थीम पार्क नहीं, प्राकृतिक वन संरक्षण है शहरों में बढ़ती गर्मी का उपाय

Hridayesh Joshi18 जून. 2026
थीम पार्क नहीं, प्राकृतिक वन संरक्षण है शहरों में बढ़ती गर्मी का उपाय

दृश्य श्रेय: रिद्धि टंडन


इस साल फरवरी में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि उनकी सरकार अगले पांच वर्षों में राज्य के ग्रीन कवर को बढ़ाने के लिए 300 करोड़ पेड़ लगाएगी -- यानी हर साल औसतन 60 करोड़ पेड़ लगाए जाएंगे। ऐसे बड़े वादे करने वाले फडणवीस अकेले नेता नहीं हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी दावा किया है कि पिछले नौ सालों में राज्य में 240 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए हैं। इसी तरह की महत्वाकांक्षी घोषणाएं हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना से भी आई हैं।

जब दुनिया भर में तापमान बढ़ रहा है और भारत दुनिया के सबसे गर्म शहरों का केंद्र बन गया है, ऐसी घोषणाएं अच्छी मंशा वाली और उम्मीद जगाने वाली लगती हैं। भारत ने 2024 में सबसे भीषण हीटवेव दौरों में से एक का सामना किया। खासकर उत्तर और मध्य भारत में अत्यधिक गर्मी पड़ी। राजस्थान में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में भी खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। विशेषज्ञ अब चेतावनी दे रहे हैं कि 2026 की गर्मी इससे भी ज्यादा गंभीर हो सकती है, क्योंकि संभावित सुपर एल नीनो के कारण सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या युद्ध स्तर पर पेड़ लगाने के अभियान वास्तव में इस समस्या का समाधान कर सकते हैं?

दिल्ली सरकार ने भी वर्षों से कई बड़े वादे किए हैं, जिनमें चार साल में 2.5 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य शामिल है। वर्तमान सरकार ने 17 नए शहरी वन विकसित करने और मियावाकी तकनीक के जरिए घने हरित क्षेत्र बनाने की योजना की घोषणा की है। यह तकनीक तेजी से छोटे-छोटे घने जंगल तैयार करने के लिए जानी जाती है।

केवल सरकार ही नहीं, मुंबई जैसे भीड़भाड़ वाले शहरों के निजी रियल एस्टेट डेवलपर भी इसी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब भारत के शहरी क्षेत्रों और मौजूदा जंगलों का बड़ा हिस्सा लगातार क्षरण, विखंडन और अतिक्रमण का सामना कर रहा है।

पौधारोपण और प्राकृतिक जंगल समान नहीं

पर्यावरणविदों और शहरी पारिस्थितिकी विशेषज्ञों का कहना है कि 'पौधारोपण' (प्लांटेशन) और प्राकृतिक रूप से विकसित जंगल (नेचुरल फॉरेस्ट) समान नहीं हैं। एक प्राकृतिक जंगल कई दशकों में विकसित होता है, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करता है, जैव-विविधता को सहारा देता है और भीषण गर्मी से बचाव का मजबूत साधन बनता है।

इसके विपरीत, अधिकांश पौधारोपण अभियान केवल संख्या पर केंद्रित होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में बढ़ती हीटवेव और अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट (यानी शहरी क्षेत्रों का तापमान आसपास के ग्रामीण या उपनगरीय इलाकों की तुलना में कहीं अधिक होना) कहीं गहरे पर्यावरणीय संकट के लक्षण हैं। अनियोजित शहरीकरण, प्राकृतिक इकोसिस्टम का सिकुड़ना और शहरों तथा जलवायु के पारस्परिक प्रभाव की खराब समझ इसकी मुख्य वजहें हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार असली समाधान अधिक पौधे लगाना नहीं, बल्कि बचे हुए प्राकृतिक जंगलों की रक्षा करना और नष्ट हो चुकी वनभूमि को फिर से प्राकृतिक बनाना है। साथ ही सफलता का पैमाना 'कितने पेड़ लगाए गए' की बजाय 'कितने इकोसिस्टम बचाए गए' होना चाहिए।

महानगरों में बढ़ता अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट

पिछले कुछ वर्षों में देश के अत्यधिक शहरी इलाकों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक पाया गया है। इसे अर्बन हीट आइलैंड (यूएचआई) प्रभाव कहा जाता है। इस स्थिति में शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से 1 से 7 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो सकता है। इसकी वजह घनी इमारतें, कम हरियाली और मानवीय गतिविधियां हैं। दिन के समय शहर अधिक सौर ऊर्जा सोखते हैं और रात में धीरे-धीरे रिलीज़ करते हैं, जिससे वे ज्यादा गर्म बने रहते हैं।

आज दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में लगभग सभी भारत में हैं। दिल्ली-स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 57 प्रतिशत जिले अधिक या बहुत अधिक हीट रिस्क पर हैं। इन जिलों में देश की 76 प्रतिशत आबादी रहती है।

दिल्ली भी इस समस्या का सामना कर रही है। एक अध्ययन के अनुसार राजधानी के कुछ शहरी इलाकों का औसत तापमान आसपास के क्षेत्रों से 2 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है।

दिल्ली-एनसीआर में लगातार कंस्ट्रक्शन, रिज क्षेत्र के जंगलों और फ्लडप्लेन इकोलॉजी के क्षरण के कारण तापमान वास्तविक से अधिक महसूस होता है। जबकि दूसरी ओर मुंबई में हीट स्ट्रेस बढ़ने के कारण हैं तटीय नमी और मैंग्रोव फॉरेस्ट का विनाश, जिसके कारण गर्मी अधिक देर तक बनी रहती है और बाढ़ का खतरा भी बढ़ता है। कभी 'गार्डन सिटी' कहलाने वाला बेंगलुरु झीलों और पेड़ों के नुकसान का सामना कर रहा है। चेन्नई और हैदराबाद में भी तेज शहरी विस्तार के कारण भूमि की सतह का तापमान बढ़ा है।

एक अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली में हीटवेव की घटनाएं कोलकाता, चेन्नई और मुंबई की तुलना में क्रमशः 26.31%, 31.58% और 63.16% अधिक हैं। हालांकि शोध में यह भी कहा गया कि दूसरे महानगरों के मुकाबले कम आर्द्रता (नमी) के कारण दिल्ली में तापमान अधिक होने के बावजूद अत्यधिक हीट स्ट्रेस का खतरा अपेक्षाकृत कम है।

लेकिन जलवायु परिवर्तन इस अंतर को भी खत्म कर रहा है। बारिश के पैटर्न अनियमित हो रहे हैं और गर्मियों में हीटवेव के दौरान होने वाली हल्की बारिश राहत तो देती है लेकिन नमी भी बढ़ाती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अधिक गर्मी और बढ़ती नमी के इस मिलेजुले असर से वेट-बल्ब तापमान बढ़ता है -- यह इंसानी शरीर के कूलिंग सिस्टम (पसीने के सूखने) को मापने का पैमाना है।

दिल्ली में आयोजित इंडिया हीट समिट में सेंटर फॉर एटमॉस्फियरिक साइंसेज के प्रोफेसर डॉ. कृष्णा आच्युतराव ने बताया कि "आर्द्र हीटवेव" (Wet Heatwaves) कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं, खासतौर पर उनके लिए जो सीधे धूप में काम करते हैं। 

यह चेतावनी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 सुपर एल नीनो वर्ष बन सकता है, जिससे तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है और देश के बड़े हिस्सों में कम बारिश तथा लंबी अवधि की भीषण गर्मी देखने को मिल सकती है।

जंगलों का क्षरण बढ़ा रहा है चिंता

जलाशयों और प्राकृतिक जंगलों का संरक्षण तापमान नियंत्रित करने और हीटवेव के प्रभाव को कम करने का सबसे प्रभावी और प्राकृतिक तरीका है। लेकिन भारत के महानगर न केवल जल संकट का सामना कर रहे हैं, बल्कि प्राकृतिक जंगलों के विनाश और क्षरण से भी जूझ रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023 के पहले के 15 सालों में दिल्ली में विकास कार्यों के लिए 100 हेक्टेयर से अधिक वनभूमि का उपयोग किया गया और लगभग 400 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण है। मार्च 2026 में दिल्ली सरकार ने पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील सेंट्रल रिज क्षेत्र में 'तीर्थंकर वन, ऋतु वन, राशि वन और पंचवटी वन' आदि विशेष वन विकसित करने के लिए निविदा जारी की। इस प्रस्ताव को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि प्राकृतिक रूप से विकसित रिज जंगलों को थीम-आधारित पार्कों में बदलना दिल्ली की प्राकृतिक कूलिंग प्रणाली को और कमजोर कर सकता है।

दिल्ली के लगभग 860 हेक्टेयर में फैले सेंट्रल रिज का एक बड़ा हिस्सा पहले ही विलायती कीकर, सुबबूल और गाजर घास जैसी आक्रामक प्रजातियों से प्रभावित है। अध्ययनों में पाया गया है कि प्राकृतिक वातावरण में उगने वाले स्थानीय पेड़ तापमान कम करने में मदद करते हैं, जबकि ये आक्रामक प्रजातियां बहुत कम पारिस्थितिक लाभ देती हैं।

उपरोक्त वन विकसित करने की योजना के तहत दिल्ली सरकार ने मिट्टी को दीमकों से बचाने के लिए लिंडेन (Lindane) और क्लोरपाइरीफोस (Chlorpyrifos) नामक दो कीटनाशकों के इस्तेमाल की भी योजना बनाई थी। हालांकि, पारिस्थितिकीविदों द्वारा चिंता जताए जाने के बाद सरकार ने इन कीटनाशकों के उपयोग का प्रस्ताव वापस ले लिया। इसके बावजूद, लगभग पांच करोड़ रुपए की परियोजना के तहत रिज क्षेत्र में थीम-आधारित वन विकसित करने का काम जारी रहेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि कीटनाशकों के इस्तेमाल का प्रस्ताव वापस लेना स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन सरकार को नए थीम पार्क बनाने के बजाय रिज क्षेत्र से आक्रामक प्रजातियों को हटाकर प्राकृतिक जंगल को विकसित होने देना चाहिए।

प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् और 'ट्रीज ऑफ़ डेल्ही' पुस्तक के लेखक प्रदीप कृष्णन का कहना है कि ब्रिटिश काल में तेजी से हरियाली लाने के लिए विलायती कीकर लगाए गए थे। उस समय उन्हें अंदाजा नहीं था कि आगे चलकर यह प्रजाति इतनी बड़ी समस्या बन जाएगी।

कृष्णन ने कार्बनकॉपी से कहा:  "वन संरक्षकों को सदैव ऐसी प्रजातियों की तलाश रही है जो कम पानी और कम देखभाल में जीवित रह सकें। औपनिवेशिक काल से यही होता आया है। लेकिन आज असली चुनौती रिज की प्राकृतिक इकोलॉजी को बहाल करने की है। इसके लिए पारिस्थितिकी की गहरी समझ जरूरी है, जो दुर्भाग्यवश वन विभाग के पास नहीं है।"

कृष्णन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कई पुनर्स्थापन समितियों के सदस्य हैं। 

राजस्थान और हरियाणा में पारिस्थितिक पुनर्स्थापन तथा रीवाइल्डिंग (प्राकृतिक स्वरूप में वापसी) पर व्यापक काम कर चुके कृष्णन का कहना है कि दिल्ली पिछली एक सदी से रिज को 'हरा-भरा' बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन बार-बार असफल रही है क्योंकि गलत तरीकों से अनुपयुक्त प्रजातियां लगाई गईं।

उन्होंने कहा, "सबसे दुखद बात यह है कि हम आज भी यह नहीं समझ पाए हैं कि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन का मतलब केवल पेड़ लगाना नहीं है। इसके लिए भूमि, मिट्टी, जल तंत्र और स्थानीय पारिस्थितिकी को समझना जरूरी है।"

विशेषज्ञों के अनुसार, 'स्थानीय (नेटिव) पेड़' का मतलब केवल किसी शहर में मूल रूप से पाया जाने वाला पेड़ नहीं होता, बल्कि ऐसा पेड़ होता है जो किसी विशेष लैंडस्केप और उसके पर्यावरणीय हालात के अनुरूप विकसित हुआ हो। कृष्णन बताते हैं कि दिल्ली में ही चार अलग-अलग प्रकार के प्राकृतिक आवास (हैबिटैट) मौजूद हैं, लेकिन वन विभाग ऐसा व्यवहार करता है मानो एक ही पौधारोपण फार्मूला हर जगह लागू हो सकता है।

उनके शब्दों में यह 'इकोलॉजिकल रीस्टोरेशन' नहीं, बल्कि 'इकोलॉजिकल कन्फ्यूज़न' है।

प्रकृति इतिहास लेखक प्रणय लाल का कहना है कि दिल्ली जैसे शहरों में अनियंत्रित कंक्रीटीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार ने निस्संदेह अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव को बढ़ाया है। लेकिन वे चेतावनी देते हैं कि दिखावटी हरियाली और थीम-आधारित पार्क वास्तविक पारिस्थितिक योजना का विकल्प नहीं हो सकते।

उनके अनुसार, अत्यधिक लैंडस्केपिंग और सलीके से तैयार किए गए कृत्रिम पौधारोपण उन प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों को नुकसान पहुंचा सकते हैं जो पहले से ही शहरों के तापमान को नियंत्रित करने में मदद कर रहे हैं।

लाल ने कहा, "शहरी बुनियादी ढांचे की योजना केवल कंक्रीट के विस्तार को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, भूविज्ञान और जलवायु के व्यवहार को समझकर बनाई जानी चाहिए। शहरों में पानी सोखने वाली सतहें, आर्द्रभूमियों की सुरक्षा, स्थानीय वनस्पति का संरक्षण, हवा के प्राकृतिक मार्गों को बचाना और यह समझना जरूरी है कि गर्मी कैसे फैलती है और कहां ट्रैप होती है। अन्यथा, त्वरित हरियाली का मौजूदा तरीका केवल एक अस्थायी मरहम है, जबकि शहर बढ़ती गर्मी के कारण लगातार नुकसान झेलता रहेगा।"

पारिस्थितिक पुनर्स्थापन विशेषज्ञ और रीवाइल्डर विजय धस्माना दिल्ली की सेंट्रल रिज के हिस्सों को थीम-आधारित पार्कों में बदलने के विचार का कड़ा विरोध करते हैं। उनका कहना है कि रिज कोई खाली शहरी भूमि नहीं है जिसे फिर से डिजाइन करने की जरूरत हो, बल्कि यह एक सदी पुराना वन इकोसिस्टम है, जहां वर्षों की पारिस्थितिक क्षति और आक्रामक प्रजातियों के दबाव के बावजूद स्थानीय पेड़-पौधे, झाड़ियां और बेलें धीरे-धीरे विकसित हुई हैं।

धस्माना ने कहा: "देश में तेजी से फैल रही यह प्रवृत्ति हरियाली और विरासत को लेकर एक भ्रामक सोच का परिणाम है। हम तेजी से जैव-विविधता खो रहे हैं और देश को सबसे ज्यादा जरूरत अपने प्राकृतिक वन क्षेत्रों और जंगलों की सख्त सुरक्षा की है। थीम-आधारित उद्यान हमारे तेजी से नष्ट हो रहे मूल जंगलों और जैव-विविधता से ध्यान भटकाते हैं, जबकि तापमान और हीटवेव के प्रभाव को नियंत्रित करने में इन्हीं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।"

केवल दिल्ली नहीं, पूरे देश की समस्या

दिल्ली के अलावा देहरादून, नोएडा और मुंबई जैसे शहरों में भी प्राकृतिक जंगलों को थीम पार्क या अन्य परियोजनाओं में बदलने का विरोध हो रहा है। देहरादून में नागरिक समूहों ने राष्ट्रपति एस्टेट क्षेत्र के जंगल में प्रस्तावित 282 करोड़ रुपए के मनोरंजन पार्क का विरोध किया

'सिटिज़न्स फ्रॉम ग्रीन दून' की इरा चौहान ने कहा कि देहरादून में बढ़ता कंक्रीटीकरण और स्थानीय हरियाली का खत्म होना 'अर्बन हीट आइलैंड' के असर को बढ़ा रहा है, जिससे जैव-विविधता और जीवन की गुणवत्ता, दोनों पर बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि भले ही जनता को भरोसा दिलाया गया था कि सिर्फ़ कुछ ही पेड़ काटे जाएंगे, लेकिन शहर के आखिरी घने हरे-भरे इलाकों में से एक में असल में बहुत ज़्यादा पेड़ काट दिए गए; और यह सब तब हुआ जब हाल ही में भीषण हीटवेव के कारण देहरादून में स्कूल बंद करने पड़े थे। 

इसी तरह मुंबई और उसके आसपास कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण जंगलों, आर्द्रभूमियों और मैंग्रोवों को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

पर्यावरण संगठन वनशक्ति के निदेशक स्टालिन डी कहते हैं: "आने वाले सालों में मुंबई, पुणे और नवी मुंबई, सभी की हालत बहुत खराब होने वाली है। वैश्विक तापमान बढ़ने के समय पेड़ काटना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमने न सिर्फ़ अपने शहरों को, बल्कि गांवों को भी उजाड़ने का काम शुरू कर दिया है। मुंबई में अब सिर्फ़ शहर में ही नहीं, बल्कि आस-पास के लगभग 100 किलोमीटर के दायरे में जंगल काटे जा रहे हैं।"

मियावाकी तकनीक: एक अस्थायी समाधान

तेजी से शहरीकरण के कारण कई शहरों में बड़े पैमाने पर पौधारोपण के लिए पर्याप्त खाली जमीन ही नहीं बची है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण, कम होती खुली जगहों और लगातार बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण शहर में अब क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भी बहुत कम जगह बची है, जबकि मेट्रो लाइनों, हाईवे और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स के लिए हज़ारों पेड़ काटे जा चुके हैं।

ऐसे में वन विभाग और शहरी एजेंसियां मियावाकी पद्धति को तेजी से अपना रही हैं। यह तकनीक जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी ने विकसित की थी। इसमें छोटे क्षेत्र में बहुत घने तरीके से पौधे लगाए जाते हैं ताकि जल्दी से छोटा जंगल तैयार हो सके। सरकारें और कंपनियां अक्सर इस पद्धति से वृक्षारोपण को शहरों में घटती हरियाली का एक असरदार समाधान बताती हैं, क्योंकि यह तेज़ी से बढ़ते हैं और कम समय में ही साफ़ नतीजे दिखाते हैं।

हालांकि कई पारिस्थितिकीविदों का कहना है कि मियावाकी जंगल अक्सर केवल दिखावटी हरियाली और सरकारी आंकड़ों को बेहतर दिखाने का साधन बन जाते हैं। वे प्राकृतिक जंगलों का विकल्प नहीं हो सकते, क्योंकि असली जंगल दशकों में विकसित होते हैं और जटिल जैव-विविधता को सहारा देते हैं।

प्रणय लाल कहते हैं: "मियावाकी प्लांटेशन को पर्यावरण बहाल करने का एक शॉर्टकट माना जा रहा है, क्योंकि सरकारें और सीएसआर प्रोजेक्ट्स एक साल के अंदर ही हरियाली देखना चाहते हैं। लेकिन जंगल सीधी कतार में खड़े सैनिकों की तरह नहीं उगते। असली जंगल बहुस्तरीय, असमान और पारिस्थितिक रूप से जटिल होते हैं। आप सौ सालों में इकोसिस्टम को बर्बाद करके यह उम्मीद नहीं कर सकते कि घने दिखावटी पेड़-पौधे लगाकर उन्हें रातों-रात फिर से बहाल कर लेंगे।"

जानकारों का कहना है कि तेज़ी से पेड़ लगाने के तरीकों पर बढ़ती निर्भरता शहरी प्लानिंग के एक गहरे संकट को भी दिखाती है, जहां मौजूदा जंगलों और बड़े पेड़ों को बचाने की तुलना में पेड़ लगाने के नए लक्ष्य तय करने को ज़्यादा अहमियत दी जाती है।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि हीटवेव से निपटने के लिए केवल पेड़ लगाना या पार्क बनाना पर्याप्त नहीं होगा।

उनके अनुसार जरूरी कदम हैं:

  • प्राकृतिक जंगलों और जलाशयों का संरक्षण।
  • स्थानीय (नेटिव) प्रजातियों पर आधारित हरित क्षेत्र विकसित करना।
  • सस्टेनेबल निर्माण सामग्री का उपयोग।
  • ऊर्जा संरक्षण भवन मानकों को लागू करना।
  • पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के अनुकूल शहर बनाना।
  • सार्वजनिक परिवहन और अंतिम-मील कनेक्टिविटी को मजबूत करना।
  • नालों और जल निकायों को प्राकृतिक रूप में बहाल करना।
  • यमुना जैसी नदियों की सफाई और उनके आसपास की वनस्पति की रक्षा।
  • कंक्रीट वाले क्षेत्रों को कम कर मिट्टी और पौधों को प्राकृतिक रूप से विकसित होने देना।

सीईईडब्ल्यू में क्लाइमेट रेजिलिएंस टीम का नेतृत्व करने वाले विश्वास चितले ने कहा कि शहरी वन, बगीचे और जलाशय स्थानीय स्तर पर तापमान कम करने में मदद जरूर करते हैं, लेकिन यह भी सोचना होगा कि शहरी क्षेत्रों का निर्माण और प्रबंधन किस तरह किया जा रहा है। इसके लिए संरचनात्मक स्तर पर बड़े बदलावों की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, "अगर शहर में हरियाली, बगीचे, शहरी वन या जलाशय हैं तो वे निश्चित रूप से कुछ हद तक ठंडक प्रदान करते हैं, लेकिन केवल इतना पर्याप्त नहीं हो सकता। दीर्घकालिक और प्रभावी समाधान के लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सस्टेनेबल निर्माण सामग्री का उपयोग हो और ऊर्जा संरक्षण भवन संहिताओं (Energy Conservation Building Codes) को लागू किया जाए। यह बेहद महत्वपूर्ण है।"

प्रणय लाल का कहना है कि यदि शहरों को हीटवेव की चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना करना है तो शहरी पारिस्थितिकी और गर्मी के व्यवहार के विज्ञान को कहीं अधिक गहराई से समझने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा: "आप केवल कुछ पेड़ लगाकर या सजावटी जलाशय बनाकर हीटवेव से नहीं लड़ सकते। अर्बन हीट आइलैंड केवल शहरी नियोजन की समस्या नहीं, बल्कि अर्थ साइंस से जुड़ा मुद्दा भी है। इसमें मिट्टी की नमी, चट्टानों का खुला क्षेत्र, हवा का प्रवाह, गर्मी का अवशोषण और शहरों की संरचना जैसी कई चीजें शामिल हैं। कई शहरों में पार्क और झीलें होने के बावजूद भीषण गर्मी पड़ती है क्योंकि उनके गहरे पारिस्थितिक और भूवैज्ञानिक तंत्रों की अनदेखी की गई है।"

धस्माना भी इसी तरह की राय रखते हैं। उनका कहना है कि दिल्ली को रहने योग्य शहर बनाने के लिए केवल पौधारोपण अभियान पर्याप्त नहीं हैं।

उन्होंने कहा: "सबसे पहले हमारी सड़कों को पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। शहर में सार्वजनिक परिवहन और अंतिम-मील कनेक्टिविटी (लास्ट-माइल कनेक्टिविटी) को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए, जिसकी फिलहाल कमी है। हमें अपने प्राकृतिक क्षेत्रों को प्राकृतिक ही रहने देना चाहिए और यदि कोई हस्तक्षेप करना भी हो, तो वह ऐसा पारिस्थितिक पुनर्स्थापन हो जो भूमि के मूल प्राकृतिक आवासों और भू-दृश्य की विशेषताओं के अनुरूप हो।"

धस्माना का तर्क है कि दिल्ली का मौजूदा शहरी नियोजन मॉडल भी बढ़ते तापमान के लिए जिम्मेदार है। उनके अनुसार, नालों और जलाशयों को ढंक देने से प्राकृतिक शीतलन प्रणाली बाधित होती है और शहरी गर्मी बढ़ती है। उनका सुझाव है कि ढंके हुए नालों को फिर से खोला जाए और उन्हें केवल सीवर चैनल की तरह देखने के बजाय जैव विविधता गलियारों (बायोडायवर्सिटी कॉरिडोर) में बदला जाए।

उन्होंने कहा: "अपशिष्ट जल का प्रभावी ढंग से उपचार किया जाए और उसे नालों में बहने दिया जाए। यमुना को साफ किया जाए और उसके आसपास की वनस्पति को फलने-फूलने का अवसर दिया जाए। शहर की बड़ी भूमि क्रिकेट मैदानों और अन्य गतिविधियों के अधीन है। सार्वजनिक उद्यानों और हरित सुविधाओं का जल ऑडिट किया जाना चाहिए। जहां भी अत्यधिक पक्की या सीमेंटेड सतहें हैं, उन्हें खोला जाए ताकि धरती सांस ले सके और वहां पौधे प्राकृतिक रूप से विकसित हो सकें।"

वहीं प्रदीप कृष्णन का कहना है कि शहरों के भीतर स्वस्थ और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली न केवल गर्मी के दबाव को कम करने में, बल्कि वायु गुणवत्ता सुधारने और भूजल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, उन्होंने ऐसी दिखावटी हरित परियोजनाओं के खिलाफ चेतावनी दी जो पारिस्थितिक पुनर्स्थापन की बजाय थीम-आधारित लैंडस्केपिंग को प्राथमिकता देती हैं।

उन्होंने कहा: "ऋतु वन या राशि वन जैसी परियोजनाएं सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन यदि वे रिज की प्राकृतिक पारिस्थितिकी की अनदेखी करती हैं, तो वे केवल दिखावटी अभ्यास बनकर रह जाती हैं। रिज को थीम आधारित उद्यानों की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर किए गए पारिस्थितिक पुनर्स्थापन की जरूरत है।"

कृष्णन का मानना है कि यदि पारिस्थितिक पुनर्स्थापन सही तरीके से किया जाए, तो दिल्ली की रिज दुनिया के सामने एक अनोखा शहरी पारिस्थितिक मॉडल बन सकती है।

उन्होंने कहा: "यदि इसे सही ढंग से बहाल किया जाए, तो दिल्ली की रिज दुनिया के उन दुर्लभ उदाहरणों में शामिल हो सकती है जहां किसी राष्ट्रीय राजधानी के भीतर एक प्राकृतिक शुष्क जंगल फल-फूल रहा हो। इससे गर्मी का दबाव कम होगा, वायु गुणवत्ता बेहतर होगी और जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन समस्या यह है कि संबंधित अधिकारियों को न तो यह पता है कि इसे सही तरीके से कैसे किया जाए और न ही वे यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।"

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