
जलवायु संकट की मार: विश्व के सबसे महंगे आपदाओं की सच्चाई, भारत-पाक रिपोर्ट में दिखा स्थानीय विनाश
वर्ष 2025 जलवायु आपदाओं के हिसाब से इतिहास का एक सबसे महंगा और विनाशकारी साल बन गया है। वर्ष भर में तेज हवाएं, दुर्लभ साइक्लोन, बाढ़ और भीषण जंगल की आग जैसी घटनाओं ने विश्व स्तर पर नुकसान को 120 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंचा दिया, और यह आंकड़ा केवल बीमे का तहत कवर हानि है — वास्तविक लागत कहीं अधिक मानी जा रही है।
क्रिस्चियन एड की नई वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण-पूर्व एशिया में साइक्लोन और बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ली और अरबों डॉलर का नुकसान किया, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलिफोर्निया की जंगल आग से सैकड़ों की मौत और भारी आर्थिक तबाही हुई। चीन में बाढ़ से हजारों विस्थापित हुए और अरबों डॉलर का नुकसान हुआ।
रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि प्रदूषण और जीवाश्म ईंधन का उपयोग लगातार आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ा रहा है, और विकसित देशों के बजाय विकासशील देशों पर इसके विनाशकारी सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़े हैं। दुनिया भर में लाखों लोग घरों, रोजगार और भविष्य खो चुके हैं, जिन्हें बीमा कवरेज में भी नहीं गिना जाता।
वैश्विक नेताओं ने कॉप30 में अनुकूलन निधियों को बढ़ाने पर सहमति जताई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है और वैश्विक स्तर पर स्थायी कार्बन उत्सर्जन में कटौती और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता समाप्त करने के कदम जरूरी हैं। इस रिपोर्ट को भारत-पाकिस्तान के नजरिए से देखा जाये तो हिमालय और मानसून बेल्ट में वर्ष 2025 की बाढ़ और प्रतिकूल मौसम की स्थिति ने इस क्षेत्र को सबसे अधिक प्रभावित किया है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापक मानसून बाढ़ और भारी बारिश की घटनाओं ने संयुक्त रूप से लगभग 5 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान किया, और इन घटनाओं में 1,800 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई। यह दक्षिण एशियाई मानसून की बदलती चरित्र का सीधा परिणाम है, जिसने पारंपरिक कृषि अवधि और जल संसाधनों को बंटाधार कर दिया। इन जलवायु आपदाओं ने स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे को तहस-नहस किया, हजारों लोगों को विस्थापित किया और सरकारी तथा समुदाय स्तर पर पुनर्निर्माण की लागत को भारी बोझ बना दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर तत्काल नियंत्रण और अनुकूलन रणनीतियां नहीं अपनाई गईं, तो इसी तरह की घटनाएं आने वाले वर्षों में और अधिक विनाशकारी होंगी।
लातूर की झीलों में दिखे दुर्लभ प्रवासी पक्षी, मराठवाड़ा में इको-टूरिज़्म को नई उड़ान
लातूर ज़िले की रेनापुर तहसील स्थित पांगांव और कमखेड़ा झीलों में इन दिनों दुर्लभ प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल पहली बार यहां 60 से अधिक बार-हेडेड गीज़ और छह कॉमन क्रेन दर्ज किए गए हैं। बार-हेडेड गीज़ मंगोलिया-रूस सीमा से हिमालय पार कर आती हैं, जबकि कॉमन क्रेन अफगानिस्तान और यूरोप से लंबी उड़ान भरकर भारत पहुंचती हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि ये पक्षी हर साल सर्दियों में मध्य एशिया और साइबेरिया से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर भारत के मीठे पानी वाले झीलों में विश्राम और भोजन के लिए आते हैं। बार-हेडेड गीज़ अपनी ऊँचाई पर उड़ान की क्षमता के लिए जानी जाती है, जबकि कॉमन क्रेन इस क्षेत्र में दुर्लभ शीतकालीन अतिथि मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों में जल उपलब्धता में सुधार, पर्याप्त भोजन और मानव गतिविधियों में कमी से इन पक्षियों के लिए अनुकूल माहौल बना है।
यह दृश्य न केवल स्थानीय पर्यावरण के लिए उत्साहजनक है बल्कि मराठवाड़ा को प्रवासी पक्षी पर्यटन के नए केंद्र के रूप में उभरने का संकेत भी देता है। प्राणीशास्त्र विभाग के विशेषज्ञों ने बताया कि यह घटना स्थानीय जलाशयों की सेहत और पारिस्थितिक संतुलन में सुधार का प्रमाण है। साथ ही, झीलों में रड्डी शेलडक (चक्रवाक), नॉर्दर्न शोवलर, नॉर्दर्न पिंटेल और टफ्टेड डक जैसी अन्य प्रवासी प्रजातियों की उपस्थिति ने इस क्षेत्र की जैव-विविधता की समृद्धि को और बढ़ा दिया है।
लोणार झील का बढ़ता जलस्तर निगल रहा है प्राचीन मंदिर, आईआईटी बॉम्बे करेगा रहस्य की जांच
महाराष्ट्र की विश्वप्रसिद्ध लोणार झील में जलस्तर में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने यहां कई प्राचीन मंदिरों को पानी में डुबो दिया है, जिससे संरक्षण और वैज्ञानिक समुदाय में चिंता गहराती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से जारी यह असामान्य घटना अब गंभीर रूप ले चुकी है, जिसके बाद प्रशासन ने आईआईटी बॉम्बे के विशेषज्ञों को कारणों की जांच के लिए जोड़ा है।
करीब 50,000 वर्ष पहले उल्का पिंड के टकराने से बनी यह झील बुलढाणा ज़िले में स्थित है और इसे रामसर साइट यानी अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि घोषित किया गया है। खारे और क्षारीय जल की यह झील अपने अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जानी जाती है, लेकिन अब यही तंत्र संकट में है। झील के किनारे स्थित कमलजा देवी मंदिर समेत कई प्राचीन मंदिर अब आंशिक रूप से जलमग्न हो चुके हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारियों के अनुसार, झील के निचले किनारे पर करीब 15 मंदिर हैं, जिनमें से कई खतरे में हैं। गैमुख मंदिर से निकलने वाले प्राकृतिक झरने से लगातार झील में पानी पहुंच रहा है, वहीं हाल के वर्षों में बदलते वर्षा पैटर्न, क्लाउडबर्स्ट और झील के आसपास सक्रिय झरनों ने जलस्तर और बढ़ा दिया है। पुरातत्वविद् अरुण मलिक का कहना है कि आरक्षित वन घोषित होने के बाद झील के आसपास की वनस्पति और मिट्टी में हुए बदलावों से जलधारण क्षमता बढ़ी है, जिससे झील का सूक्ष्म पर्यावरण प्रभावित हुआ है।
जिला कलेक्टर किरण पाटिल ने बताया कि झील में कोई कृत्रिम जल प्रवाह नहीं है और जलस्तर में वृद्धि प्राकृतिक कारणों से हो रही है। आईआईटी बॉम्बे की टीम जल के नमूनों का विश्लेषण कर रही है ताकि रासायनिक और पर्यावरणीय कारणों की पहचान की जा सके।
प्रशासन ने कमलजा मंदिर के चारों ओर सुरक्षात्मक दीवार और प्लेटफॉर्म बनाने की योजना तैयार की है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं — अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह दुर्लभ भूवैज्ञानिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थायी क्षति झेल सकती है।
ग्लेशियर लुप्त होने की दर मध्य-सदी में अपने चरम पर पहुंचेगी, तापमान वृद्धि ने बढ़ाई जलवायु संकट की भयावहता
एक नए वैश्विक अध्ययन ने संकेत दिया है कि दुनिया में ग्लेशियर लुप्त होने की दर इस सदी के मध्य यानी 2041 से 2055 के बीच अपने चरम पर पहुंच जाएगी।
नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित शोध के मुताबिक, अगर वैश्विक तापमान वृद्धि +1.5°C तक सीमित रहती है, तो उस समय लगभग 2,000 ग्लेशियर प्रति वर्ष गायब हो सकते हैं, जबकि यदि तापमान वृद्धि +4.0°C तक बढ़ती है, तो यह संख्या बढ़कर लगभग 4,000 ग्लेशियर प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है, जो यूरोपीय आल्प्स के सभी ग्लेशियरों के समान हो जाता है।
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि ग्लेशियर को ‘लुप्त’ तब माना जाता है जब उसका आकार 0.01 वर्ग किमी से कम हो जाए या उसकी मात्रा उसके प्रारंभिक मान का 1 प्रतिशत से भी नीचे गिर जाए। इस शोध के अनुसार दुनिया भर में अब लगभग 2,10,000 ग्लेशियर मौजूद हैं और इनमें से एक तिहाई ग्लेशियर हाई-माउंटेन एशिया में स्थित हैं। यह क्षेत्र मध्य-सदी में ग्लेशियर लुप्त होने की वैश्विक तेज़ी का प्रमुख योगदान देता है।
क्षेत्रों में अंतर इस बात के कारण है कि कुछ जगह छोटे और तेजी से प्रतिक्रिया देने वाले ग्लेशियर पहले ही बड़े पैमाने पर गायब हो रहे हैं, जबकि बड़े ग्लेशियरों का क्रमिक पतन बाद में होता है। अध्ययन ने स्पष्ट किया है कि ग्लेशियरों का यह उत्थान-पतन केवल इस सदी में ही नहीं रुकेगा, बल्कि 2100 के बाद भी ग्लेशियरों की महत्वपूर्ण हानि जारी रहेगी, जिससे कई ग्लेशियर 22वीं सदी में भी समाप्त होंगे। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को +1.5°C तक सीमित नहीं किया गया, तो सदी के अंत तक केवल कुछ ही ग्लेशियर बच पाएंगे, और अत्यधिक तापमान वृद्धि के परिदृश्यों में अधिकांश ग्लेशियरों के गायब होने की संभावनाएं और अधिक गंभीर होंगी।
ग्लेशियरों के समापन का यह संकट ना केवल पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर गहरा प्रभाव डालता है, बल्कि व्यापक रूप से जल संसाधनों, समुद्र तल वृद्धि और स्थानीय समुदायों की जीविका पर भी दीर्घकालिक खतरे पैदा करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक नीति में तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने अरावली मामले में अपने ही निर्णय पर रोक लगाई, नई समिति गठित करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों के विवादित फैसले पर बड़ा कदम उठाया है और 20 नवंबर 2025 के अपने ही आदेश को लागू होने से रोक दिया है, जब उसने अरावली रेंज की नई परिभाषा को मंजूरी दी थी। यह रोक सोमवार को तब लगी जब शीर्ष न्यायालय ने समीक्षा की जरूरत जताई और मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 तक स्थगित कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पहले से तैयार विशेषज्ञ रिपोर्ट और इसके आदेश को तब तक लागू नहीं किया जाएगा जब तक नई विशेषज्ञ समिति गठित होकर विस्तृत अध्ययन नहीं कर लेती। पहले के फैसले में अदालत ने अरावली पहाड़ियों को परिभाषित करने के लिए एक मानदंड अपनाया था, जिसके तहत 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले भूभाग को ही अरावली का हिस्सा माना जाना था। इस नए मानदंड के कारण विवाद बढ़ गया क्योंकि इससे अरावली के अधिकांश क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकते थे और खनन तथा अन्य गतिविधियों के लिए खुले रहने की स्थिति बन सकती थी। पर्यावरण विशेषज्ञों, स्थानीय समूहों और विपक्षी दलों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की थी, यह दावा करते हुए कि इससे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को खतरा होगा।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा है कि स्पष्टता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ परिभाषा और नीति तैयार नहीं होने तक पहले के आदेश तथा रिपोर्ट को लागू नहीं किया जाएगा। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं कि वे नई समिति के गठन में सहयोग करें और उसे आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराएं, ताकि अरावली की भूमिका, सीमा और संरक्षण संबंधी मुद्दों पर विस्तृत अध्ययन हो सके। अगली सुनवाई जनवरी में होगी, जब नई समिति की दिशा और रिपोर्टिंग टाइमलाइन पर फैसला आएगा।
इस विकास से केंद्रित विवाद एक नए मोड़ पर पहुंच गया है, और पर्यावरण संरक्षण, भूमि उपयोग नियम और खनन नीति जैसे मुद्दों पर नवीनीकरण की संभावनाएं खुलती दिख रही हैं।
नेपाल सरकार ने एवरेस्ट से कचरा नीचे की लाने की योजना बंद की
नेपाल सरकार ने माउंट एवरेस्ट पर कचरा कम करने के लिए लागू की गई एक योजना को खत्म करने का फैसला किया है। अधिकारियों ने माना है कि यह योजना दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर प्रदूषण रोकने में असफल रही।
यह नीति 11 साल पहले शुरू की गई थी। इसके तहत पर्वतारोहियों से 4,000 डॉलर जमा कराए जाते थे, जो उन्हें तभी वापस किए जाते थे जब वह कम से कम 8 किलोग्राम कचरा और अपशिष्ट नीचे लाते थे। इस योजना का उद्देश्य एवरेस्ट पर मौजूद अनुमानित 50 टन कचरे को कम करना था। लेकिन अधिकारियों के अनुसार इससे कोई ठोस परिणाम नहीं मिला।
अधिकारियों ने बताया कि अधिकतर जमा राशि लौटाई गई, जिससे लगता है कि पर्वतारोहियों ने नियमों का पालन किया। हालांकि, जो कचरा वापस लाया गया, वह अधिकतर निचले शिविरों का था। ऊपरी शिविरों में पड़ा कचरा, जैसे टेंट, खाने के डिब्बे और कैन, वहीं छोड़ दिया गया। मॉनिटरिंग व्यवस्था भी कमजोर रही और केवल एक ही चेकपॉइंट मौजूद था।
नई योजना के तहत अब रिफंड-योग्य जमा राशि की जगह 4,000 डॉलर का गैर-वापसी योग्य स्वच्छता शुल्क लिया जाएगा। इस राशि का उपयोग नए चेकपॉइंट, पर्वत रेंजर और नियमित सफाई कार्यों के लिए किया जाएगा। यह कदम पर्वतारोहियों की बढ़ती संख्या और बढ़ते कचरे को देखते हुए पांच वर्षीय वर्कप्लान के तहत उठाया जा रहा है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
देश के सबसे दुर्लभ पक्षियों में शामिल ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) के संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। 19 दिसंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने राजस्थान और गुजरात में गोडावण या सोन चिरैया की सुरक्षा से जुड़ी विशेषज्ञ समिति की अधिकांश सिफारिशों को मंजूरी दे दी है।
अदालत ने राजस्थान में गोडावण के लिए प्राथमिक संरक्षण क्षेत्र को संशोधित कर 14,013 वर्ग किलोमीटर और गुजरात में 740 वर्ग किलोमीटर तय किया है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन क्षेत्रों में गोडावण की तुरंत निगरानी शुरू की जाए और जलवायु परिवर्तन का इस पक्षी पर क्या असर पड़ रहा है, इसका अध्ययन भी किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क के दक्षिण में पावर कॉरिडोर को लेकर समिति की सिफारिश को मंजूरी दे दी है। इसके तहत पार्क की दक्षिणी सीमा से कम से कम 5 किलोमीटर दूर और अधिकतम 5 किलोमीटर चौड़ाई का गलियारा बनाया जाएगा। साथ ही, बस्तियों के आसपास 100 मीटर के दायरे में 11 केवी या उससे कम क्षमता की मौजूदा और भविष्य की बिजली लाइनों के लिए शमन उपाय जरूरी नहीं होंगे, इस सुझाव को भी अदालत ने मंजूर कर लिया है।
एआई-आधारित सिस्टम ने रेलवे ट्रैक पर हाथियों की जान बचाई
उत्तर-पूर्व सीमांत रेलवे (एनएफआर) ज़ोन में रेलवे पटरियों के किनारे लगाए गए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम से 2025 में 160 से अधिक हाथियों की जान बचाई गई है। रेलवे अधिकारियों ने इसे वन्यजीव संरक्षण में बड़ी सफलता बताया है।
यह इंट्रूज़न डिटेक्शन सिस्टम सेंसर और ध्वनि उपकरणों की मदद से पटरियों के पास हाथियों की मौजूदगी पहचानता है। हाथी दिखते ही लोको पायलट, स्टेशन मास्टर और कंट्रोल रूम को तुरंत अलर्ट भेजा जाता है, जिससे ट्रेन की गति कम की जा सके।
यह सिस्टम असम, उत्तर बंगाल और उत्तर-पूर्व के 140 किलोमीटर से अधिक उच्च-जोखिम वाले मार्गों पर लगाया गया है। अच्छे नतीजों के बाद रेलवे इसे अन्य संवेदनशील इलाकों में भी विस्तार देने की योजना बना रहा है।
दिल्ली सरकार ने राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसका उद्देश्य गंभीर वायु गुणवत्ता संकट का वैज्ञानिक और प्रभावी समाधान निकालना है। यह समिति सरकार की पांच-स्तरीय प्रदूषण नियंत्रण रणनीति का मुख्य हिस्सा है, जिसमें नवाचार, धूल और ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कमी और लंबे समय तक सफाई व हरियाली बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं।
सरकार ने तेज़ निर्णय कार्यान्वयन के लिए इम्प्लीमेंटेशन कमेटी भी बनाई है, ताकि विशेषज्ञ सुझावों को जल्दी तथ्य-प्रधान कार्रवाई में बदला जा सके। इन बैठकों का लक्ष्य न केवल प्रदूषण से तात्कालिक लड़ाई है, बल्कि हवा की गुणवत्ता को स्थायी रूप से बेहतर बनाना भी है।प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘गंभीर’ श्रेणी में दर्ज हुआ है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ गए हैं और सरकारी कदमों की ज़रूरत और स्पष्ट हो गई है।
दिल्ली की जहरीली हवा अब मानसिक स्वास्थ्य पर हमला: विशेषज्ञों की चेतावनी
दिल्ली की लगातार बिगड़ती हवा अब केवल फेफड़ों ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल रही है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक रहने से बच्चों में IQ स्तर कम होना, याददाश्त कमजोर पड़ना और एडीएचडी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
एमोनीड्स की मनोचिकित्सक डॉ. अंचल मिगलानी ने कहा कि हवा में मौजूद जहरीले तत्व अवसाद, चिंता, नींद की समस्या और संज्ञानात्मक विकास में रुकावट पैदा करते हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के लोगों में डिप्रेशन और एंग्जायटी के मामले उन शहरों से 30-40% अधिक हैं, जहां एक्यूआई स्तर बेहतर है
मनोवैज्ञानिक फिज़ा खान ने कहा कि ‘प्रदूषण केवल फेफड़ों का नहीं, दिमाग का भी मसला है।’ धुंधले आसमान और कम दृश्यता के दिनों में लोग चिड़चिड़ापन, थकान और उदासी महसूस करते हैं। लगातार ‘खराब हवा’ के माहौल से क्रॉनिक स्ट्रेस और सामाजिक अलगाव बढ़ता है
एम्स की डॉ. दीपिका दहीमा ने इसे “मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल” बताया और कहा कि स्वच्छ हवा अब भावनात्मक और संज्ञानात्मक सुरक्षा का सवाल बन चुकी है। विशेषज्ञों ने सरकार से मानसिक स्वास्थ्य को पर्यावरण नीति का हिस्सा बनाने की अपील की है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर 40% प्रदूषण की बात मानी नितिन गडकरी ने, कहा राजधानी की हवा से दो दिन में हो जाता है संक्रमण
दिल्ली की जहरीली हवा पर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि राजधानी की वायु प्रदूषण समस्या में परिवहन क्षेत्र का योगदान लगभग 40 प्रतिशत है।
नई दिल्ली में My Idea of Nation First – Redefining Unalloyed Nationalism पुस्तक के विमोचन समारोह में गडकरी ने कहा कि दिल्ली में मात्र दो दिन रुकने के बाद ही उन्हें संक्रमण हो जाता है। उन्होंने सवाल उठाया, “मैं दिल्ली में सिर्फ दो दिन रुकता हूं और बीमार पड़ जाता हूं, आखिर राजधानी इतनी प्रदूषित क्यों है?”
गडकरी ने कहा, “मैं परिवहन मंत्री हूं, और 40% प्रदूषण हमारे कारण होता है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि देश हर साल 22 लाख करोड़ रुपये जीवाश्म ईंधनों के आयात पर खर्च कर रहा है, जो न केवल आर्थिक नुकसान है बल्कि पर्यावरण को भी प्रदूषित कर रहा है। उन्होंने कहा, “सच्चा राष्ट्रवाद आयात घटाने और निर्यात बढ़ाने में है। जब हम इतना पैसा खर्च कर अपने ही देश की हवा खराब कर रहे हैं, तो यह कैसी देशभक्ति है?”
इस बीच दिल्ली के कई हिस्सों में घना धुंध और स्मॉग छाया हुआ है। आईटीओ क्षेत्र में मंगलवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 374 दर्ज किया गया, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है।
कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) ने दिल्ली-एनसीआर में ग्रैप स्टेज-IV के सभी उपाय लागू कर दिए हैं। विपक्ष ने संसद में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की, जबकि सरकार ने कहा कि विपक्षी दलों के हंगामे के कारण चर्चा नहीं हो पाई।
इंदौर में दूषित पानी से हड़कंप: 7 की मौत, जांच के आदेश
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में दूषित पानी से बीमारी फैलने का मामला सामने आया है। शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में डायरिया से अबतक सात लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 149 से अधिक लोग बीमार पड़ चुके हैं। प्रशासन ने पूरे इलाके से पीने के पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे हैं और रिपोर्ट 48 घंटे में आने की उम्मीद है। इस बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जिला प्रशासन को सभी मरीजों के लिए बेहतर इलाज सुनिश्चित करने और जलस्रोतों की आपात समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ माधव प्रसाद हसानी ने बताया कि सभी मरीजों को उल्टी और दस्त की शिकायत थी। उन्होंने कहा कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और नमूने जांच के लिए भेज दिए गए हैं।
जिलाधिकारी शिवम वर्मा ने बताया कि मरीजों को 27 अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।
वहीं स्थानीय लोगों का आरोप है कि दूषित पानी पीने से बीते एक हफ्ते में कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई है, जिनमें छह महिलाएं शामिल हैं।
अधिकारियों के अनुसार, मुख्यमंत्री के निर्देश पर नगर निगम ने कड़ी कार्रवाई करते हुए भागीरथपुरा में तैनात एक जोनल अधिकारी और एक सहायक अभियंता को तत्काल निलंबित कर दिया है, जबकि प्रभारी सब-इंजीनियर की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। नगर आयुक्त दिलीप कुमार यादव ने बताया कि मुख्य जल आपूर्ति पाइपलाइन में रिसाव पाया गया, जिसके ऊपर शौचालय बना हुआ था, जिससे पीने का पानी दूषित होने की आशंका है।
भारत ने 2025 में जोड़ी 50 गीगावाट अक्षय ऊर्जा, हासिल किया ऐतिहासिक लक्ष्य
भारत ने 2025 में करीब 50 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी है। इसके साथ ही देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा अब गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का हो गया है। यह लक्ष्य भारत ने अपने पेरिस समझौते (2015) के तहत तय 2030 की समयसीमा से पांच वर्ष पहले प्राप्त कर लिया है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि जनवरी से नवंबर 2025 के बीच करीब 45 गीगावाट क्षमता जोड़ी गई, जिसमें से 35 गीगावाट सौर ऊर्जा से जुड़ी थी। वर्ष के अंत तक यह आंकड़ा 48–50 गीगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, “भारत का भविष्य उज्ज्वल है और यह नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित होगा।”
सरकार के मुताबिक इस तेजी के पीछे लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के निवेश की अहम भूमिका रही। उद्योग अनुमान के अनुसार, प्रति मेगावॉट 4 करोड़ रुपए की लागत से हर 50 गीगावाट के लिए लगभग यही निवेश आवश्यक होता है। भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (इरेडा) के अध्ययन के अनुसार, 2023 से 2030 के बीच भारत को अपने 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगभग 30.54 लाख करोड़ रुपए के निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें से अब तक 10.79 लाख करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है।
भंडारण (स्टोरेज) के क्षेत्र में भी 2025 में बड़ा सुधार देखने को मिला। सरकार द्वारा नई पूंजी सब्सिडी योजना की घोषणा के बाद स्टोरेज टेंडर और नीलामियों में तेज़ी आई। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेताया है कि नवीकरणीय ऊर्जा की तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी ने ग्रिड असंतुलन और ट्रांसमिशन देरी जैसी चुनौतियाँ पैदा की हैं – खासकर राजस्थान में परियोजनाओं के निष्पादन पर असर देखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गति 2026 में भी बनी रही, तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में एक अग्रणी शक्ति के रूप में उभरेगा।
नवीकरणीय ऊर्जा से वैश्विक स्तर पर गिर रही हैं बिजली की कीमतें: रिपोर्ट
एक नई रिपोर्ट के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा — जैसे सौर और पवन — बिजली उत्पादन का सबसे सस्ता स्रोत बनी हुई है। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रिड से जुड़ी 10 में से 9 नई नवीकरणीय परियोजनाएं सबसे सस्ते जीवाश्म ईंधन विकल्पों से भी कम लागत पर बिजली उत्पादन कर रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑनशोर पवन ऊर्जा दुनिया में सबसे सस्ती नई बिजली है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में, जहां पवन और सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी अधिक है, वहां घरेलू बिजली दरें औसत से कम हैं। हालांकि भारत में अभी कोयले पर निर्भरता अधिक बनी हुई है।
पीएम-कुसुम 2.0 की तैयारी में सरकार, फीडर सोलराइजेशन पर ध्यान
केंद्र सरकार यूनियन बजट 2026-27 से पहले पीएम-कुसुम 2.0 शुरू करने की तैयारी कर रही है, जिससे कृषि क्षेत्र में विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अधिकारियों ने बताया कि मौजूदा पीएम-कुसुम योजना मार्च 2026 में तय समय पर समाप्त होगी, हालांकि पहले से स्वीकृत परियोजनाओं को सहायता मिलती रहेगी। वर्तमान योजना के तहत 34,422 करोड़ रुपए का प्रावधान है, जिसके जरिए करीब 34,800 मेगावाट सौर क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। नवंबर तक 10,203 मेगावाट क्षमता स्थापित की जा चुकी है। लगातार मांग को देखते हुए सरकार पुरानी योजना के विस्तार के बजाय संशोधित लक्ष्यों और प्रोत्साहनों के साथ नई योजना लाने पर विचार कर रही है।
पीएम-कुसुम 2.0 में एग्रो-फोटोवोल्टाइक मॉडल और फीडर स्तर पर सोलराइजेशन पर अधिक जोर दिया जा सकता है, जिससे किसानों को दिन में भरोसेमंद बिजली मिल सकेगी।
वर्ष 2025 में चांदी की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है, और इसके पीछे केवल पारंपरिक मांग ही नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और सोलर ऊर्जा तकनीक का भी बड़ा हाथ है। जैसा कि पर्यावरण-अनुकूल टेक्नोलॉजी की ओर दुनिया तेजी से बढ़ रही है, चांदी अब सिर्फ गहनों तक सीमित नहीं रह गई बल्कि इसे ऊर्जा संक्रमण की महत्वपूर्ण धातु के रूप में देखा जा रहा है। इस बदलाव ने चांदी की कीमतों को रिकॉर्ड स्तर तक धकेल दिया है, खासकर जब सप्लाई उसके बढ़ते मांग का साथ नहीं दे पा रही है।
ईवी और सोलर पैनलों में चांदी का उपयोग बढ़ा है क्योंकि यह अत्यधिक बिजली चालकता और थर्मल गुणों के कारण इन तकनीकों के लिए अनिवार्य माना जाता है। हर EV और सोलर पैनल में इस्तेमाल होने वाली चांदी की मात्रा के कारण औद्योगिक मांग वर्ष 2025 में बहुत तेज़ी से बढ़ी है, जिससे बाजार में चांदी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है। इस समय अधिकांश चांदी ताम्बे, सीसा या जस्ता खानों के साथ एक सह-उत्पाद के रूप में निकलती है, इसलिए मांग बढ़ने के बावजूद उत्पादन को जल्दी बढ़ाना कठिन साबित हो रहा है।
दूसरी तरफ, पारंपरिक गहनों और निवेश के लिए भी चांदी की मांग स्थिर बनी हुई है, जिससे कुल मांग और भी ऊँची हो गई है। निवेशकों ने सुरक्षित परिसंपत्ति के रूप में चांदी की तरफ रुख किया है, खासकर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच, जिससे कीमतों में और मजबूती आई है।
विश्लेषकों का मानना है कि जब तक ईवी, सोलर और अन्य हरित तकनीकों की मांग ऐसे उच्च स्तर पर बनी रहेगी और उत्पादन विस्तार सप्लाई को नहीं पकड़ पाएगा, चांदी की कीमतें उच्च स्तर पर स्थिर या और बढ़ सकती हैं। मौजूदा हाल में चांदी अब सिर्फ पारंपरिक धातु नहीं बल्कि ऊर्जा संक्रमण और इलेक्ट्रिक भविष्य की एक रणनीतिक सामग्री बन रही है।
देशभर में 27,000 से अधिक ईवी चार्जिंग स्टेशन स्थापित, केंद्र सरकार का ‘ग्रीन मोबिलिटी’ मिशन तेज़
भारत सरकार ने देश में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। वर्ष 2025 में 27,000 से अधिक नए चार्जिंग स्टेशन पेट्रोल पंपों पर लगाए गए हैं, जिससे चार्जिंग नेटवर्क को मजबूत करते हुए देशभर में ईवी अपनाने की प्रक्रिया को गति मिली है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की वर्षांत रिपोर्ट के अनुसार, फेम-II योजना के तहत 8,932 चार्जिंग स्टेशन खुदरा ईंधन आउटलेट्स पर स्थापित किए गए। वहीं तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने अपने संसाधनों से 18,500 से अधिक चार्जिंग स्टेशन तैयार किए, जिससे कुल संख्या 27,432 हो गई। यह चार्जिंग नेटवर्क अब देश के प्रमुख शहरों, हाइवे कॉरिडोर और ग्रामीण इलाकों तक फैला है।
मंत्रालय ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां 2024-25 से 2028-29 के बीच 4,000 ‘एनर्जी स्टेशन’ स्थापित करेंगी, जहां पारंपरिक ईंधन (पेट्रोल-डीजल) के साथ बायोफ्यूल, सीएनजी, एलएनजी और इलेक्ट्रिक चार्जिंग सुविधाएं एक ही स्थान पर मिलेंगी। नवंबर 2025 तक ऐसे 1,064 ऊर्जा स्टेशन स्थापित किए जा चुके हैं।
बड़ी ट्रकों के लिए भी सरकार ने ‘अपना घर परियोजना’ के तहत 500 से अधिक विश्राम स्थल बनाए हैं, जिससे सड़क सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार दोनों को बल मिला है।
रिपोर्ट के अनुसार, एथनॉल मिश्रण दर 19.24% तक पहुंच गई है, जिससे अब तक 1.55 लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा बचत और कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा, डिजिटल भुगतान, स्वच्छ भारत मिशन और डोर-टू-डोर फ्यूल डिलीवरी जैसी पहलों ने पेट्रोलियम क्षेत्र में पारदर्शिता और सुविधा को और मजबूत किया है।
ईवी पर टैक्स छूट दिसंबर 2027 तक जारी रहेगी: तमिलनाडु सरकार
तमिलनाडु में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) पर मोटर वाहन कर में छूट दिसंबर 2027 तक जारी रहेगी। राज्य के उद्योग मंत्री टीआरबी राजा ने कहा कि यह फैसला मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने लिया है, जिससे ईवी एडॉप्शन, उनकी किफायती कीमत और बड़े पैमाने पर निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु मोटर वाहन कर अधिनियम, 1974 के तहत बैटरी चालित सभी परिवहन और गैर-परिवहन वाहनों को 1 जनवरी 2026 से 31 दिसंबर 2027 तक कर से पूरी तरह छूट दी गई है। मंत्री ने कहा कि 2025 में राज्य में ईवी अपनाने की दर 7.8 प्रतिशत रही, लेकिन चार्जिंग ढांचे और हरित आपूर्ति श्रृंखला को और मजबूत करने की जरूरत है।
2025 में जीवाश्म ईंधन से उत्सर्जन अपने उच्चतम स्तर पर
नवीनतम वैश्विक विश्लेषण में सामने आया है कि 2025 में जीवाश्म ईंधन से होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है। वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष उत्सर्जन लगभग 38.1 अरब टन CO₂ के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2024 की तुलना में करीब 1.1 प्रतिशत अधिक है। यह वैश्विक उत्सर्जन का उच्चतम स्तर है और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को और गंभीर बनाता है।
यह वृद्धि कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस के कठोर उपयोग से हो रही है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद दुनिया भर में ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम नहीं हो पाई है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि वर्तमान उत्सर्जन दर पर पृथ्वी को +1.5°C तापमान सीमा के भीतर रखने की संभावना समाप्त हो चुकी है, और बचा हुआ कार्बन बजट सिर्फ लगभग चार वर्षों के बराबर बचा है।
वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि वन और महासागर जैसी प्राकृतिक ‘कार्बन सिंक’ कमजोर हो रहे हैं, जिससे वायुमंडल में CO₂ की सांद्रता और तेजी से बढ़ रही है। यह संकेत देता है कि न केवल उत्सर्जन को कम करना आवश्यक है, बल्कि प्राकृतिक प्रणालियों की क्षमता को भी बहाल करना अनिवार्य है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि हाल के वर्षों में चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं में नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार हुआ, जिससे उत्सर्जन वृद्धि की दर अपेक्षाकृत धीमी रही। लेकिन यूएस और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन में वृद्धि जारी है, जिससे वैश्विक CO₂ स्तर और ऊपर जा रहा है।
विश्लेषण यह भी बताता है कि जीवन शैली, ऊर्जा खपत और वैश्विक नीतियों में बड़े बदलाव के बिना जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना कठिन होगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर उत्सर्जन इस तरह बढ़ता रहा, तो जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव और तीव्र होंगे, जिनका सामना दुनिया को अगली कुछ दशकों में करना पड़ेगा।
यूएन पर्यावरण रिपोर्ट पर विवाद: अमेरिका और अन्य देशों ने वैज्ञानिक निष्कर्षों को लगाया ‘हाइजैक’, जलवायु कार्रवाई पर प्रभाव की आशंका
संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार की गई वैश्विक पर्यावरण रिपोर्ट (GEO-7) को लेकर बड़ी राजनीतिक तनाव पैदा हो गया है, क्योंकि कुछ विकसित देशों, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, ने रिपोर्ट के वैज्ञानिक निष्कर्षों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। रिपोर्ट छह वर्षों में लगभग 287 वैज्ञानिकों ने विकसित की थी और इसमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता ह्रास, भूमि क्षरण, प्रदूषण और अनियंत्रित संसाधन खपत को एक साथ जोड़ा गया था, लेकिन राजनीतिक असहमति के कारण इसे “हाइजैक” किया गया बताया जा रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर धरती को खत्म हो रहे पर्यावरणीय संतुलन से बचाने के लिए कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से तेजी से मुक्त नहीं हुआ गया, तो जलवायु संकट और गंभीर रूप ले लेगा। लेकिन उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान अमेरिका, रूस और कुछ तेल-निर्माता देशों ने रिपोर्ट में शामिल कई आलोचनात्मक निष्कर्षों का समर्थन नहीं किया और सहमति-योग्य राजनीतिक सारांश तैयार नहीं होने दिया।
विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक समर्थन के बिना रिपोर्ट का प्रभाव कमज़ोर हो सकता है, क्योंकि सरकारें इस तरह की वैज्ञानिक रिपोर्ट से नीति-निर्धारण और अंतरराष्ट्रीय समझौतों में दिशा लेती हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की यह रिपोर्ट अब राजनीतिक मंजूरी के बिना ही प्रकाशित हुई है, जो पिछले इतिहास से अलग है, क्योंकि सामान्यतः ऐसे निष्कर्षों के वैज्ञानिक आधार के साथ ही औपचारिक सारांश भी शामिल होते थे।
रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर तत्काल कार्रवाई के लिए जीवाश्म ईंधनों के चरणबद्ध त्याग, प्रदूषण सहायता को समाप्त करना, और पारिस्थितिक-आधारित आर्थिक मॉडल अपनाने के सुझाव दिए गए हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर राजनीतिक लाभों और राष्ट्रीय हितों के चलते वैज्ञानिक साक्ष्य को नजरअंदाज किया जाता रहा, तो समुद्र के बढ़ते स्तर, चरम मौसम की घटनाएँ और जैव विविधता ह्रास जैसी समस्याएँ और तीव्र होंगी, जिनका सामना दुनिया को अगले दशक में करना पड़ेगा।






