भारत सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों का शून्य-उत्सर्जन, यानी ज़ीरो-एमिशन का दर्जा खत्म करने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित नियमों के तहत अब इलेक्ट्रिक वाहनों में होने वाली ऊर्जा खपत को भी गिना जाएगा। मसलन यह पता लगाया जाएगा कि एक ईवी को 100 किमी कवर करने में कितने किलोवाट-ऑवर (kWh) ऊर्जा खर्च होती है, फिर उसे 100 किमी में खपत होने वाली पेट्रोल की बराबर मात्रा में बदला जाएगा।
एक किलोवाट-ऑवर 3.6 मेगाजूल ऊर्जा के बराबर होता है, जबकि एक लीटर पेट्रोल में लगभग 35 मेगाजूल ऊर्जा होती है। इससे कंपनियों की कुल ऊर्जा खपत का आकलन किया जाएगा।
यह बदलाव कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी यानी सीएएफई मानकों के तहत होगा, जिन्हें ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत लागू किया जाता है। अभी कंपनियां इलेक्ट्रिक कार बेचकर सुपर क्रेडिट पाती हैं और ज्यादा प्रदूषण वाली पेट्रोल-डीजल कारों की भरपाई कर लेती हैं। सरकार चाहती है कि सभी वाहन अधिक एनर्जी-एफिशिएंट बनें।
स्टेलांटिस, लेम्बोर्गिनी ने ठंडे बस्ते में डाली ईवी योजना
वैश्विक ऑटो उद्योग में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। स्टेलांटिस (Stellantis) ने पिछले साल 22.3 अरब यूरो का शुद्ध घाटा दर्ज किया और इलेक्ट्रिक कारों की मांग कमजोर रहने को इसकी बड़ी वजह बताया। कंपनी अब पूरी तरह ईवी पर दांव लगाने के बजाय पेट्रोल-डीजल और हाइब्रिड मॉडलों पर फिर से जोर दे रही है। इसी तरह लेम्बोर्गिनी (Lamborghini) ने अपनी पूरी तरह इलेक्ट्रिक ‘लैंजाडोर’ परियोजना रोक दी है और वी8-वी12 इंजन वाली सुपरकारें जारी रखने का फैसला किया है।
प्लग-इन हाइब्रिड में बैटरी और पारंपरिक इंजन दोनों होते हैं। उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि सब्सिडी में कटौती, ऊंची लागत, बैटरी की महंगाई और धीमी ग्राहक स्वीकृति से ईवी क्षेत्र दबाव में है। कई देश अब उत्सर्जन लक्ष्यों में भी ढील दे रहे हैं।
2030 तक ईवी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चाहिए होगी 10 लाख करोड़ रुपए की फंडिंग
इंस्टिट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2020 से 2025 के बीच इलेक्ट्रिक परिवहन क्षेत्र में लगभग 2.23 लाख करोड़ रुपए निवेश किए। यह राशि विनिर्माण क्षमता, सरकारी प्रोत्साहन और पब्लिक चार्जिंग ढांचे पर खर्च हुई। लेकिन 2030 तक तय लक्ष्यों को पाने के लिए करीब 12.5 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है। यानी 10 लाख करोड़ रुपए से अधिक की कमी अभी बाकी है।
रिपोर्ट में एक ‘इंटीग्रेटेड फाइनेंसिंग प्लेटफार्म’ मंच का सुझाव दिया गया है। इसमें आंशिक क्रेडिट गारंटी, बैटरी-एज-ए-सर्विस और को-लेडिंग स्ट्रक्चर शामिल होगी, ताकि बैंकों का जोखिम घटे। क्रेडिट गारंटी का मतलब है कि कर्ज न चुकाने पर आंशिक सुरक्षा मिले। सरकार का लक्ष्य 2030 तक निजी कारों में 30 प्रतिशत और दो-तीन पहिया वाहनों में 80 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक की करना है।
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