा के ख़तरे: हवा में घुला ज़हर बच्चों में एनीमिया और महिलाओं में प्रेगनेन्सी लॉस के ख़तरे को बढ़ा रहा है | Photo: The Indian Express

वायु प्रदूषण: बच्चों में एनीमिया और महिलाओं में गर्भपात के ख़तरे

यह सर्वविदित है कि वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों को नहीं बल्कि शरीर के हर अंग और यहां तक कि प्रत्येक कोशिका को नुकसान पहुंचाता है।  लेकिन अब शोध बताते हैं कि हवा में घुला ज़हर बच्चों में एनीमिया के ख़तरे को भी बढ़ा रहा है। आईआईटी दिल्ली स्थित सेंटर फॉर एटमॉस्फियरिक साइंस और हावर्ड विश्वविद्यालय के टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की रिसर्च में यह बात सामने आई है। शोध बताता है कि आउटडोर प्रदूषण का 5 साल से कम उम्र के बच्चों में एनीमिया यानी खून की कमी से संबंध है। रिसर्च कहती है कि पीएम 2.5 कणों की मात्रा में 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी से एनीमिया के स्तर में औसतन 1.9% बढ़ोतरी होती है और हीमोग्लोबिन  0.07 ग्राम प्रति डेसीलीटर घट जाता है। इस रिसर्च के लिये 2015-16 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े इस्तेमाल किये गये।

इसी तरह लांसेट की रिसर्च में पाया गया है कि वायु प्रदूषण गर्भपात  (प्रेगनेन्सी लॉस) के खतरे को बढ़ाता है। अंदाज़ा है  कि दक्षिण एशिया में हर साल 3.49 लाख प्रेगनेन्सी लॉस पीएम 2.5 कणों के बढ़ते प्रभाव के कारण है। यह पूरे क्षेत्र में 2000-2016 के बीच कुल प्रेगनेन्स लॉस (गर्भपात, बच्चे की कोख में मृत्यु) का 7% है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में  इन मामलों की अच्छी खासी संख्या है।

प्रदूषण कर रहे बिजलीघरों से खरीद में बंगाल सबसे आगे, गुजरात भी पीछे नहीं

पश्चिम बंगाल जिन कोयला बिजलीघरों से बिजली खरीदता है वो सबसे अधिक प्रदूषण कर रहे हैं। यह बात दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरेंमेंट (सीएसई) के अध्ययन से पता चली है। बंगाल जिन थर्मल पावर प्लांट से बिजली खरीदता है उनमें से ज़्यादातर ने हानिकारक सल्फर डाई ऑक्साइड (SO2) इमीशन को नियंत्रित करने के लिये कदम नहीं उठाये हैं।  प्रदूषण के मानकों के लिये इन शोधकर्ताओं ने ताप बिजलीघरों की चिमनियों से हो रहे सल्फर इमीशन को ही आधार बनाया क्योंकि नाइट्रोजन के ऑक्साइडस के लिये मानक पहले ही काफी ढीले किये जा चुके हैं। अब सल्फर के मानकों को ढीला करने के लिये भी बिजली मंत्रालय दबाव बना रहा है। भारत में मानव गतिविधियों से होने वाले इमीशन में 50% से अधिक हिस्सा ताप बिजलीघरों से निकलने वाली SO2 का है।

सीएसई के इस शोध में देखा गया कि बिजलीघरों ने सल्फर डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन को रोकने के लिये क्या कदम उठाये हैं। जो पावर प्लांट मानकों को पूरा करते हैं या उन्होंने टेक्नोलॉजी लगाने के लिये ठेके दिये हैं उन्हें पीले यानी साफ ऊर्जा की श्रेणी में रखा गया।  जिन पावर प्लांट्स ने सल्फर नियंत्रक टेक्नोलॉजी के लिये ठेके देने कि प्रक्रिया शुरू कर दी है उन्हें नारंगी और जिनके पास कोई प्लान नहीं है उन्हें लाल ज़ोन में रखा गया।  नारंगी और लाल श्रेणी के पावर प्लांट्स को अनक्लीन यानी प्रदूषण फैलाने वाली श्रेणी में रखा गया। शोध में पाया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर क्लीन पावर स्टेशन से औसतन केवल 42% बिजली ली जा रही है। बंगाल केवल 16% बिजली, गुजरात 29% और तेलंगाना 26% बिजली क्लीन कैटेगरी के प्लांट से ले रहे हैं।.

केंद्र पराली से निपटने के उपाय ढूंढे: सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह एक शपथ पत्र दायर कर बताये कि भविष्य में पराली जलाने से निपटने के लिये क्या “पुख्ता उपाय” किये जा रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में जाड़ों में होने वाले प्रदूषण का बड़ा हिस्सा पराली के धुंयें से आता है। चीफ जस्टिस एस ए बोबड़े र जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस रामासुब्रमण्यन की बेंच ने यह आदेश उस अपील की सुनवाई में दिया जिसमें कहा गया था कि पराली प्रदूषण के हालात फिर सामने आयेंगे। पिछले महीने उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि वह दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिये बनी एयर क्वॉलिटी मैनेजमेंट कमीशन (CAQM)  के काम से संतुष्ट नहीं है।

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