केंद्र सरकार ने वन संरक्षण नियमों में बदलाव करते हुए निजी और सरकारी संस्थाओं को वन भूमि पर व्यावसायिक पौधरोपण और वनीकरण की अनुमति दे दी है। इसके तहत अब ऐसे प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (एनवायरमेंटल कंपनसेशन चार्ज) नहीं देना होगा। यह फैसला 2 जनवरी 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यों को भेजे पत्र के जरिए लागू किया गया।
नए नियमों के अनुसार, राज्य सरकार की मंजूरी, स्वीकृत वर्किंग प्लान और वन विभाग की निगरानी में किए गए पौधरोपण कार्यों को ‘वन गतिविधि’ माना जाएगा। इससे पहले ऐसे कार्यों को गैर-वन गतिविधि माना जाता था जिसके लिए नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) फीस तथा प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य था।
सरकार का कहना है कि यह बदलाव क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों में बहाली के प्रयासों में मदद करेगा और लकड़ी, कागज जैसे उत्पादों के आयात पर निर्भरता घटाएगा।
हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों और आदिवासी संगठनों ने चिंता जताई है कि इससे वनों की सुरक्षा कमजोर हो सकती है और व्यावसायिक हितों को बढ़ावा मिलेगा। उनका कहना है कि शुल्क छूट से संरक्षण के लिए मिलने वाला धन कम हो जाएगा और जवाबदेही पर सवाल खड़े होंगे।
9 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी में धकेल सकता है क्लाइमेट चेंज: रिपोर्ट
नेचर में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से गरीबी और असमानता में बड़ा इजाफा हो सकता है। अध्ययन में 130 देशों के पिछले एक दशक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के मुताबिक, तापमान बढ़ने से गरीबी दर में 0.63 से 1.18 प्रतिशत अंक तक वृद्धि हो सकती है। इससे 2030 तक दुनिया में 6.23 से 9.87 करोड़ और लोग गरीबी में जा सकते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि सब-सहारन अफ्रीका के देश इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे। कृषि पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाएं भी जलवायु बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाई गईं। नेचर में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से गरीबी और असमानता में बड़ा इजाफा हो सकता है। अध्ययन में 130 देशों के पिछले एक दशक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के मुताबिक, तापमान बढ़ने से गरीबी दर में 0.63 से 1.18 प्रतिशत अंक तक वृद्धि हो सकती है। इससे 2030 तक दुनिया में 6.23 से 9.87 करोड़ और लोग गरीबी में जा सकते हैं। रिपोर्ट बताती है कि सब-सहारन अफ्रीका के देश इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे। कृषि पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाएं भी जलवायु बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाई गईं।
कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025 का नया मसौदा जारी, पुरानी चिंताएं बरकरार
केंद्र सरकार ने पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल, 2025 का नया मसौदा जारी किया है। इसका उद्देश्य कीटनाशकों के निर्माण, आयात, बिक्री और उपयोग को नियंत्रित करना है। यह विधेयक 1968 के कीटनाशक कानून और नियमों की जगह लेगा।
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, नए मसौदे में धाराओं की संख्या 65 से घटाकर 55 कर दी गई है, लेकिन कई पुरानी कमियां अब भी बनी हुई हैं। विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों का कहना है कि नियमन, निगरानी और जवाबदेही को लेकर स्पष्टता नहीं है।
मसौदे में जोखिम ‘कम करने का प्रयास’ करने की बात कही गई है, जबकि पहले इसे सीधे ‘कम करने’ की मांग की गई थी। सरकार ने इसे किसान-केंद्रित कानून बताया है। हालांकि राज्यों को कीटनाशकों पर स्थायी प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं दिया गया है।
खनन पट्टों में तेजी के लिए सरकार ने एक ही वन सर्वे का निर्देश दिया
केंद्र सरकार ने खनन पट्टों की प्रक्रिया तेज करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को केवल एक ही वन सर्वे कराने का निर्देश दिया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि बार-बार किए जाने वाले सर्वे से देरी और अनावश्यक खर्च होता है। मंत्रालय ने 11 दिसंबर के पत्र में बताया कि अलग-अलग एजेंसियों और बोली लगाने वालों के सर्वे से खनन पट्टों के क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी। हालांकि विशेषज्ञों ने इस कदम की आलोचना की है। उनका कहना है कि हर सर्वे का उद्देश्य अलग होता है और एक संयुक्त सर्वे से कानूनी संरक्षण कमजोर पड़ सकता है।
आईपीसीसी समेत 66 वैश्विक निकायों से बाहर हुआ अमेरिका
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़े फैसले के तहत अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संधियों से बाहर निकाल लिया है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, इन संस्थाओं को अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ माना गया है। सूची में 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र और 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संगठन शामिल हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आईपीसीसी, आईयूसीएन, इरेना और कई यूएन एजेंसियां हैं।
अमेरिका ने यूएन जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन से भी हटने का फैसला किया है, जिससे वैश्विक जलवायु सहयोग पर असर पड़ सकता है। इस कदम से अमेरिका की भागीदारी और वित्तीय सहायता समाप्त होगी। विशेषज्ञों ने फैसले की आलोचना की है और इसे कानूनी चुनौती का विषय बताया है।
माधव गाडगिल का निधन, सन्नाटे में हुई अंतिम विदाई
प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् और पद्म भूषण से सम्मानित माधव गाडगिल का 7 जनवरी 2026 को पुणे में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ थे। उनका अंतिम संस्कार पुणे के वैकुंठ श्मशान घाट में राजकीय सम्मान के साथ हुआ, लेकिन अंतिम यात्रा बेहद शांत रही। इसमें केवल 40–50 लोग शामिल हुए और कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी मौजूद नहीं था।
कई लोगों ने इस सादगी भरी विदाई पर हैरानी जताई। लेखकों और सहयोगियों ने इसे समाज की उदासीनता बताया। माधव गाडगिल पश्चिमी घाट विशेषज्ञ समिति के प्रमुख रहे और जैव विविधता संरक्षण व सतत विकास के लिए आजीवन कार्य किया। उनका निधन भारतीय पर्यावरण आंदोलन के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
कार्बनकॉपी हिंदी में आपका स्वागत है।
आपको यह भी पसंद आ सकता हैं
-
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली मामले में अपने ही निर्णय पर रोक लगाई, नई समिति गठित करने का आदेश
-
भारत अपनी नीतियों को निर्धारित करने के लिए वैश्विक जलवायु या प्रदूषण रैंकिंग पर निर्भर नहीं: सरकार
-
कॉप30 में भारत का कड़ा संदेश: क्लाइमेट जस्टिस के बिना कोई समझौता नहीं
-
फाइनेंस पर विवाद के बीच शुरू हुआ कॉप30 महासम्मेलन
-
क्लाइमेट एक्शन में देरी कर रहे हैं देश: यूएन रिपोर्ट
