हाहाकार के बीच सरकारी झुनझुना: सबको मिलेगा 2024 तक पीने का पानी

Editorial Team22 जून. 2019
पानी का अकाल: पानी की कमी भारत के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। सरकार खुद मानती है कि हर साल 2 लाख लोग पानी न मिलने से मर रहे हैं। फोटो – विकीमीडिया

पानी का अकाल: पानी की कमी भारत के लिये सबसे बड़ी चुनौती है। सरकार खुद मानती है कि हर साल 2 लाख लोग पानी न मिलने से मर रहे हैं। फोटो – विकीमीडिया


देश के तकरीबन हर हिस्से में पिछले दो महीनों में पानी के लिये हाहाकार मचा रहा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया है कि 2024 तक सारे घरों में पीने का पानी पहुंचेगा। पूरे देश में भूजल के स्तर में 54% तक गिरावट आई है। नीति आयोग ने कहा है कि अगले साल यानी 2020 तक 21 शहरों में ग्राउंड वाटर खत्म हो जायेगा।चेन्नई के सारे सरोवर सूख गये हैं और वहां लोगों के पास पानी नहीं है। सरकारी आंकड़े यह स्वीकार कर रहे हैं कि हर साल साफ पीने का पानी न मिलने से 2 लाख लोगों की मौत होती है और 2030 तक देश में पीने के पानी की मांग दोगुनी हो जायेगी।

2050 तक ‘कार्बन-न्यूट्रल’ के लक्ष्य पर यूरोपीय देशों में सहमति नहीं 

सितंबर में न्यूयॉर्क में हो रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पहले यूरोपीय यूनियन के बीच इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि 2050 तक EU के सभी देश कार्बन न्यूट्रल (यानी नेट ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन) होने का वादा करें या नहीं। इस मकसद को हासिल करने के लिये साफ ऊर्जा के उत्पादन को कई गुना बढ़ाने और जंगलों के क्षेत्रफल में विस्तार की ज़रूरत है। लेकिन कोयले के इस्तेमाल पर निर्भर चेक गणराज्य, एस्टोनिया, हंगरी और पोलैंड ने इस प्रस्ताव पर अडंगा लगा दिया।

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुट्रिस ने सभी देशों से 2030 के क्लाइमेट लक्ष्य को बढ़ाने की अपील की थी। अमेरिका और चीन के बाद यूरोपीय यूनियन का कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक है और ट्रांसपोर्ट, कृषि और निर्माण में बढ़ोतरी की वजह से उसका कार्बन इससे पहले इमीशन तेज़ी से बढ़ रहा है।

प्लास्टिक उत्पादन ने भी बढ़ाया 2018 में CO2 उत्सर्जन

विश्व बाज़ार में पिछले साल प्लास्टिक उत्पादन में उछाल भी CO2 गैस के उत्सर्जन में बढ़ोतरी के लिये ज़िम्मेदार रहा। यह बढ़ोतरी 2011 के बाद से अब तक सर्वाधिक थी। बीपी एनर्जी के विश्लेषण से पता चलता है कि चीन, भारत और अमेरिका का उत्सर्जन 2018 में सबसे अधिक रहा।

जंगल: केरल से अच्छी ख़बर पर अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य में पिछड़ा भारत

केंद्र सरकार पेरिस समझौते के तहत देश में जंगल लगाने के वादे में पिछड़ रही है। 2015 की पेरिस डील में भारत ने कहा है कि 2030 तक वह ढाई से तीन खरब टन कार्बन सोखने लायक जंगल (कार्बन सिंक) लगायेगा पर ऐसा होता नहीं दिख रहा। उधर केरल के एक छोटे से कस्बे कोडुंगलूर से थोड़ी उम्मीद जगी है जहां नगरपालिका ने तय किया है कि अगर आप कोडुंगलूर में अपना घर पंजीकृत करना चाहते हैं तो आपको आम और कटहल का एक-एक पेड़ लगाना पड़ेगा। कोडुंगलूर की नगरपालिका ने भवन निर्माण के साथ वृक्षारोपण पर नज़र रखने के लिये यह मुहिम चलाई है।

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