हर सांस में ज़हर, देश भर में फैला प्रदूषण का जाल

Newsletter - November 27, 2019

PHOTO - सांसों में घुलता ज़हर: राजधानी में रहने वाले जिन लोगों ने कभी धूम्रपान नहीं किया उन्हें भी कम उम्र में ही सांस से जुड़ी घातक बीमारियां हो रही हैं। Photo: Indiaspend

“बम से उड़ा दो…!” कैसे थमेगा ज़हरीली हवा का बढ़ता असर?

जाड़ों में भारत में वायु प्रदूषण बहुत खतरनाक स्तर तक ऊपर जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते राजधानी में प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि ‘लोगों को जबरन गैस चैंबर में रहने को क्यों कहा जा रहा है।’ कोर्ट ने सॉलिसटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘ऐसे हालात से बेहतर है कि उन्हें (लोगों को) एक ही बार में मार दिया जाए। लोगों को तिल-तिलकर मारने से अच्छा है कि 15 बस्तों में विस्फोटक भर कर उन्हें एक ही बार में खत्म कर दिया जाए।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर साफ हवा और पानी मुहैया नहीं करा सकती तो सरकार लोगों को मुआवज़ा दे। इस बारे में अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और यूपी की सरकारों से कहा कि उन्हें दिल्ली वासियों को मुआवज़ा देना चाहिये। कोर्ट ने अधिकारियों से कहा कि वह वायु प्रदूषण की समस्या से निबटने  के लिये एक दीर्घकालिक योजना बनायें। 

कोर्ट के यह कड़े शब्द प्रदूषण के बिगड़ते हालात पर अलार्म बेल की तरह हैं। जाने माने यूरोपियन मेडिकल जर्नल लांसेट से जुड़े लांसेट काउंटडाउन – 2019 की विशेष रिपोर्ट कहीं बड़े ख़तरों के बारे में बताती है। यह रिपोर्ट कहती है कि आने वाले दिनों में जलवायु परिवर्तन की वजह से एयर क्व़ालिटी और अधिक खराब होगी जिससे फेफड़ों और दिल की बीमारियां बढ़ेंगी। लांसेट और SoGA जैसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अलावा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICMR) की रिपोर्ट कह चुकी हैं कि भारत में हर साल 10 लाख से अधिक लोग वायु प्रदूषण से मरते हैं। दिल्ली में साल भर प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से 11 गुना अधिक रहता है। दीवाली के बाद के दिनों में यह स्तर सुरक्षित सीमा से 40-45 गुना अधिक ख़राब हो जाता है।

हालांकि दिल्ली राजधानी है जहां  होने वाला प्रदूषण टीवी चैनलों और राष्ट्रीय अख़बारों की सुर्खियाँ बनता है लेकिन देश के तमाम हिस्सों खासतौर से सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों वाले अधिकांश शहर प्रदूषण का शिकार हैं। उधर राजस्थान जैसे राज्यों में माइनिंग और स्टोन क्रशर्स का आतंक है जो दिन रात प्रदूषण कर लोगों को बीमार कर रहे हैं। दिल्ली में दो-तिहाई प्रदूषण के लिये ट्रांसपोर्ट, उद्योग और बिजली सेक्टर ज़िम्मेदार है। हालांकि सरकार प्रदूषण और उत्सर्जन के नये मानकों को लागू करने की योजना बनाती रही है लेकिन लागू करने में कड़ाई का अभाव और ढुलमुल नीति आड़े आती है। भारत के पड़ोसी चीन ने वायु प्रदूषण से लड़ने में कहीं अधिक संकल्प दिखाया है। चीन की हवा आज भारत के मुकाबले कई गुना अधिक साफ है क्योंकि वहां मानकों को कड़ाई से लागू करने के लिये सख्त नियम हैं। सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली के आसपास ताप बिजली घरों द्वारा  2015 में बनाये गये नियमों के तहत प्रदूषण नियंत्रण उपकरण न लगाना है। इस साल के अंत तक राजधानी के आसपास 30 से अधिक यूनिटों को कार्बन के साथ SO2 और NO2 को रोकने की टेक्नोलॉजी लगानी थी पर वह होता नहीं दिखता।


क्लाइमेट साइंस

PHOTO – कोई अंत नहीं: विश्व मौसम संगठन (WMO) के मुताबिक साल 2018 में भी वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों का स्तर बढ़ा है क्योंकि CO2 का स्तर 407 ppm पार कर गया Photo: PSmag

CO2 के जमाव में फिर बढ़ोतरी, राहत की उम्मीद नहीं: WMO

विश्व मौसम संगठन (WMO) ने इस हफ्ते जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वातावरण में लगातार जमा हो रही CO2 ने पिछले साल सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। 25 नवंबर को जारी ग्रीन हाउस बुलेटिन में कहा गया है, “दुनिया में CO2 का औसत जमाव 407.8 ppm  हो गया जबकि 2017 में यह आंकड़ा 405.5 ppm था”. माना जा रहा है कि इससे पहले ऐसी स्थिति 30-50 लाख साल पहले हो सकती है। CO2 स्तर के इस उछाल का कारण जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध इस्तेमाल माना जा रहा है.

ग्लोबल वॉर्मिंग से बढ़ रहा है IOD इफेक्ट  

ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग और अफ्रीका की बाढ़ में क्या समानता है? असल में इन दोनों का रिश्ता लगातार बढ़ रहे मौसमी प्रभाव  IOD यानी इंडिन ओशियन डाइपोल से है। इसे भारतीय नीनो भी कहा जाता है और इसकी वजह है अरब सागर के पश्चिमी छोर और पूर्वी हिन्द महासागर के पूर्वी छोर पर तापमान का अंतर। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण  IOD का असर लगातार बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस साल यह अब तक का सबसे ताकतवर डाइपोल रिकॉर्ड किया गया है।  अफ्रीका में बाढ़ और ऑस्ट्रेलिया में लगी बुशफायर के पीछे इसका असर है। 

इटली: वेनिस में बाढ़ से तबाही

इटली का वेनिस शहर इस महीने पांच दिन बाढ़ में डूबा रहा। बाढ़ से घिरे शहर के कई टूरिस्ट स्पॉट, होटल और दुकानों की तस्वीरें इंटरनेट पर छायी रहीं। प्रशासन का कहना है कि पिछले 50 साल में ऐसी बाढ़ यहां कभी नहीं दिखी। वेनिस के मेयर लुईगी ब्रुगनारो ने इस तबाही के लिये जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार ठहराया है। शहर को ऐसी बाढ़ से बचाने के लिये 1984 में एक फ्लड बैरियर की योजना बनाई गई थी। लेकिन कभी प्रोडक्ट की कीमत आड़े आई तो कभी भ्रष्टाचार। अब कहा जा रहा है कि 2021 तक बाढ़ निरोधी दीवार खड़ी हो जायेगी।  

खतरनाक नाइट्रस ऑक्साइड के स्तर में बढ़ोतरी

वातावरण में मौजूद तीसरी सबसे खतरनाक ग्रीन हाउस गैस है नाइट्रस ऑक्साइड जो ओज़ोन की परत के नष्ट होने के लिये ज़िम्मेदार है। नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में छपे शोध के मुताबिक साल 2009 से इस गैस का स्तर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ पैनल IPCC के अनुमान से भी अधिक तेज़ी से बढ़ा है। शोध के मुताबिक गैस के स्तर में इस तेज़ी के लिये दक्षिण अमेरिका और पूर्वी एशिया के देश अधिक ज़िम्मेदार हैं।   शोध के मुताबिक बीसवीं सदी के मध्य से ही नाइट्रोज़न उर्वरक के अधिक इस्तेमाल और नाइट्रोज़न बेस वाली सोयाबीन और मूंगफली जैसी फसलों पर ज़ोर दिया गया। इससे पैदावार बढ़ाने में मदद तो मिली लेकिन N2O का स्तर भी बढ़ता गया है।


क्लाइमेट नीति

PHOTO – वजूद की जंग: आदिवासियों के सतत संघर्ष ने आखिरकार सरकार को भारतीय वन कानून - 1927 में प्रस्तावित बदलाव वापस लेने पर मजबूर किया है। Photo: theWire.in

अमेज़न: वनों का कटान एक दशक में सबसे अधिक

ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सनारो जो कहते हैं वह करके दिखाते हैं। उन्होंने ‘विकास’ का वादा किया और अब आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि पिछले एक दशक से अधिक समय में अमेज़न के जंगलों का सर्वाधिक विनाश हुआ है। उपग्रह से मिली तस्वीरों से पता चलता है कि अगस्त 2018 से जुलाई 2019 के बीच करीब 10,000 वर्ग किलोमीटर जंगल उड़ा दिये गये हैं।

इस बीच ब्राज़ील के पर्यावरण मंत्री रिकार्डो सैलेस ने कहा है कि उनका देश पर्यावरण विनाश से लड़ने के लिये और अधिक धन चाहता है। ब्राजील के मुताबिक जंगलों को बचाने के लिये सरकार प्रतिबद्ध है।

आदिवासियों की जीत: सरकार ने वन अधिकार कानून में संशोधन वापस लिया

भारत में भी वन क्षेत्र पर सरकार का हमला जारी है लेकिन आदिवासियों के निरंतर संघर्ष और विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने 1927 में बनाये गये भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन वापस ले लिये हैं। प्रस्तावित संशोधनों में आदिवासियों के अधिकारों में कटौती और वन अधिकारियों और प्रशासन को जो अधिकार देनी की बात थी उन्हें लेकर काफी विवाद हुआ था और सरकार को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था। अब केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के मुताबिक सरकार आदिवासियों और जंगल में रह रहे नागरिकों के अधिकार के लिये प्रतिबद्ध है। माना जा रहा है कि झारखंड में चुनावों को देखते हुये सरकार ने बिरसा मुंडा की जयंती पर इन प्रस्तावित संशोधनों को वापस लिया है।    

जर्मनी: जलवायु परिवर्तन संरक्षण कानून को हरी झंडी

जर्मनी ने जलवायु परिवर्तन से लड़ने की दिशा में एक क्लाइमेट प्रोटेक्शन पैकेज को मंज़ूरी तो दे दी लेकिन इसकी उपयोगिता को लेकर कई सवाल बने हुये हैं। जर्मन चासंलर एंजिला मार्कल की पार्टी और उनके सोशल डेमोक्रेट सहयोगियों के बीच महीनों तक चली खींचतान के बाद इस पर सहमति बनी है। इस पैकेज का उद्देश्य 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिये देश की तय लक्ष्य हासिल करना है लेकिन जानकारों का कहना  है कि इस कानून के प्रावधान जलवायु परिवर्तन से पैदा हुई आपात स्थिति और उसके कुप्रभाव रोकने के लिये काफी नहीं होंगे।

इस बीच जर्मनी के कैबिनेट मंत्रियों ने यूरोपियन यूनियन के तमाम देशों से अपील की है कि वह दिसंबर में मेड्रिड में हो रहे जलवायु परिवर्तन महासम्मेलन में अग्रणी भूमिका निभायें।

मलेशिया का वादा, 2021 तक पाम ऑयल यूरोपीय मानकों जैसा होगा

दुनिया में इंडोनेशिया के बाद पाम ऑयल (ताड़ का तेल) के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक मलेशिया ने कहा है कि वह इस तेल के उत्पादन में सभी खाद्य सुरक्षा नियमों को लागू करेगा और 2021 तक देश का पाम आयल, यूरोपीय खाद्य सुरक्षा मानकों के बराबर होगा।

हालांकि मलेशिया अब तक यूरोपीय यूनियन के खाद्य मानकों के लिये अनमना रहा है। पिछले महीने उसने कहा था कि यूरोपीय यूनियन के नियम भोजन के लिये ताड़ के तेल की मांग को प्रभावित कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल डबलरोटी बनाने और चॉकलेट स्प्रेड के रूप में होता है। सरकार को लगता है कि यूरोपीय स्तर का तेल बनाना मलेशिया के पाम ऑयल उत्पादकों को आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा क्योंकि  तेल इंडस्ट्री अभी देश में तय किये गये मानकों पर ही खरी नहीं उतर रही है


वायु प्रदुषण

PHOTO – प्रदूषण का शिकार: वायु प्रदूषण से होने वाली सर्वाधिक मौतों के कारण भारत G-20 देशों की लिस्ट में टॉप पर है। Photo: IndiaTVNews

G20 देशों में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत सबसे ऊपर

G20 देशों में वायु प्रदूषण के कारण मरने वालों की सबसे अधिक संख्या भारत में है। यहां हर साल 10 लाख से अधिक लोगों की मौत के पीछे वायु प्रदूषण एक कारण है। ब्राउन टु ग्रीन नाम की यह रिपोर्ट क्लाइमेट ट्रांसपरेंसी पार्टनरशिप ने प्रकाशित की है और यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों पर आधारित है। यह रिपोर्ट कहती है कि G20 देशों को 2030 के लिये तय उत्सर्जन रोकने के लक्ष्य अधिक ऊंचे करने होंगे। धरती के तापमान को 1.5 डिग्री तक रोकने के लिये पेरिस समझौते का पालन करने के लिये क्लाइमेट एडाप्टेशन के लक्ष्य ऊंचे करने और वित्तीय मदद के वादों को पूरा करने की ज़रूरत है।

रिपोर्ट के मुताबिक 1.5ºC के लक्ष्य को हासिल करने के लिये भारत को 2030 तक अपने CO2 उत्सर्जन को 4.5 गीगाटन से कम करने और 2050 तक 3.2 गीगाटन तक कम करना होगा लेकिन भारत अभी 73% बिजली कोयले से बनाता है इसलिये वह 2030 तक CO2 उत्सर्जन को 6-6.3 गीगाटन तक ही सीमित कर पायेगा।

वायु प्रदूषण से निबटने के लिये पर्यावरण मंत्रालय ने ₹ 1.69 लाख करोड़ मांगे

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वायु प्रदूषण से निबटने के लिये 15वें वित्त आयोग से ₹1.69 लाख करोड़ की मांग की है। इस धनराशि का 60% हिस्सा उत्तर भारत के अति प्रदूषित राज्यों में खर्च किया जायेगा। मंत्रालय की योजना पराली निस्तारण के लिये टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने और ई-बस खरीद के साथ पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बैटरी वाहन का प्रयोग बढ़ाने की है। पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि उसके पास उतनी धनराशि नहीं है जितनी चाहिये। मंत्रालय ने जलागम क्षेत्र को दुरस्त करने के लिये ₹ 62,438 करोड़ की मांग की है। इसके साथ ही जल स्तर सुधारने और बंजर ज़मीन के लिये कुल ₹ 1.35 लाख करोड़ मांगा है।

NGT का आदेश: देश भर में एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग स्टेशन लगें, CPCB को दी जाये रिपोर्ट 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सभी राज्यों के प्रदूषण बोर्डों को आदेश दिया है कि एक साल के भीतर आवश्यक संख्या में एयर क्वॉलिटी मानिटरिंग स्टेशन पूरे देश में लगाये जायें और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को हर तीन महीने में रिपोर्ट दी जाये। पूरे देश अभी मौजूद स्टेशनों के अलावा कुल 2050 अतिरिक्त एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग स्टेशन लगाये जाने हैं जिनमें से 800 निरंतर लाइव निगरानी वाले स्टेशन होंगे। बाकी 1250 मैन्युअल मॉनिटरिंग स्टेशन होंगे।  

NGT ने राज्यों को इस बात के लिये फटकार लगाई कि वह पिछले पांच साल में प्रदूषण फैला रही सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों कोई जुर्माना नहीं वसूल पाये। कोर्ट ने CPCB को अब इन इकाइयों से जुर्माना वसूलने के लिये 15 फरवरी 2020 तक का वक़्त दिया है।

दिल्ली-एनसीआर ईंट के भट्ठे 15 दिसंबर तक बंद, आतिशबाज़ी पर जुर्माना बढ़ेगा

NGT  का कहना है कि दिल्ली में पटाखे छोड़ने पर मात्र 1000 रुपये का जुर्माना लगाना काफी नहीं है और इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। ग्रीन कोर्ट ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि वह जुर्माना यह देखकर लगाये कि नियम तोड़ने वाले की आर्थिक स्थिति क्या है और उसने कितनी बार नियम तोड़ा है। इसके अलावा NGT ने दिल्ली-NCR के 7000 से अधिक ईंट भट्ठों को 15 दिसंबर तक बंद रखने का आदेश भी दिया है। कोर्ट ने कहा है कि इस कदम का एयर क्वॉलिटी पर क्या असर पड़ा इसकी रिपोर्ट अदालत में जमा की जाये।


रिन्यूएबिल

PHOTO – ज़िद पर अड़े: जगन रेड्डी सरकार साफ ऊर्जा नीति में बदलावों के लिये अड़ी है। सरकार का कहना है मौजूदा हाल में वितरण कंपनियों के घाटे लगातार बढ़ रहे हैं। Photo: DNAIndia

वितरण कंपनियों का घाटा रोकने के लिये आंध्र प्रदेश ने बदली साफ ऊर्जा नीति

आंध्र प्रदेश सरकार ने साफ ऊर्जा नीति में कई अहम बदलाव किये हैं जिसके तहत एनर्जी बैंकिंग सुविधा को वापस ले लिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को बहुत नुकसान हो रहा है। राज्य सरकार के मुताबिक सौर, पवन और हाइब्रिड पावर प्रोजेक्ट्स  में बिजली की खरीद डिस्कॉम को भारी पड़ रही है। आंध्र में जगन रेड्डी की सरकार बनने के बाद से ही साफ ऊर्जा को लेकर काफी विवाद चल रहा है और नीति में बदलाव को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। जगनमोहन रेड्डी सरकार से पहले टीडीपी के राज में पूरे साल 100% एनर्जी बैंकिंग सुविधा थी। राज्य सरकार का कहना है कि इससे वितरण कंपनियों को ₹ 5000 करोड़ का घाटा हुआ है।

ग्रीन कॉरिडोर प्रोजेक्ट:  प्रधानमंत्री ने दिया दखल, कहा ज़मीन संबंधी अड़चनें दूर हों

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट सचिव से कहा है कि 10,141 करोड़ के ग्रीन कोरिडोर प्रोजेक्ट से जुड़ी ज़मीन अधिग्रहण संबंधी अड़चनों को जल्द दूर किया जाये। ग्रीन कोरिडोर प्रोजक्ट की घोषणा 4 साल पहले की गई थी पर प्रोजेक्ट के लिये पर्याप्त ज़मीन नहीं ली जा सकी है। इसके तहत देश के 8 राज्यों तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल और मध्य प्रदेश की मदद से 19,000 मेगा वोल्ट एम्पियर (MVA) का अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन सिस्टम बनाया जा रहा है। योजना है कि मार्च 2020 तक यह प्रोजक्ट पूरा हो जिससे 20,000 मेगावॉट बिजली की सप्लाई होगी।

सोलर प्रोजेक्ट में हुई वृद्धि लेकिन सौर ऊर्जा उत्पादन में गिरावट

मरकॉम रिसर्च के मुताबिक इस साल (2019) की तीसरी तिमाही (Q3) में कुल 2170 मेगावॉट के सौर ऊर्जा संयत्र लगे और साल की दूसरी तिमाही (Q2-2019) – 1510 मेगावॉट –  के मुकाबले 44% की बढ़ोतरी हुई। पिछले साल 2018 के Q3 – 1592 मेगावॉट – के मुकाबले यह बढ़त 36% रही।  महत्वपूर्ण है कि पिछली 5 तिमाही से सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने का ग्राफ लगातार गिर रहा था और अब यह सिलसिला टूटा है।

दूसरी ओर केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA)  ने कहा है इस साल के Q2 के मुकाबले Q3 में सौर ऊर्जा उत्पादन 14% गिरा है। जानकारों का कहना है कि मॉनसून में सौर उत्पादन घटना सामान्य बात है। महत्वपूर्ण है कि पिछले साल की तिमाही (Q3-2018) की तुलना में इस साल सौर ऊर्जा उत्पादन 25% बढ़ा है।

भारत और चीन में साफ ऊर्जा निवेश में गिरावट: सर्वे

विकासशील देशों में पिछले साल (2018 में) साफ ऊर्जा में निवेश (2017 के मुकाबले) $ 3600 करोड़ घटा।  ब्लूमबर्ग न्यू एनर्ज़ी फाइनेंस (BNEF) के ताज़ा सर्वे के मुताबिक साल 2017 में भारत और चीन समेत प्रमुख विकासशील देशों में सौर और पवन ऊर्जा समेत क्लीन एनर्ज़ी में कुल $ 16900 करोड़ का निवेश हुआ जो 2018 में घटकर $ 13300 करोड़ डॉलर रह गया। चीन में यह गिरावट 2017 के $ 12200 करोड़ से गिरकर $ 8600 करोड़ दर्ज की गई। भारत और ब्राज़ील के बाज़ार में भी निवेश गिरा। यह रिसर्च दुनिया की 104 देशों में की गई जिनकी इकोनोमी बढ़ रही है। यह पाया गया कि इन देशों में साफ ऊर्जा के संयंत्र लग तो रहे हैं लेकिन वह CO2 इमीशन के रोकन के तय लक्ष्य के लिये काफी नहीं हैं। इन देशों में कोयले की खपत में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

PHOTO – बैटरी डाउन: 10,000 करोड़ की FAME योजना ने अभी रफ्तार नहीं पकड़ी है क्योंकि पैसे की कमी के कारण परिवहन विभाग केंद्र की योजनाओं का फायदा नहीं उठा पा रहा। Photo: The Better India

कड़े नियमों और पैसे की कमी से बैटरी बसों की राह मुश्किल

बैटरी वाहनों को बढ़ावा देने के लिये फेम-2 योजना में 10,000 करोड़ की सब्सिडी का फायदा होता नहीं दिख रहा।  इसकी वजह या तो ट्रांसपोर्ट विभाग के पास पैसे की कमी या फिर हर बैटरी बस के लिये भारी भरकम बैंक गारंटी है। इसकी वजह से निवेशक अपना रिस्क कम करने के लिये ऊंची बोली लगा रहे हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली सरकार हर बैटरी बस के लिये 20 लाख बैंक गारंटी मांग रही है जबकि अन्य राज्य 2-3 लाख मांग रहे हैं।

कुछ विभागों के पास तो पैसे की इतनी कमी है कि वह सब्सिडी के पैसे से ही स्टाफ को तनख्वाह दे रहे हैं। राज्यों को सब्सिडी का फायदा उठाने के लिये 3 महीने में टेंडरों को अंतिम रूप देना है और 12 महीने के भीतर बसों की डिलीवरी सुनिश्चित करनी है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस बीच संसद को बताया है कि फेम योजना के तहत करीब 2.85 लाख इलैक्ट्रिक/हाइब्रिड वाहन खरीदारों को 360 करोड़ की सब्सिडी की फायदा मिला है।

आंध्र प्रदेश ने राज्य परिवहन बेड़े में ई-बस शामिल करनी की योजना रद्द की

आंध्र प्रदेश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बैटरी बसों को शामिल करने की मुहिम को झटका लगा जब राज्य सरकार ने 350 इलैक्ट्रिक बसों को APSRTC के बेड़े में शामिल करने की योजना रदद् कर दी। पहले केंद्र सरकार की योजना 1000 बैटरी बस खरीदने की थी जिनकी संख्या बाद में घटाकर 350  कर दी गई। अब टेंडर में भाई-भतीजावाद के आरोपों के बाद मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने सारी योजना रद्द कर दी है।

दुबई: 2021 तक मुफ्त में चार्ज कीजिये बैटरी वाहन

निजी वाहनों के लिये 2021 के अंत तक फ्री बैटरी चार्ज की सुविधा दी गई है। दुबई इलेक्ट्रिसिटी एंड वॉटर अथॉरिटी ने यह पहल की है। इसके बाद वाहन निर्माता वोल्वो ने भी  अपने XC 40 वाहनों के लिये पहले साल फ्री चार्जिंग की घोषणा की।  दुबई में यह उम्मीद की जा रही है कि साल 2020 आने तक नई कारों में 10% हिस्सा बैटरी कारों का होगा। 

जर्मनी: मर्सिडीज़ करेगी नौकरियों और निवेश में कटौती

जर्मनी की मर्सिडीज़-बेंज 1000 लोगों को नौकरियों से हटाने की तैयारी में है। कंपनी अपने खर्च में करीब €165 करोड़ की कमी करना चाहती है क्योंकि उसकी प्रीमियम IC इंजन कार नहीं बिक रही हैं। यह कटौती 2022 तक की जायेगी और कंपनी का कहना है इस बीच वह उपकरण खरीद, रिसर्च और प्रॉपर्टी में भी निवेश कम करेगी। इसका इंजन बनाने वाली कंपनी कॉन्टिनेंटल भी साल 2028 तक 5000 से अधिक लोगों को नौकरियों से हटायेगी।  पूरे यूरोपियन यूनियन देशों में कंपनियां फिलहाल  कड़े  उत्सर्जन मानकों के अनुरूप कार इंजन बनाने की चुनौती से जूझ रही हैं।


जीवाश्म ईंधन

PHOTO – एक और झटका: वित्त आयोग ने बिजली मंत्रालय की 83,500 करोड़ की मांग को ठुकरा सकता है। इस पैसे के अभाव में थर्मल पावर यूनिट कम उत्सर्जन करने वाले उपकरण नहीं लगा पायेंगी। Photo: China Daily

बिजलीघरों में प्रदूषण नियंत्रक उपकरण लगाने के लिये धनराशि हो सकती है नामंज़ूर

भारत के कोयला बिजलीघरों के लिये $1160 करोड़ की धनराशि की मांग वित्त आयोग ठुकरा सकता है। ऊर्जा मंत्रालय ने कोयला बिजलीघरों में प्रदूषण नियंत्रक टेक्नोलॉजी लगाने के लिये यह रकम  मांगी थी ताकि 2015 में बनाये गये उत्सर्जन मानकों को लागू किया जा सके। दिल्ली और एनसीआर के कोयला बिजलीघरों में इस साल के अंत तक यह टेक्नोलॉजी लगाई जानी है जबकि देश के बाकी कोल पावर प्लांट्स में 2022 तक उत्सर्जन नियंत्रक उपकरण लगाने हैं।

उधर निजी कंपनियों – जिन पर करीब अभी $1100 करोड़ का कर्ज़ है – ने साफ कह दिया है कि इस हाल में  उनके लिये अपने कोयला बिजलीघरों में यह टेक्नोलॉज़ी लगाना अभी संभव नहीं है। समाचार एजेंसी रायटर के मुताबिक भारत के आधे से अधिक कोयला बिजलीघर – जिनकी कुल क्षमता 166500 मेगावॉट है – निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं कर पायेंगे क्योंकि बैंक आर्थिक रूप से खस्ताहाल इन कंपनियों को कर्ज़ नहीं देना चाहती।

कोल पावर: चीन और भारत मिट्टी में मिला रहे हैं सारी मेहनत

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर (GEM) ने ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि जनवरी 2018 और जून 2019 के बीच चीन ने 42.9 GW के नये कोल पावर प्लांट लगाये और वह फिलहाल 148 GW के प्लांट और लगा रहा है। भारत ने भी 2014 से अब तक अपनी कोल पावर में 82 GW का इज़ाफा किया, हालांकि 7.4 GW के कोल प्लांट बन्द भी किये।  रिपोर्ट के अनुसार इन दोनों बड़ो देशों द्वारा कोल पावर में बढ़त से दुनिया के अन्य देशों द्वारा बिजली के लिये कोयले का इस्तेमाल घटाने की कोशिश बेकार हो सकती है। चीन और भारत की कोल पावर में बढ़ोतरी पेरिस समझौते के लक्ष्य से कतई मेल नहीं खाती। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 2025 तक अपना सालाना कोयला उत्पादन करीब 40 करोड़ टन बढ़ा सकता है।

कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिये राजस्व बंटवारे के नियमों होगा बदलाव

कोयला मंत्रालय ने घोषणा की है कि वह उन कंपनियों से 20% तक कम राजस्व वसूलेगा जो नीलाम की जाने वाली खदानों से जल्द कोयला निकालेंगी। सरकार का यह फैसला खनन कंपनियों को जल्द कोयला निकालने के लिये प्रोत्साहित करने के लिये है। सरकार ने नीलामी के लिये 15 बड़े कोल ब्लॉकों की पहचान की है। इनमें से हर ब्लॉक से सालाना 40 लाख टन कोयला निकाल सकता है।

जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध उत्पादन जारी, कैसे बचेगी धरती!

दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल और गैस) के उत्पादन पर संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। रिपोर्ट कहती है कि 2030 तक धरती के तापमान को 2 डिग्री की तापमान वृद्धि तक रोकने के जितना जीवाश्म ईंधन जलाने की इजाज़त है, पूरे विश्व का उत्पादन उससे 150% अधिक होगा। अगर तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री के भीतर रखने का सपना देखें तो अनुमानित कोयते, तेल औऱ गैस का यह उत्पादन सीमा से 280% ज़्यादा होगा। रिपोर्ट यह चेतावनी भी देती है कि अगर गैस के उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रही तो इस ईंधन से अब तक हुये घटे कार्बन उत्सर्जन का  कोई लाभ नहीं रहेगा उल्टे यह नेट ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी ही करेगा।