कोरोना से बर्बाद तेल बाज़ार पर साफ ऊर्जा का क्या होगा असर

Newsletter - April 30, 2020

कठिन डगर: तेल की औंधे मुंह गिरी कीमतों और महामारी के असर ने इस सेक्टर में ज़बरदस्त खलबली मचा दी है | Photo: FT

कोरोना से बर्बाद तेल बाज़ार पर साफ ऊर्जा का क्या होगा असर

वैश्विक तेल बाज़ार पर ऐसा संकट 200 साल के इतिहास में शायद पहले कभी नहीं आया। आज दुनिया की 90% जीडीपी पर क़ब्ज़ा रखने वाले देशों में कोरोना वायरस के कारण किसी न किसी स्तर पर लॉकडाउन की स्थिति है। आईईए ऑयल मार्केट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल तेल की मांग 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन  कम रहेगी चाहे साल के उत्तरार्ध में मांग बढ़ ही क्यों न जाये। यह कमी 2019 की कुल रोज़ाना खपत का 10% है। अप्रैल महीने में मांग 2019 के मुकाबले 30% कम रहने की संभावना है।

तेल की खपत में गिरावट ऐसी है कि उसके भंडारण के लिये जगह कम पड़ गई है। हाल ये हो गया कि अमरीका में पिछली 20 अप्रैल को तेल कंपनियों के शेयर निगेटिव(घाटे) में चले गये क्योंकि उत्पादकों को पैसा देकर खरीदारों से तेल उठवाना पड़ा। उसके बाद तेल की कीमतें 15 डॉलर प्रति बैरल पर आई जबकि अमरीकी तेल कंपनियां कहती हैं कि उनके लिये उत्पादन की कीमत ही 50 डालर प्रति बैरल है। ओपेक+ द्वारा तेल के उत्पादन को कम करने से भी अस्थाई राहत मिली और अभी अरब देशों में तेल की कीमत 20 डॉलर प्रति बैरल पर टिकी है।

तेल बाज़ार में इस खलबली का सीधा असर क्लाइमेट एक्शन यानी ग्लोबल वॉर्मिंग के खिलाफ जंग में होने वाला है। यह बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि कोराना महामारी से निकलने के बाद अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिये क्या रोडमैप अपनाया जाता है। तेल कभी भी ऊर्जा कंपनियों के लिये भरोसेमंद ईंधन नहीं रहा यह बात साबित हो चुकी है। तो क्या दुनिया भर की सरकारें अब क्लीन एनर्जी के लिये स्थाई रास्ता तैयार करेंगीं?

ख़तरा यह भी है कि तेल की ज़मीन पर पहुंच चुकी कीमतें कंपनियों के लिये पैसे बचाने का लालच भी होगा इसलिए वह अपनी क्लीन एनर्जी प्रोग्राम को सुस्त करने का बहाना भी ढूंढ सकती हैं। इससे पहले 2014-15 में जब तेल की कीमतें लुढ़की तो उससे पूरी तरह साफ ऊर्जा में शिफ्ट तो नहीं हुआ पर फिर भी पेरिस डील जैसे समझौते के लिये माहौल तैयार करने में मदद मिली। कई पहलू और भी हैं। क्या तेल की कीमतों में कमी का इस्तेमाल साफ ऊर्जा को और सब्सिडी देने में किया जा सकता है। सच यह है 2016-19 के बीच क्लीन एनर्जी सब्सिडी घटी हैं। भारत ने खुद तेल और गैस के क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों को सेल्फ सर्टिफिकेशन के नाम पर जो ढील दी हैं वह बताती है कि सरकार जीवाश्म ईंधन का मोह नहीं छोड़ पायी है। दुनिया भर में तेल और गैस कंपनियों की लॉबी काफी मज़बूत है। क्या तेल वापस अपनी शाही शान को पा सकता है इस पर बहुत कुछ निर्भर है।  अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प इन तेल कंपनियों के बड़े समर्थक हैं। अमरीका में अगले राष्ट्रपति चुनावों में क्या होगा यह भी बड़ा सवाल है लेकिन भारत को अपना रास्ता खुद चुनना है क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे अधिक असर भारत जैसी भौगोलिक स्थित में रह रहे लोगों पर ही होगा।


क्लाइमेट साइंस

संकट में उम्मीद: भारत में इस साल ‘सामान्य’ मॉनसून की ख़बर भारी नुकसान झेल चुके किसानों समेत देश की अर्थव्यवस्था के लिये थोड़ा सुकून देने वाली है फोटो: Deccan Herald

इस साल मॉनसून सामान्य रहेगा: मौसम विभाग

मौसम विभाग (IMD) के लॉन्ग रेंज फोरकास्ट (LRF) के मुताबिक भारत में इस साल मॉनसून सामान्य रहेगा। IMD के मुताबिक मॉनसून की तीव्रता 95% से 104% तक रहेगी। जानकार कह रहे हैं कि कोराना महामारी और मार्च में हुई बरसात से नुकसान झेल चुके किसानों के लिये यह अच्छी ख़बर है।  यहां यह जानना ज़रूरी है कि ‘सामान्य मॉनसून’ का मतलब बरसात का ‘सामान्य वितरण’ नहीं है। अभी का पूर्वानुमान बहुत सी जानकारियां नहीं देता। मई में आने वाले दूसरे लॉन्ग रेंज फोरकास्ट में इन बातों पर अधिक स्पष्टता होगी।

कार्बन इमीशन में कमी जलवायु संकट रोकने के लिये काफी नहीं

भले ही कोरोना महामारी के कारण ग्रीन हाउस गैसों के इमीशन(उत्सर्जन) में भारी गिरावट दर्ज की जा रही हो लेकिन यह ग्लोबल वॉर्मिंग से  पैदा हुये संकट को रोकने के लिये काफी नहीं है। यह कहना है विश्व मौसम संगठन यानी WMO का। WMO के मुताबिक इमीशन में यह गिरावट अस्थायी है और इस महामारी का असल में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित लोगों के जीवन स्तर पर बहुत खराब असर होने जा रहा है। WMO ने दुनिया की सभी सरकारों से अपील की है कि वह कोरोना से निपटने के लिये बनाये जा रहे राहत पैकेज में पर्यावरण के लिये कदम भी शामिल हों।  

संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट साइंस रिपोर्ट में हो सकते हैं कोराना के सबक

साल 2021-22 में प्रकाशित होने वाली यूएन क्लाइमेट साइंस रिपोर्ट में कोरोना वाइरस को लेकर कई सबक हो सकते हैं। विशेष रूप से इस पड़ताल को लेकर कि संसाधनों पर बढ़ते जनसंख्या दबाव का महामारी से क्या रिश्ता है।  माना जा रहा है कि चीन के वुहान से निकला कोरोना वाइरस जानवरों (चमगादड़ों) से इंसान में पहुंचा।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इस बात का अध्ययन करेगी की क्या बढ़ती जनसंख्या, अत्यधिक प्रदूषण और वन्य जीवों के बसेरों का विनाश होने से इस तरह के वाइरस जंतुओं से इंसान में पहुंच रहे हैं।

पोलैंड के जंगलों में भयानक आग से तबाही

जहां पोलैंड एक ओर पिछले कई दशकों के सबसे बड़े सूखे का सामना कर रहा है वहीं देश के उत्तर-पूर्व में बीएब्ज़ा नेशनल पार्क के दलदल जंगलों में लगी आग से खत्म हो रहे हैं। यह आग करीब 6,000 हेक्टेयर में फैली है। अधिकारियों का कहना है कि आग गैरकानूनी तरीके से घास जलाये जाने से लगी होगी। वैसे तो यहां जंगलों में आग लगती ही रहती है लेकिन इतनी बड़ी आग कई सालों बाद लगी है। पर्यावरण के जानकार इसके लिये जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार ठहराते हैं और पोलैंड में जल प्रबंधन नीतियों को दुरस्त करने  की मांग कर रहे हैं।


क्लाइमेट नीति

ताकि काम जारी रहे: सरकार ने नगरपालिका सीमा के बाहर ताप और हाइड्रो बिजलीघरों में निर्माण की अनुमति दी है | Photo: ET Energyworld

कोरोना: नगर क्षेत्र की सीमा से बाहर बिजलीघरों के निर्माण की अनुमति

बिजली मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि नगरपालिका क्षेत्र के बाहर पड़ने वाले ताप और हाइड्रो पावर प्लांट्स को निर्माण की अनुमति दी जाये। 15 अप्रैल को गृह मंत्रालय की ओर से जारी एक निर्देशिका में भी कहा गया है इस तरह की निर्माण सामग्री को राज्यों के भीतर और बाहर आने जाने दिया ताकि ये प्रोजेक्ट पूरे हो सकें। 

क्लाइमेट एक्शन: न्यूज़ीलैंड  2030 के लिये तय क्लाइमेट लक्ष्य पर अटका

संयुक्त राष्ट्र चाहता है कि साल के अंत तक सभी देश जलवायु परिवर्तन पर अपने तय लक्ष्य और कड़े करें लेकिन न्यूज़ीलैंड ने कहा है कि वह फिलहाल अभी 2030 के लिये अपने घोषित लक्ष्य पर ही कायम रहेगा। अभी न्यूज़ीलैंड ने कहा है कि वह 2030 तक अपने इमीशन 30% (2005 के स्तर पर) कम करेगा।  इसके साथ ही उसके ग्रीन हाउस गैसों का नेट इमीशन ज़ीरो होने में 2050 तक का वक्त लगेगा।

न्यूज़ीलैंड ने जलवायु परिवर्तन आयोग बनाया है जो 2021 की शुरुआत तक उन कदमों की सिफारिश करेगा जिससे तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री  तक सीमित करने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिले।   क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर के मुताबिक कीवी देश का वर्तमान प्लान 2 डिग्री तक सीमित रखने के लिये भी पर्याप्त नहीं है जो पेरिस डील के तहत न्यूनतम शर्त है।

दक्षिण कोरिया: डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से 2050 तक नेट ज़ीरो इमीशन है मुमकिन

दक्षिण कोरिया में डेमोक्रेटिक पार्टी को भारी जीत मिली है जिससे अब 2050 तक नेट ज़ीरो इमीशन हासिल करने का लक्ष्य मुमकिन लग रहा है। कोरिया में अब कोल फाइनेंसिंग पर भी रोक लग जायेगी। यह पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में किया गया वादा है। दक्षिण कोरिया में कोरोना महामारी के बीच ही चुनाव कराये गये जिसमें मास्क लगाये मतदाताओं ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया। राष्ट्रपति मून जे-इन की पार्टी ने 300 में से 180 सीटें जीती। दक्षिण कोरिया पूर्वी एशिया का पहला देश है जिसने साल 2050 तक नेट ज़ीरो इमीशन का लक्ष्य घोषित किया है।


वायु प्रदुषण

विरोधाभास: लॉकडाउन की वजह से भारत के तमाम प्रदूषित शहरों के PM लेवल में भारी कमी आई है। Photo: CarbonCopy/Null School

कोरोना लॉकडाउन: 115 शहरों में हवा 80% तक साफ

कोरोना लॉकडाउन के दौरान देश के 115 में से 80% शहरों की हवा ‘अच्छे’ और ‘संतोषजनक’ स्तर पर रही है। जबकि लॉकडाउन की घोषणा सिर्फ 44% शहरों की हवा इस स्तर पर थी। केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड यानी CPCB ने 16 मार्च से 15 अप्रैल तक के आंकड़ों के आधार पर यह बात कही है। लॉकडाउन के बाद पार्टिकुलेट मैटर कम हुआ और हवा में SO2 और NO2 का स्तर तेज़ी से घटा है। यह वाहनों के थमने, इंडस्ट्री और व्यवसायिक गतिविधियों के बन्द होने का असर है। इस दौरान किसी भी शहर में ‘बहुत ख़राब’ एयर क्वालिटी दर्ज नहीं हुई। फेफड़ों और दिल के लिये घातक ऐरोसॉल की मात्रा अप्रैल की शुरुआत में ही 20 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की सैटेलाइट तस्वीरों से यह जानकारी मिली है।

लॉकडाउन में भी दिल्ली और मुंबई दुनिया से सबसे प्रदूषित शहरों में

दिल्ली और मुंबई लॉकडाउन के दौरान दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट में दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे। यह बात स्विटज़रलैंड स्थित एयर क्वॉलिटी रिसर्च बॉडी IQAir ने कही है। सबसे प्रदूषित शहर चीन का वुहान रहा जहां से कोरोना वाइरस फैला है। इस रिसर्च में तीन हफ्ते के लॉकडाउन के दौरान  रियल टाइम मॉनिटरिंग स्टेशनों से PM 2.5 का स्तर नापा गया।  अगर मार्च 23 और अप्रैल 13 के बीच आंकड़ों की तुलना करें तो मुंबई का PM 2.5 स्तर पिछले चार सालों की तुलना में 42% कम नापा गया। मुंबई का PM 2.5 लेवल लॉकडाउन के दौरान 28.8 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा जबकि वुहान में यह 35.1 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर नापा गया।  दूसरे नंबर पर सबसे दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर दिल्ली रहा जहां PM 2.5 का स्तर 32.8 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड किया गया।

प्रदूषित वायु कणों से फैलता है कोरोना?

इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ बोलोनिया के प्राथमिक वैज्ञानिक शोध में इस बात के कुछ सुबूत मिले हैं कि प्रदूषित हवा के कण कोरोना वाइरस  के वाहक बन सकते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके लिये शहरी इलाकों और कुछ औद्योगिक क्षेत्रों सैंपल लिये। कोविड-19 से मिलते जुलते जीन की मौजूदगी हवा में लटके प्रदूषण के कणों में पाई गई। इस अध्ययन को अभी दूसरे वैज्ञानिकों द्वारा जांचा जायेगा और यह पता किया जायेगा कि वाइरस के कितने दूर तक जाने और कितनी देर तक हवा में रहने की संभावना है।

यूरोप: कोरोना से हुई 80% मौतें सबसे प्रदूषित इलाकों में

एक ताज़ा रिसर्च से पता चला है कि यूरोप में कोरोना से हुई मौतों में वायु प्रदूषण का काफी अहम रोल रहा। फ्रांस, स्पेन, इटली और जर्मनी में कोरोना से मरने वाले करीब 80% लोग उन इलाकों में थे जहां वायु प्रदूषण सबसे ख़राब स्तर पर था। इस शोध में NO2 के स्तर और उन मौसमी स्थितियों का अध्ययन किया गया जो प्रदूषण को बिखरने से रोकते हैं। NO2 फेफड़ों को बीमार कर देता है और कोरोना होने पर जान जाने का ख़तरा बढ़ जाता है।  कोरोना महामारी के फैलने के साथ ही जानकारों ने यह चेतावनी दे दी थी कि घने प्रदूषण में रह रहे लोगों के लिये यह वायरस ज्यादा ख़तरनाक होगा।


रिन्यूएबिल

खतरे की घंटी: वैश्विक महामारी ने जो संकट पैदा किया है उससे पूरे एशिया में तेज़ी से बढ़ रहा साफ ऊर्जा क्षमता का आकाश एकदम सिकुड़ता दिख रहा है। Photo: Freight Waves

कोविड-19: एशिया में 150 GW के साफ ऊर्जा संयंत्रों पर ख़तरा

अगर कोरोना संकट का असर 2020 के आगे भी जारी रहता है कि एशिया पैसेफिक क्षेत्र में अगले 4 सालों में 150 GW क्षमता के साफ ऊर्जा संयंत्रों का भविष्य अधर में होगा। यह बात रिसर्च और कन्सलटेंसी फर्म वुड मेकेंजी ने कही है। बिजली क्षेत्र में जितनी भी मांग बढ़ी है उसका 75% इसी क्षेत्र  की वजह से है क्योंकि  सबसे अधिक पवन और सौर ऊर्जा संयंत्र यहीं पर लगे।  शोधकर्ताओं का कहना है कि सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि अगले कुछ महीनों में क्या एशिया पैसेफिक क्षेत्र मौजूदा हालात से उबर पाता है या नहीं। मांग में बढ़त, साफ ऊर्जा प्रोजेक्ट्स को मिलने वाला कर्ज़ और बिजली दरों में प्रतिस्पर्धा मुख्य सूचक होंगे जिस पर शोधकर्ताओं की नज़र रहेगी। वुड मेकेंजी के मुताबिक अगर महामारी पर काबू नहीं हुआ और बाज़ार वर्तमान से अधिक मंदी में चला गया तो 2023 तक बिजली का खर्च 1,000 TWh कम होगा जो इस पूरे क्षेत्र के दो साल की खपत के बराबर है।

साफ ऊर्जा सब्सिडी पर 2016-19 के बीच 35% गिरावट

भारत ने पिछले तीन साल में (2016-19) साफ ऊर्जा (सौर और पवन ऊर्जा आदि) प्रोजेक्ट में सब्सिडी 35% घटाई है। दो संस्थानों IISD और CEEW की एक रिसर्च में कहा गया है कि महामारी के बाद साफ ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ावा देना बहुत ज़रूरी होगा। CEEW के शोधकर्ता कहते हैं कि सोलर सेफगार्ड ड्यूटी और साफ ऊर्जा दरों पर नियंत्रण जैसे कदमों ने इस सेक्टर की ग्रोथ को प्रभावित किया है। जानकार कहते हैं कि अब जीवाश्म ईंधन को दी जा रही सब्सिडी खत्म करने और साफ ऊर्जा को बढ़ाने का वक्त है। इसी रिसर्च में कहा गया है कि इन तीन सालों में तेल और गैस में सब्सिडी 65% बढ़ाई गई है।

कोल फ्री पावर में ग्रेट ब्रिटेन ने बनाया रिकॉर्ड

ग्रेट ब्रिटेन पिछले 18 दिन से लगातार साफ ऊर्जा के इस्तेमाल पर ही निर्भर रहा। औद्योगिक क्रांति के बाद से यह पहली बार है कि इतने लम्बे समय बिना कोयले के ग्रेट ब्रिटेन अपनी बिजली की ज़रूरत पूरी करता रहा है। कोरोना बीमारी के कारण बिजली की घटी मांग और सौर ऊर्जा के अधिक उत्पादन से ग्रेट ब्रिटेन ने 4 जून 2019 को बना अपना  पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। 20 अप्रैल को यूके ने 9.6 GW बिजली उत्पादन के साथ नया रिकॉर्ड बनाया। अब से 3 साल पहले ब्रिटेन में 24 घंटे बिना कोयले के बिजली की मांग पूरा करने का रिकॉर्ड बना था।

जीएम मोटर्स 2023 से निर्भर होगा साफ ऊर्जा पर

दुनिया की सबसे बड़ी ऑटो-निर्माता कंपनियों में एक जीएम मोटर्स ने कहा है कि दक्षिण-पूर्व मिशिगन में उसकी सारी फैक्ट्रियां अगले 3 साल में साफ ऊर्जा पर चलने लगेंगी। अभी जीएम ने डीटीई-एनर्जी के एमआई ग्रीन पावर प्रोग्राम के तहत 500 गीगावॉट-घंटा सोलर पावर खरीदी है। डीटीई का कहना है कि इससे मिशिगन में साफ ऊर्जा क्षेत्र में 1,500 लोगों को रोज़गार मिलेगा।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

महामारी से बैटरी डाउन: भारत के ऑटो एलपीजी एसोसिएशन ने सरकार से कहा है कि फिलहाल वह पेट्रोल-डीज़ल के साथ एलपीजी पर चलने वाले ऑटो बाज़ार के बारे में ही सोचे। फोटो: Indiatimes

बैटरी वाहनों के विस्तार को टालने की मांग

इंडियन ऑटो एलपीजी एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि फिलहाल बैटरी वाहन सेक्टर का विस्तार टाल दिया जाये और इसकी जगह एलपीजी वाहनों पर ध्यान केंद्रित किया जाये जो कि वायु प्रदूषण कम करने की दिशा में एक दूसरा विकल्प है। फिलहाल ऑटो सेक्टर की हालत बहुत खराब है और मौजूदा लॉकडाउन के कारण नई कारों की मांग काफी घट गई है। इस वजह से पुर्ज़े बनाने वाली कंपनियों को हर रोज़ 1000-2000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। उधर भले ही ऑइल मार्केटिंग फर्म BSVI ईंधन बनाने लगी हों लेकिन नई BSVI गाड़ियां नहीं बिक रही हैं।

उधर बैटरी वाहन निर्माताओं के संगठन (SMEV) के मुताबिक साल 2019 में इलैक्ट्रिक टू-व्हीलर की बिक्री में 20.6% की बढ़त हुई है और कुल 1,56,000 इलैक्ट्रिक टू-व्हीलर बिके। बैटरी बसों की बिक्री में 50% वृद्धि हुई है जबकि इलैक्ट्रिक कारों की बिक्री 5% घटी। यह कमी थोक बिक्री न हो पाने से हुई है। इस साल कोरोना की मार के बाद अब 2021 भारत के बैटरी बाज़ार के लिये काफी महत्वपूर्ण होगा।

भारतीय छात्रों ने बनाया 1 लाख का ई-स्कूटर

तमिलनाडु के 6 मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्रों ने एक पेट्रोल स्कूटर को ई-स्कूटर में बदला है। यह स्कूटर एक बार चार्ज किये जाने पर 80 किलोमीटर चलता है और इसकी कीमत 1 लाख रूपये रखी गई है। इसका नाम फ्यूर्जो (Fuerzo) रखा गया है जो स्पेनिश शब्द है जिसका मतलब है फोर्स।  यह स्कूटर कुल 250 किलो तक भार ले जा सकता है और इसकी अधिकतम गति 35 किमी/घंटा है। इसे मात्र 20 रुपये में एक बार चार्ज किया जा सकता है। छात्रों का कहना है कि इसकी कीमत 60,000 से 70,000 तक लाई जा सकती है।

चीन: बैटरी वाहन सब्सिडी में इस साल 10% कटौती लेकिन छूट अब 2022 तक मिलेगी

चीनी सरकार ने तय किया है कि बैटरी वाहनों पर मिलने वाली सब्सिडी पर इस साल 10% की कटौती होगी। 23 अप्रैल से लागू यह फैसला उन वाहनों के लिये है जिनकी कीमत 3,00,000 युवान ($ 42,376) से कम है।  लेकिन इस कटौती के साथ ही चीन सरकार ने 2015 के उस फैसले को फिलहाल टाल दिया है जिसके तहत इस साल बैटरी वाहनों पर सब्सिडी बन्द की जानी थी। यह छूट अब 2022 तक जारी रहेगी।


जीवाश्म ईंधन

बिना जांचे मंज़ूरी: तेल और गैस के क्षेत्र में आने वाली नई कंपनियों को सेल्फ सर्टिफिकेशन की जो छूट दी जा रही है उसे लेकर गंभीर सवाल हैं। फोटो: India Public Sector

तेल और गैस निकालने के लिये कंपनियों को नियमों में ढील

सरकार ने तेल और गैस के क्षेत्र में आ रही नई कंपनियों को नियमों में ढील दी है। अगर ये कंपनियां तेल और गैस के नये भंडार ढूंढती हैं और उनके प्रयोग के नतीजे उस खोज को सत्यापित करते हैं तो वे सेल्फ सर्टिफिकेशन कर पायेंगी। सरकार का कहना है कि यह कदम बिजनेस को आसान करने के लिये है। सभी दस्तावेज़ जमा करने के 30 दिन के भीतर ये कंपनियां काम शुरू कर पायेंगी।

वैसे यह हैरान करने वाली बात है कि सेल्फ सर्टिफिकेशन के तहत बैंक गारंटी और इन्वारेंमेंटल इम्पेक्ट असेसमेंट (EIA) और आपदा प्लान को भी शामिल कर लिया गया है। यह फैसला ऐसे वक्त में किया गया है जब पूरे देश का ध्यान गंभीर महामारी से जूझने में लगा है। महत्वपूर्ण है कि इससे पहले कोयला खनन के लिये भी नियमों में इसी तरह ढील  दी गई थी जिनमें नये खिलाड़ियों पर कोई इस क्षेत्र में पूर्व अनुभव की शर्त नहीं थी।

ऑस्ट्रिया और स्वीडन ने बन्द किये कोयला बिजलीघर, जर्मनी की नज़र जियोथर्मल पर

ऑस्ट्रिया और जर्मनी यूरोपियन यूनियन के उन देशों में शामिल हो गये हैं जिन्होंने सभी कोयला बिजलीघर बन्द कर दिये हैं। ऑस्ट्रिया ने जीवाश्म ईंधन से पूरी तरह हटने की नीति के तहत 34 साल पुराना मेलाख (Mellach) पावर प्लांट बन्द किया जबकि इसका गैस पावर प्लांट जल्दी ही बन्द होगा।  स्वीडन ने भी अपना 31 साल पुराना वाख्तावर्क्या (Värtaverket) कोयला बिजलीघर बन्द कर दिया। इसे तय समय से 2 साल पहले बन्द किया गया है। इसकी जगह साफ ऊर्जा  या रिसाइकिल्ड एनर्जी का इस्तेमाल किया जायेगा।

उधर जर्मनी कोयले का प्रयोग पूरी तरह बन्द करने की कोशिश कर रहा है और उसने नये  “कोल एक्ज़िट लॉ” का खाका जारी किया है। हीटिंग के लिये जर्मनी की नज़र अब जियो थर्मल एनर्जी पर है जिसमें धरती के सतह के भीतर मौजूद ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है।

तेल भंडारण उच्चतम स्तर पर, मांग न होने से LNG का बाज़ार तबाह

तेल का मांग कम और घटी कीमतों के कारण कई देशों ने सस्ता तेल खरीद कर भंडार बना लिया है। नई रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह जमा किया गया भंडार भी 3 महीने में इस्तेमाल हो जायेगा। अभी भी करीब 16 करोड़ टन के सुपरटेंकर समंदर में इंतज़ार कर रहे हैं जिनकी बिक्री नहीं हुई है और तेल की कीमतें अब भी औंधे मुंह गिरी हुई हैं। उधर एनएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) का बाज़ार भी ठंडा है और कीमतें उठने का नाम नहीं ले रही। अब शेल टोटल, शेवरॉन और एक्सॉन मोबिल जैसी बड़ी बड़ी कंपनियों के सामने खुद को खड़ा रखने का सवाल है जिन्होंने इस धंधे में अरबों डॉलर निवेश किये हैं।