आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, क्लाइमेट एक्शन अब केवल पर्यावरण से जुड़ा अतिरिक्त मुद्दा नहीं है बल्कि भारत की विकास रणनीति का मूल हिस्सा बन चुका है। सर्वे में कहा गया है कि ग्लोबल नार्थ के देश अपने जलवायु वादों पर ढिलाई बरत रहे हैं, ऐसे में भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास की उपलब्धियां प्रभावित न हों। भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर वैश्विक औसत से कम है, फिर भी जलवायु परिवर्तन आजीविका, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा करता है। सर्वे के मुताबिक, अनुकूलन (एडॉप्टेशन) भारत की जलवायु नीति का केंद्र है, जिसे सार्वजनिक निवेश और समुदाय आधारित प्रयासों से आगे बढ़ाया जा रहा है। साथ ही, वित्त और तकनीक के पर्याप्त वैश्विक सहयोग के बिना उत्सर्जन कटौती की महत्वाकांक्षा बढ़ाना न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत।
एनर्जी ट्रांज़िशन: क्रिटिकल मिनरल्स बने नए रणनीतिक ‘चोकपॉइंट’
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि वैश्विक ऊर्जा ट्रांज़िशन अब केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण से तय हो रहा है। तांबा, लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मैटेरियल लो-कार्बन अर्थव्यवस्था के लिए नए ‘रणनीतिक चोकपॉइंट’ बन गए हैं। इंडोनेशिया, कांगो और चिली में खनन बाधाओं के कारण तांबे की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। सर्वे ने चेताया कि विकसित देशों द्वारा मानक और प्रमाणन लागू करने से विकासशील देशों के लिए लागत बढ़ सकती है और वे केवल कच्चे माल का निर्यातक बनकर रह सकते हैं। भारत ने राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के जरिए घरेलू क्षमता और वैश्विक सहयोग के संतुलन पर जोर दिया है।
तात्कालिक जोखिम के तौर पर जलवायु संकट की प्राथमिकता घटी: डब्ल्यूईएफ
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, बढ़ते जिओ-पॉलिटिकल और जिओ-इकोनॉमिक तनावों के कारण चरम मौसम और जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों को अब तात्कालिक वैश्विक जोखिम के तौर पर वरीयता नहीं दी जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव से संवेदनशील देशों के लिए जलवायु वित्त और अनुकूलन सहायता धीमी पड़ सकती है। हालांकि, दीर्घकाल में जलवायु परिवर्तन अब भी दुनिया का सबसे गंभीर जोखिम बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा अगले दशक में पार हो सकती है, जिससे हीटवेव, सूखा और जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। मल्टीपोलर वैश्विक व्यवस्था और संरक्षणवाद के कारण पर्यावरणीय मुद्दों पर वैश्विक सहयोग कमजोर पड़ रहा है।
कमजोर क्लाइमेट डिस्क्लोजर के कारण वैश्विक पूंजी से वंचित रह सकती हैं भारतीय कंपनियां: रिपोर्ट
एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) व्यवस्था वैश्विक अंतरराष्ट्रीय सस्टेनेबिलिटी मानक बोर्ड (आईएसएसबी) के ढांचे के अनुरूप नहीं है। इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कंपनियों के क्लाइमेट डिस्क्लोज़र (वे जानकारियां जिनमें कंपनियां अपने कार्बन उत्सर्जन, जलवायु जोखिम और उन्हें कम करने की योजनाओं को सार्वजनिक करती हैं) सामान्य और असंगठित बने रहे तो उन्हें पूंजी जुटाने में दिक्कत आ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नेट-जीरो लक्ष्यों की विश्वसनीयता के लिए स्पष्ट, मानकीकृत और भविष्य-उन्मुख रिपोर्टिंग जरूरी है। हालांकि बीआरएसआर में सामाजिक पहलुओं पर जोर दिया गया है, लेकिन जलवायु ट्रांज़िशन योजना से जुड़े अहम तत्व इसमें कमजोर पाए गए हैं।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
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