2025 में जीवाश्म ईंधन से उत्सर्जन अपने उच्चतम स्तर पर

नवीनतम वैश्विक विश्लेषण में सामने आया है कि 2025 में जीवाश्म ईंधन से होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है। वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष उत्सर्जन लगभग 38.1 अरब टन CO₂ के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2024 की तुलना में करीब 1.1 प्रतिशत अधिक है। यह वैश्विक उत्सर्जन का उच्चतम स्तर है और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को और गंभीर बनाता है। 

यह वृद्धि कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस के कठोर उपयोग से हो रही है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद दुनिया भर में ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम नहीं हो पाई है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि वर्तमान उत्सर्जन दर पर पृथ्वी को +1.5°C तापमान सीमा के भीतर रखने की संभावना समाप्त हो चुकी है, और बचा हुआ कार्बन बजट सिर्फ लगभग चार वर्षों के बराबर बचा है। 

वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि वन और महासागर जैसी प्राकृतिक ‘कार्बन सिंक’ कमजोर हो रहे हैं, जिससे वायुमंडल में CO₂ की सांद्रता और तेजी से बढ़ रही है। यह संकेत देता है कि न केवल उत्सर्जन को कम करना आवश्यक है, बल्कि प्राकृतिक प्रणालियों की क्षमता को भी बहाल करना अनिवार्य है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि हाल के वर्षों में चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं में नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार हुआ, जिससे उत्सर्जन वृद्धि की दर अपेक्षाकृत धीमी रही। लेकिन यूएस और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन में वृद्धि जारी है, जिससे वैश्विक CO₂ स्तर और ऊपर जा रहा है। 

विश्लेषण यह भी बताता है कि जीवन शैली, ऊर्जा खपत और वैश्विक नीतियों में बड़े बदलाव के बिना जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना कठिन होगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर उत्सर्जन इस तरह बढ़ता रहा, तो जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव और तीव्र होंगे, जिनका सामना दुनिया को अगली कुछ दशकों में करना पड़ेगा। 

यूएन पर्यावरण रिपोर्ट पर विवाद: अमेरिका और अन्य देशों ने वैज्ञानिक निष्कर्षों को लगाया ‘हाइजैक’, जलवायु कार्रवाई पर प्रभाव की आशंका

संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार की गई वैश्विक पर्यावरण रिपोर्ट (GEO-7) को लेकर बड़ी राजनीतिक तनाव पैदा हो गया है, क्योंकि कुछ विकसित देशों, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, ने रिपोर्ट के वैज्ञानिक निष्कर्षों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। रिपोर्ट छह वर्षों में लगभग 287 वैज्ञानिकों ने विकसित की थी और इसमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास, भूमि क्षरण, प्रदूषण और अनियंत्रित संसाधन खपत को एक साथ जोड़ा गया था, लेकिन राजनीतिक असहमति के कारण इसे “हाइजैक” किया गया बताया जा रहा है। 

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर धरती को खत्म हो रहे पर्यावरणीय संतुलन से बचाने के लिए कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से तेजी से मुक्त नहीं हुआ गया, तो जलवायु संकट और गंभीर रूप ले लेगा। लेकिन उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान अमेरिका, रूस और कुछ तेल-निर्माता देशों ने रिपोर्ट में शामिल कई आलोचनात्मक निष्कर्षों का समर्थन नहीं किया और सहमति-योग्य राजनीतिक सारांश तैयार नहीं होने दिया। 

विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक समर्थन के बिना रिपोर्ट का प्रभाव कमज़ोर हो सकता है, क्योंकि सरकारें इस तरह की वैज्ञानिक रिपोर्ट से नीति-निर्धारण और अंतरराष्ट्रीय समझौतों में दिशा लेती हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की यह रिपोर्ट अब राजनीतिक मंजूरी के बिना ही प्रकाशित हुई है, जो पिछले इतिहास से अलग है, क्योंकि सामान्यतः ऐसे निष्कर्षों के वैज्ञानिक आधार के साथ ही औपचारिक सारांश भी शामिल होते थे। 

रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर तत्काल कार्रवाई के लिए जीवाश्म ईंधनों के चरणबद्ध त्याग, प्रदूषण सहायता को समाप्त करना, और पारिस्थितिक-आधारित आर्थिक मॉडल अपनाने के सुझाव दिए गए हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर राजनीतिक लाभों और राष्ट्रीय हितों के चलते वैज्ञानिक साक्ष्य को नजरअंदाज किया जाता रहा, तो समुद्र के बढ़ते स्तर, चरम मौसम की घटनाएँ और जैव विविधता ह्रास जैसी समस्याएँ और तीव्र होंगी, जिनका सामना दुनिया को अगले दशक में करना पड़ेगा।

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