चेन्नई में सूखे का असर, जलाशयों में पानी निम्नतम स्तर पर

Editorial Team29 मई. 2019
सूखे की मार: चेन्नई में पानी को लिये त्राहि त्राहि मची है। जलाशयों में उपलब्ध पानी अपनी कुल सामान्य क्षमता का 1.3% ही बचा है। फोटो- याहू इंडिया

सूखे की मार: चेन्नई में पानी को लिये त्राहि त्राहि मची है। जलाशयों में उपलब्ध पानी अपनी कुल सामान्य क्षमता का 1.3% ही बचा है। फोटो- याहू इंडिया


चेन्नई के 4 सबसे अहम झीलों में जलस्तर बहुत घट गया है और यह पिछले 70 सालों के रिकॉर्ड किये गये सबसे खराब हालात हैं। द न्यूज़ मिनट में छपी ख़बर के मुताबिक इन जलाशयों में कुल क्षमता का केवल 1.3% पानी ही बचा है जो कि पिछले 74 साल में पांचवां निम्नतम स्तर है। चेन्नई मेट्रोपोलिटन वॉटर सप्लाई के आंकड़े कहते हैं कि चेम्बरामबक्कम झील में 3645 mcft (यूनिट) पानी संजोने की क्षमता है लेकिन वहां केवल 1 यूनिट पानी बचा है। यही हाल रेडचिल, पोंडी और चोलावरम जलाशयों का भी है।  

मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले सालों में सालाना बारिश में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। दूसरी ओर चेन्नई में बढ़ती आबादी और शहरीकरण की वजह से जलस्रोत नष्ट हुये हैं। भू-जल का बेतहाशा दोहन और वेटवैंड्स का खत्म होना भी बिगड़ते हालात के लिये ज़िम्मेदार है जिससे टैंकर माफिया का दबदबा बढ़ा है।

 अंटार्टिक में पिघलती बर्फ: नये खतरों की आहट 

उपग्रह से मिले आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि दक्षिणी ध्रुव (अंटार्टिक) में पिघलती बर्फ का संकट अब तक मिली जानकारियों से कहीं अधिक गहरा है। जियोफिज़कल रिसर्च लैटर नाम की पत्रिका में बताया गया है कि दक्षिणी ध्रुव पर बढ़ रहे तापमान की वजह से ग्लेशियर पिघल कर समंदर में जा रहे हैं और इस बदलाव की रफ्तार 1990 के मुकाबले 5 गुना हो गई है। 

अगर इसी तरह चलता रहा तो ध्रुव के पश्चिमी हिस्से की सारी बर्फ पिघल जायेगी। इससे समंदर का जल स्तर कई फुट बढ़ सकता है और कई तटीय शहर गायब हो जायेंगे।  

जलवायु संकट से ऑस्ट्रेलिया में गायब हो सकती हैं 26 देसी प्रजातियां 

ऑस्ट्रेलिया में यूनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड और ऑस्ट्रेलियन कंजर्वेशन फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर धरती का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो जैव विविधता से समृद्ध पर्वत श्रंखला ग्रेट डिवाइडिंग रेंज में जानवरों की 20 से अधिक प्रजातियां लुप्त हो जायेंगी। करीब 3500 किलोमीटर लंबी यह पर्वत श्रंखला पूर्वी तट से लगी है और इस अध्ययन के तहत क्षेत्र की 1062 प्रजातियों पर रिसर्च की गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि 2085 तक वैश्विक तापमान में 3.7 डिग्री तक बढ़ोतरी होगी जो इस क्षेत्र की 26 प्रजातियों को मिटा देगी।  

वन्य जीवन के खात्मे से छोटा हो रहा जानवरों और चिड़ियों का शरीर 

जंगलों और जंगली जानवरों के विनाश की वजह से अब वन्य प्राणियों का शरीर 25 प्रतिशत छोटा हो रहा है। नेचर कम्युनिकेशन में छपे शोध में यह बात कही गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि करीब 1000 स्तनधारी प्रजातियां और पक्षी मिटने की कगार पर हैं जिनमें राइनो और ईगल भी शामिल हैं। 2018 में प्रकाशित एक रिसर्च में कहा गया था कि पिछले 1,25,000 वर्षों में जंगली जानवरों का औसत आकार 14% छोटा हो गया है। इस नये शोध के मुताबिक अगले 100 सालों में इनके आकार में 25% कमी होगी।

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