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जंगल जलवायु परिवर्तन के कारक बन रहे हैं!

अगर आपसे कहा जाये कि अब जंगल जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार को थामने की जगह बढ़ाने में एहम भूमिका निभा रहे हैं तो आपको यह सुन कर कुछ अटपटा लग सकता है। हो सकता है आपको यह अफ़वाह भी लगे।

लेकिन यह सुनने में अफ़वाह ज़रूर लग सकती है मगर असलियत यह है कि अगर हालात नहीं बदले तो उत्तरी कनाडा के आर्कटिक ज़ोन और दक्षिणी कनाडा के समशीतोष्ण क्षेत्र के बीच पाए जाने वाले बोरियल जंगल, आने वाले कुछ सालों में इतनी कार्बन उत्सर्जित करेंगे कि वो जंगल जलवायु परिवर्तन के कारक तक बन सकते हैं। ऐसा ही कुछ हाल ब्राज़ील में अमेज़न के जंगलों का भी हो सकता है।

अब इस सूरत-ए-हाल को समझने के लिए आपको आगे पढ़ना होगा।

क्योंकि यह बात आपको शुरू में अफ़वाह सी लगी थी, तो चलिये बात को अफ़वाह से ही बढ़ाया जाये। ऐसा माना जाता है कि अफ़वाह जंगल की आग की तरह फैलती हैं। जंगल की आग की तरह इसलिए क्योंकि अफ़वाह बड़ी तेज़ी से फैलती है। इधर आपने कोई फ़र्ज़ी बात किसी कमज़ोर हाज़मे वाले इन्सान के सामने कही और उधर वो पूरे जहान में फ़ैल गयी।

जंगल की आग दरअसल वाक़ई बड़ी तेज़ी से फैलती है। ऐसा माना जाता है कि यह आग 22 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से फैलती है। मतलब आपके और हमारे जैसे आम इन्सानों के भागने की रफ़्तार से भी तेज़। इस रफ़्तार पर मिनटों में सब तबाह कर के रख देती है यह आग।

वैसे इसके फैलने का तो हर कोई ज़िक्र करता है और इसकी रफ़्तार की मिसाल अफ़वाहों के मुताल्लिक़ दी जाती है, मगर इस आग लगने की वजह के बारे में कभी सोचा है आपने?

कभी सोचा है आख़िर पूरी दुनिया से आये-दिन क्यों ख़बरें आती है जंगलों में आग लगने की? और आखिर क्यों इन ख़बरों में इज़ाफ़ा ही होता जा रहा है साल-दर-साल?

असलियत यह है कि चाहें अमेज़न के जंगल हों या अर्जेंटीना के पराना डेल्टा के जंगलों की आग हो, या फिर कैलिफोर्निया में फ़ैल रही जंगल की आग हो – गुनेहगार की शक्ल में इन्सान का चेहरा ही दिखता है।

दरअसल वैज्ञानिकों की मानें तो आग लगने की इन घटनाओं में इज़ाफ़ा किसी एक इन्सान की वजह से नहीं, बल्कि हम सब की वजह से हुआ है। नासा की अर्थ ऑब्जर्वेटरी की मानें तो अर्जेंटीना के पराना डेल्टा की आग का सीधा रिश्ता बढ़ती गर्मी और सूखे से है। और यह बढ़ती गर्मी और सूखा परिणाम हैं मानव-निर्मित कार्बन उत्सर्जन का, जिसकी वजह से औसत तापमान में वृद्धि हो रही है और दुनिया के कई हिस्सों में, ऐसी आग लगने के लिए स्थितियां अनुकूल होती जा रही हैं।

बात वैश्विक स्तर पर करें तो नेचर मैगज़ीन में 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़ वर्ष 1979 और 2013 के बीच, आग लगने वाले मौसम की अवधि में 18.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। और अगर उत्सर्जन में वृद्धि जारी रही, तो शोधकर्ताओं के अनुसार, आने वाले सालों में जंगल में आग लगने की घटनाओं में नाटकीय रूप से वृद्धि हो सकती है। अगले तीस सालों में, मतलब 2050 तक, विशेषज्ञों का ऐसा अनुमान है कि जंगल में आग लगने की घटनाएँ साल 2000 की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक होंगी।

यही नहीं, वैज्ञानिकों का अनुमान तो यह तक है कि दक्षिणी यूरोप जैसे क्षेत्र, जहाँ आग लगने की घटनाएँ आम हैं, वहां बढ़ते उत्सर्जन के चलते इन घटनाओं के होने की संख्या में तेज़ी से वृद्धि होगी। मसलन भूमध्यसागरीय बेसिन पर हाल ही में हुए में एक अध्ययन की एक रिपोर्ट नेचर मैगज़ीन में प्रकाशित हुई और इसके अनुसार अगर कार्बन एमिशन इसी रफ़्तार पर जारी रहे तो इस सदी के अंत तक फ्रांस में आग लगने की घटनाओं में 91 फ़ीसद तक बढ़ोतरी होगी। वहीँ ग्रीस में यह बढ़त 29 फ़ीसद होगी, तो पुर्तगाल में 21 फ़ीसद, और ट्यूनीशिया में आग लगने की घटनाओं में 30 प्रतिशत तक की बढोतरी होगी इस सदी के अंत तक।

यह तो बात हो गयी क्या हो सकता है। अब ज़रा यह समझा जाये कि जो होगा वो क्यों होगा। इसके लिए जंगल की आग का विज्ञान समझना पड़ेगा।

तो होता यह है कि जब तापमान बढ़ता है तब पेड़ धरती से बड़ी मात्रा में पानी को सोखते हैं और इसे अपनी कैनोपी, या ऊपरी भाग, के माध्यम से वायुमंडल में वाष्प बना कर छोड़ देते हैं। अब पेड़ जब धरती का पानी इस रफ़्तार से सोख लेंगे तो वनस्पति और मिट्टी दोनों ही सूख कर रह जायेंगे। सूख जायेंगे तो ज़ाहिर है ज़्यादा ज्वलनशील हो जायेंगे। और ऐसे में तेज़ तापमान और बहती हवा ऑक्सीजन की सप्लाई बनाए रखते हैं और आग को फैलने का पूरा मौका मिल जाता है।

मतलब सूखे पेड़ और सूखी मिटटी के जैविक तत्व आग के लिए ईंधन का काम करते हैं।

यही वजह है कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, आग लगने की यह घटनाएँ बढती चली जा रही हैं।

यहाँ इडाहो विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर, डॉक्टर जॉन अबज़ोग्लू, का पक्ष जानना महत्वपूर्ण है। वो कहते हैं, “जंगल की आग का सीधा रिश्ता जंगलों में उपलब्ध ईंधन से है। सूखी लकड़ी बेहतरीन ईंधन है और उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने में जलवायु परिवर्तन एक एहम भूमिका निभाता है। दरअसल जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान में वृद्धि होती है और पेड़ों की धरती से नमी सोखने की दर में भी इज़ाफ़ा होता है।”

डॉक्टर जॉन के तर्क से समझ आता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ही दुनिया के कई क्षेत्रों में सूखा पड़ना आम हो रहा है और इससे भी आग लगने की घटनाओं का सीधा सम्बन्ध है। वैसे इस बात की तस्दीक जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की एक रिपोर्ट से भी होती है।

चूंकि सूखे की वजह से पेड़, शाखाएँ, और पत्तियाँ मर कर सूख जाती हैं, वे मिट्टी में जमा हो कर आग के लिए तैयार ईंधन की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं।

अब इसी सन्दर्भ में सूखे के बाद ठण्डी बर्फ़ की बात कर ली जाए। दरअसल दुनिया के कुछ हिस्सों में, जैसे कि पश्चिमी अमेरिका में, बर्फ़ की चोटी का पिघलाना पानी की उपलब्धता को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ ही इससे जंगल की आग का खतरा कम होता है। दरअसल सर्दियों के दौरान पहाड़ों में बर्फ के रूप में जमा होने वाला पानी झरना बन कर नीचे की ओर बहता है और वहां सूखे की स्थिति पैदा होने से बचाता है। यदि सर्दियों के दौरान पर्याप्त बर्फ जमा नहीं हो या फिर बहुत जल्दी बर्फ पिघल जाये, तो तेज़ गर्मी के दौरान जंगल में पानी की कमी हो सकती है। ज़ाहिर है, इससे सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है और अंततः जंगल में आग भी लग सकती है।

जलवायु परिवर्तन पहले से ही बर्फ़ के पिघलने की गति और मात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। नेचर पत्रिका की मानें तो पश्चिमी अमेरिका में पहाड़ों की बर्फ़ पिघलने की निगरानी करने वाले 10 में से 9 मोनिटरिंग साइटों से परेशान करने वाले नतीजे दिए हैं।

वैसे ऐसा नहीं है कि आग सिर्फ़ तबाही ही मचाती है और हमारी प्रकृति को नुकसान ही पहुंचाए। बल्कि आग तो प्राकृति के तंत्र का हिस्सा है। मसलन बात अगर सवाना घास के मैदानों और बोरियल जंगलों की करें तो आग वहां की पारिस्थितिक तंत्र का एक प्राकृतिक तत्व है। इन स्थानों पर आग की एक बेहद महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका होती है। यहाँ आग पुरानी वनस्पति और कीटों को नष्ट कर धरती में न सिर्फ़ पोषक तत्वों को वापस पुनर्चक्रित करती है, बल्कि एक  लिहाज़ से इन जंगलों को आबाद ही करती है। 

लेकिन अब समस्या दरअसल यह हो गयी है कि इन क्षेत्रों में आग लगने की प्राक्रतिक सायकिल ही बदल रही है। वैज्ञानिकों के पास इस बात के अब पक्के सबूत हैं कि जलवायु परिवर्तन और मानव हस्तक्षेप के नकारात्मक परिणामों के चलते आग लगने की सायकिल में बदलाव हो रहा है। उदाहरण के लिए बात अगर उत्तरी अमेरिका और उत्तरी यूरेशिया के बोरियल जंगलों की करें तो पिछले वर्षों वहां आग लगने की घटनाओं में इज़ाफ़ा हुआ है। प्राक्रतिक रूप से यह जंगल हर 20 से लेकर 200 साल के बीच जल जाते हैं।  साथ ही, यह अपनी मिट्टी में बड़ी मात्रा में कार्बन जमा कर, कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं और ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार, आग लगने की घटनाओं के आकार, गंभीरता और आवृत्ति में वृद्धि के चलते अब नये उगे बोरियल जंगलों में जितना कार्बन जमा नहीं हो रहा, उससे कहीं ज़्यादा निकल रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगले कुछ वर्षों में, यह जंगल जलवायु परिवर्तन में योगदान करने लगेगा।

इस विषय पर लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी के वरिष्ठ स्टाफ वैज्ञानिक डॉक्टर माइकल वेनर ने कहा, “आप कैलिफोर्निया की ही हीट वेव्स की बात करें तो हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन ने इन्हें और अधिक गंभीर बना दिया है। मेरा अनुमान है कि बिना मानव हस्तक्षेप के कैलिफोर्निया की हीट वेव्स का तापमान लगभग तीन से चार डिग्री फ़ारेनहाइट कम होता।” वो फिर आगाह करते हुए कहते हैं, “यह हीट वेव्स में तीन से चार डिग्री का इज़ाफ़ा जो मानव हस्तक्षेप से हुआ है, वो तब है जब एमिशन्स कम हैं। अभी अगर एमिशन्स और बढ़े तो यही इज़ाफ़ा सदी के अंत तक सात डिग्री या उससे ज़्यादा भी हो सकता है।”

इस समस्या का एक अलग पहलू दिखाते हुए स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बाल रोग विशेषज्ञ और क्लिनिकल इंस्ट्रक्टर, डॉक्टर लिसा पटेल कहती हैं, “जंगल में आग लगने से हवा में ऐसे तत्व घुल रहे हैं जो जानलेवा हैं। एक डॉक्टर होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी है अपने मरीज़ की जान बचाना लेकिन मैं लाचार हूँ जलवायु परिवर्तन के इन असर के आगे। वायु प्रदूषण के चलते न सिर्फ़ हम बीमार हो रहे हैं, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे दुनिया में आने से पहले ही बीमार हो कर आ रहे हैं। और यह सब जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा है।”

वो आगे कहती हैं, “जंगल की आग के चलते बच्चे विस्थापित भी होते हैं और इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।” बाहरहाल, उम्मीद है अब तो आपको यक़ीन हो गया होगा कि अगर हम नहीं जागे, तो जंगल भी जलवायु परिवर्तन के कारक बन जायेंगे।

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