थमने का नाम नहीं ले रही आपदायें

Newsletter - May 28, 2020

आपदाओं का चक्र: साल 2020 में आपदायें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कोरोना के साथ अब भीषण गर्मी के दौर में चक्रवात और टिड्डियों का संकट बड़ी परेशानी बनकर आया है | Photo: Orissa Post

थमने का नाम नहीं ले रही आपदायें

बुधवार को जहां राजधानी दिल्ली में तापमान 47 डिग्री के पार चला गया वहीं राजस्थान के चुरू में पारा 50 डिग्री तक पहुंच गया। भारत इस वक्त दुनिया का सबसे गर्म क्षेत्र है। आपदाओं के मौसम में कुदरत की मार किसी कोने से पीछा नहीं छोड़ रही। उत्तराखंड के जंगल फिर से जलने लगे हैं। हालांकि राज्य सरकार के प्रेस विभाग ने ट्वीट करके कहा कि जंगलों में आग की पुरानी तस्वीरें दिखाई जा रही हैं और हालात नियंत्रण में हैं लेकिन फिर भी 40 से अधिक आग की घटनाओं की ख़बर आ रही है और कहा जा रहा है कि 50 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्रफल इस वक्त जल रहा है। गर्मी और खुष्क मौसम आग को बढ़ाने में घी का काम करता है और अग्नि प्रबंधन पर सवाल खड़े होते रहे हैं। पिछले साल भी उत्तराखंड में आग की करीब 1,500 घटनायें हुईं जिसमें करीब 2000 हेक्टेयर वन भूमि तबाह हो गई थी।

उधर टिड्डियों के झुंड ने एक बार फिर से धावा बोल दिया। राजस्थान में तो टिड्डियों के झुंड छाये ही रहे 27 साल में पहली बार यूपी और मध्यप्रदेश में भी इनका प्रकोप दिखा। फिलहाल इनसे 8,000 करोड़ की दालों के अलावा दूसरी फसलों के तबाह होने का ख़तरा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और संगठन (एफएओ) का मानना है कि बरसात के बाद टिड्डियों के हमले और तेज़ होंगे  और भारत के इसे रोकने के लिये पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों के साथ बात करनी चाहिये क्योंकि यह झुंड वहीं से आते हैं। डीडब्लू हिन्दी में छपी एक ख़बर में बताया गया है कि किस तरह कोरोना संकट इन टिड्डियों के हमले के पीछे एक कारण है। इसके अलावा पूर्वी तट पर आये अम्फन तूफान से कोरोना महामारी के और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। लाखों की संख्या में लोगों को अपना घर छोड़कर राहत कैंपों में आना पड़ा जहां सामाजिक दूरी के नियमों का पालन आसान नहीं है।

अब चाहे चक्रवाती तूफान हो या टिड्डियों का हमला, ऐसे हालात पैदा होने और इन विकट परिस्थितियों के पीछे वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को एक बड़ा कारण बता रहे हैं। जहां आईपीसीसी जानकार पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग चक्रवाती तूफानों की संख्या और मारक क्षमता बढ़ायेगी वहीं  एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि बदलते क्लाइमेट के कारण टिड्डियों का प्रजनन सामान्य से 400 गुना अधिक हो रहा है। ऐसे में एक बार फिर साफ ऊर्जा की ओर बढ़ने और सादगी भरे लाइफ स्टाइल को अपनाने की ज़रूरत समझने की ज़रूरत है।


क्लाइमेट साइंस

फिर तबाही: अम्फान चक्रवाती तूफान ने पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में जमकर तबाही मचाई, कुल 100 से अधिक लोग मारे गये लाखों को घर छोड़ना पड़ा | Photo: Scroll

बंगाल में चक्रवाती तूफान अम्फान का कहर

भारत के पूर्वी तट पर आये चक्रवाती तूफान अम्फान में 100 से अधिक लोगों की जान चली गई।  इसमें कम से कम 86 लोगों की मौत भारत में हुई और 25 से अधिक बांग्लादेश में मारे गये। पिछले हफ्ते आये इस तूफान ने पश्चिम बंगाल में ज़िन्दगी अस्त-व्यस्त कर दी और लाखों बेघर हो गये। राज्य के 24 दक्षिण परगना में इसका सबसे अधिक असर हुआ जहां यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल सुंदरवन का इलाका है। अधिकारियों का कहना है कि इस चक्रवात की रफ्तार 150-160 किलोमीटर प्रतिघंटा थी और इससे 1.5 करोड़ लोग प्रभावित हुये हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि चक्रवातों की तीव्रता बढ़ने की वजह जलवायु परिवर्तन है। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से समंदर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है और ऐसे विनाशकारी तूफानों की मारक क्षमता और संख्या बढ़  रही है।

नया सिरदर्द, फिर टिड्डियों का हमला

जयपुर के आकाश में सोमवार को टिड्डियों के विशाल झुंड दिखाई दिये। राजस्थान के 33 में से आधे ज़िलों में इनका आतंक है। ये टिड्डियां अप्रैल में पाकिस्तान के रास्ते भारत में दाखिल हुईं। मध्य प्रदेश में भी टिड्डियों का पिछले 27 साल में सबसे बड़ा हमला हुआ है। जानकारों का कहना है कि इस हमले पर काबू नहीं पाया गया तो 8000 करोड़ की मूंग की फसल बर्बाद हो जायेगी। उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य भर के 17 ज़िलों में अलर्ट जारी कर दिया है।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने की सामान्य से ताकतवर तूफानों की भविष्यवाणी

अमेरिका में चक्रवाती तूफान को हैरिकेन कहा जाता है और साल का वह वक्त शुरू हो रहा है जब हैरिकेन महसूस किये जाते हैं। यहां नेशनल ओशिनिक एंड एटमोस्फिरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के जलवायु पर पूर्वानुमान करने वाले सेंटर ने कहा है कि इस साल जिन 13-19 तूफानों का नामकरण किया गया है वह सामान्य से अधिक तीव्रता वाले होंगे। सेंट्रल मिशिगन के इलाके में बाढ़ का पानी घटने के बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने आपातकाल की घोषणा कर दी है। यह पानी क्षेत्र के दो बांधों से निकल कर यहां भर गया था और हज़ारों लोगों को घरों से हटाना पड़ा। पानी रिहायशी इलाकों के अलावा रसायन बनाने वाली डाउ केमिकल्स के प्लांट में भी भर गया।


क्लाइमेट नीति

निजीकरण की ओर: सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश में बिजली वितरण का काम निजी कंपनियों को देने का फैसला किया। इस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं | Photo: New Indian Express

केंद्र शासित प्रदेशों में डिस्कॉम के निजीकरण से उठे सवाल

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए बताया कि सरकार ने केंद्र शासित प्रदेशों में बिजली वितरण को निजी कंपनियों को सौंपने का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि यह अन्य राज्यों के लिये भी एक आदर्श मॉडल बनेगा।

हालांकि जानकारों का कहना है कि किसी ठोस रणनीति के अभाव में इस तरह के कदम कामयाब नहीं होंगे क्योंकि ऐसी कोशिश पहले भी की गई है जिसमें निजी वितरण कंपनियों को बेल आउट पैकेज दिये गये। उधर रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भारत के पावर सेक्टर को स्टेबल से घटाकर अब निगेटिव में रख दिया है। रेटिंग गिराने के पीछे कंपनियों को भुगतान में देरी, बिजली की घटती मांग और सरकार द्वारा उपक्रमों से अधिक उपभोक्ताओं के  पक्ष में उठाये गये कदम मुख्य कारण  हैं।

पॉलिसी पर  खनन मंत्रालय को नीति आयोग की चेतावनी

सरकार के सबसे बड़े थिंकटैंक नीति आयोग ने खनन मंत्रालय को चेतावनी दी है कि वह तब तक कोई पॉलिसी बदलाव न करे जब तक खनन के सभी लंबित मामलों पर फैसला न ले लिया जाये। नीति आयोग का मानना है कि लटके मामलों पर फैसला न लेने से निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है।  

नीति आयोग की चेतावनी उन मीडिया रिपोर्ट्स के बाद दी गई जिनमें कहा गया था कि खनन मंत्रालय बड़े नीतिगत बदलाव करने जा रहा है। इसके तहत 2015 के माइंस एंड मिनरल (डेवलपमेंट एंड रेग्युलेशन) एक्ट में लाइसेंसिंग प्रक्रिया से जुड़ा बदलाव शामिल है। खनन मंत्रालय को लगता है कि ये बदलाव खनिज सम्पदा से भरे 500 इलाकों से पाबंदी हटा लेंगे।

ड्रिंलिंग से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा: ऑइल इंडिया

ऑइल इंडिया लिमिटेड ने साफ कहा है कि असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में उसके हाइड्रोकार्बन ड्रिलिंग प्रोजेक्ट से पर्यावरण का कोई नुकसान नहीं होगा और इस नेशनल पार्क को भी कोई क्षति नहीं होगी। ऑइल इंडिया इस पार्क के 3.5 किलोमीटर नीचे ईंधन के लिये ड्रिलिंग करेगी। इस प्रोजेक्ट के लिये केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उसे पर्यावरणीय अनुमति दे दी है। यह हरी झंडी मिल जाने से कंपनी अब 7 नये इलाकों में नवीनतम टेक्नोलॉजी (एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग  – ईआरडी)  का प्रयोग करेगी।

EU: 2030 तक कीटनाशकों का इस्तेमाल 50% घटाने का लक्ष्य

ग्रीन हाउस गैस इमीशन कम करने की महत्वाकांक्षी योजना के तहत अब यूरोपियन कमीशन ने कृषि क्षेत्र पर फोकस किया है। यह सेक्टर यूरोप के कुल 10% ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार है।  EU का कहना है कि वह 2030 तक रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल 50% घटा देगा और यह सुनिश्चित करेगा कि 25% ज़मीन पर जैविक खेती हो। अभी यूरोप में जैविक खेती केवल 8% भूमि पर हो रही है।  ताज़ा योजना के तहत यूरोपियन यूनियन मछली और पशुपालन में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल भी 50% घटायेगा।

EU: कोरोना के बाद साफ ऊर्जा और हाइड्रोजन पर ज़ोर

यूरोपिन यूनियन का कहना है कि कोरोना के बाद ज़िन्दगी को पटरी पर लाने के लिये जो प्लान बनाया गया है उसमें पर्यावरण को भरपूर तरजीह दी जायेगी। इसके तहत साफ ऊर्जा और हाइड्रोजन फ्यूल को बढ़ावा दिया जायेगा। छतों पर सोलर पैनल और सोलर हीटिंग जैसी सुविधाओं के लिये सालाना 9100 करोड़ यूरो (72800 करोड़ रुपये) खर्च किये जायेंगे। अगले दो साल में 15 GW साफ ऊर्जा के बिजलीघर लगाने के लिये 2500 करोड़ यूरो ( करीब 20,000 करोड़ रुपये)  का निवेश होगा।


वायु प्रदुषण

ज़हर उगले बिजलीघर: सीएसई की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादातर कोयला बिजलीघर 2022 तक भी नये उत्सर्जन मानकों को पूरा नहीं कर पायेंगे | Photo: Business Standard

मुंबई: लॉकडाउन में कोयला बिजलीघर और शिपिंग से हुआ SO2 प्रदूषण

मुंबई में लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण तो ज़रूर कम हुआ लेकिन दमघोंटू SO2 गैस का उत्सर्जन बढ़ा है। इसके पीछे कोयला बिजलीघर और शिपिंग इंडस्ट्री मुख्य स्रोत हैं। लॉकडाउन के बाद 25 मार्च से 18 मई के बीच केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन में पाया गया है कि प्रदूषण के 6 में से 5 कारकों में गिरावट आई है। 

अर्बन मिशन (http://www.urbanemissions.info/) के विश्लेषकों ने तीन लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण फैलाने वाले कणों PM 2.5, PM 10 के अलावा NO2,  SO2 और O3 के साथ कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) के स्तर का अध्ययन किया और पाया कि लॉकडाउन से एक महीने पहले (फरवरी 20 से मार्च 22 के बीच) के मुकाबले SO2 के अलावा सभी प्रदूषकों का स्तर गिरा है।

सीएसई रिपोर्ट: नये मानकों को 2022 तक भी नहीं अपना पायेंगे कोल प्लांट

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरेंमेंट (सीएसई) की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयला बिजलीघर साल 2022 तक भी उन नये उत्सर्जन मानकों को पूरा नहीं कर पायेंगे जिन्हें सरकार ने 2015 में बनाया था। जबकि 2017 में इन कोल पावर प्लांट्स को 5 साल का छूट दी गई फिर भी अब तक ज़्यादातर प्लांट्स ने SO2 नियंत्रण की टेक्नोलॉजी नहीं लगाई है।

रिपोर्ट कहती है कि 70% कोल प्लांट 2015 में बनाये उन मानकों को 2022 में भी पूरा नहीं कर पायेंगे।

जबकि 60% प्रदूषक कणों (PM 2.5 और PM 10) के लिये कोल पावर प्लांट ही ज़िम्मेदार हैं। इसके अलावा हवा में मौजूद 45% SO2, 40% NOx और 80% मरकरी इन्हीं कोयला प्लांट्स से आता है।

पंजाब: पाबंदी के बावजूद किसानों ने खुंटी जलाने का रिकॉर्ड तोड़ा

पाबंदी के बावजूद पंजाब में किसानों ने फसल की खुंटी जलाई। 15 अप्रैल से 24 मई के बीच किसानों ने धान की फसल बोने के लिये गेहूं की फसल काटने के बाद रह गई खुंटी जलाई और इस मामले में पिछले 2 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया।  मई का महीना खत्म होने से एक हफ्ते पहले 24 मई तक किसान 13,026 जगह खेतों में आग लगा चुके थे। साल 2018 में 11,510 और 2019 में 11,698 जगह पराली जलाने की घटनायें हुईं थी।

चीन: लॉकडाउन खत्म होते ही प्रदूषण का ग्राफ बढ़ा

चीन में लॉकडाउन में ढील के साथ ही अप्रैल के महीने में प्रदूषण का ग्राफ तेज़ी से बढ़ा। फिनलैंड स्थित रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की स्टडी बताती है कि 30 दिनों के भीतर (12 अप्रैल से 8 मई) के दौरान – पिछले साल इसी वक्त की तुलना में – प्रदूषण अधिक हो गया। शोधकर्ताओं ने 1,500 एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों के डाटा का अध्ययन किया और पाया कि पार्टिकुलेट मैटर (PM 10, PM 2.5) नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड, सल्फर और ओज़ोन जैसे प्रदूषक बढ़ गये हैं। इसके पीछे भारी उद्योग में तेज़ी मुख्य कारण है। इस बीच चीन ने कहा है कि वह वायु प्रदूषण रोकने के लिये कड़े कदम उठायेगा। चीन का कहना है कि उसके एनर्जी लक्ष्य कोरोना के प्रभाव पर निर्भर हैं लेकिन वह कम प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करेगा। चीन ने स्टील मिलों के लिये अल्ट्रा लो इमीशन मानक लागू करने की बात कही है औऱ घोषणा की कि 2020 में पर्यावरण संरक्षण के लिये 5700 करोड़ डॉलर दिये जायेंगे।


रिन्यूएबिल

कोरोना का असर: भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनियों में एक ACME ने कोरोना से पैदा असमंजस और देरी को कारण बताते हुये राजस्थान में सौर ऊर्जा प्लांट का अनुबंध तोड़ दिया है | Photo: ACME

ACME ने राजस्थान में 200 मेगावॉट के प्लांट से पल्ला झाड़ा

देश के 12 राज्यों में काम कर रही साफ ऊर्जा कंपनी ACME ने राजस्थान में सरकारी कंपनी सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन के साथ किया करार तोड़ दिया है। यह करार रिकॉर्ड बिजली दरों (₹ 2.44 प्रति यूनिट) पर किया गया था। ACME ने प्रोजेक्ट के लिये ज़मीन मिलने में देरी और कोरोना संकट से चीन से सप्लाई के संकट की वजह से यह फैसला किया है।

ACME को 2017 में यहां 200 मेगावॉट का प्लांट लगाने का ठेका मिला था। अब कंपनी ने रेग्युलेटर सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेग्युलेटरी अथॉरिटी (CERCI) को बताया है कि प्रोजेक्ट में पहले ही देरी हो चुकी है और कोरोना की वजह से अनिश्चितता बढ़ रही है। हालांकि SECI ने ACME की बात को नकारते हुये कहा कि ऐसा कुछ नहीं है जिससे कंपनी अपना काम शुरू नहीं कर सकती। SECI ने पहले कंपनी की बैंक गारंटी ज़ब्त करने की धमकी भी दी लेकिन बाद में यह मामला “आपसी सहमति” से सुलझ गया।

भारत में सोलर पावर है कोल से 30% सस्ती: IEEFA

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी IEEFA और JMK की रिसर्च में सामने आया है कि दुनिया के निवेशक भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के लिये दिलचस्पी दिखा रहे हैं तो इसके पीछे एक वजह यह है कि सौर ऊर्जा की दरें (₹ 2.50 से ₹ 2.87 प्रति यूनिट) कोल पावर के मुकाबले 20-30% कम हैं। अगर वितरण कंपनियां पावर प्लांट्स के साथ बिजली खरीद का लम्बा अनुबंध करती हैं तो उन्हें कोल के मुकाबले 10-12% का मुनाफा हो सकता है।  साल 2016 से अब तक भारत की सोलर पावर क्षमता 6  GW से बढ़कर 35 GW हो गई है। यह 2022 तक भारत के 100 GW सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के तय लक्ष्य का एक तिहाई है।

कोरोना: अमेरिका में साफ ऊर्जा क्षेत्र में 6 लाख नौकरियां गईं

लॉकडाउन के बाद से सोलर क्षेत्र के साथ बैटरी कार सेक्टर और घरों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों का उत्पादन बन्द होने से अमेरिका में अब तक करीब 6 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं। मार्च में ही करीब डेढ़ लाख लोगों को साफ ऊर्जा क्षेत्र में नौकरियां गंवानी पड़ी थीं। उसके बाद से इस सेक्टर में करीब 4.5 लाख लोग बेरोज़गार हो चुके हैं। BW रिसर्च पार्टनरशिप ने जून तक 5 लाख लोगों की नौकरियां जाने की बात कही थी जो संभावित आंकड़ा अब रिव्यू करके 8.5 लाख कर दिया गया है।   

डेनमार्क बनायेगा दो पवन ऊर्जाद्वीप

डेनमार्क ने 2030 तक अपने कार्बन उत्सर्जन (1990 के स्तर पर) 70% घटाने का लक्ष्य रखा है और इसी मुहिम में वह 40 गीगावॉट के दो “ऊर्जाद्वीप” लगा रहा है जो कि समुद्र में चलने वाली तेज़ हवा का इस्तेमाल करेंगे। डेनमार्क ने 2050 तक कार्बन न्यूट्रल हो जाने का भी लक्ष्य रखा है। कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिये  यह दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी योजना है और इसे डेनिश संसद ने मंज़ूरी दे दी है। इन दो “ऊर्जाद्वीपों” से जो बिजली बनेगी वह डेनमार्क की कुल घरेलू बिजली खपत से अधिक है। डेनमार्क की योजना है कि वह इस साफ ऊर्जा को दो पड़ोसी देशों पोलैंड और नीदरलैंड को निर्यात करेगा।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

गुठलियों के दाम: EV की पुरानी बैटरियां सोलर फार्म में इस्तेमाल हो सकती हैं और एक हद तक वो काफी किफायती भी हैं | Photo: Thunderstruck-EV

EV की पुरानी बैटरियां हो सकती हैं सोलर फार्म में इस्तेमाल

एक अध्ययन में पता चला है कि बैटरी वाहनों की इस्तेमाल हो चुके सेल को सोलर पावर में बिजली स्टोर करने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। पत्रिका एप्लाइड एनर्जी में छपी स्टडी के मुताबिक अगर इन बैटरियों में 80% क्षमता बची है तो वह किसी सोलर फार्म में बैटरियों के जाल के बीच स्टोरेज के लिये इस्तेमाल हो सकती है। अध्ययन में 2.5 मेगावॉट के एक सोलर फार्म का उदाहरण देते हुये इसे उपयुक्त बताया गया है और माना है कि इलैक्ट्रिक वाहनों की ऐसी पुरानी बैटरियों की कीमत अगर नई बैटरी के मुकाबले 60% तक हो तो ये एक  किफायती विकल्प हो सकती हैं।

टेस्ला लायेगी सस्ती मिलियन-माइल बैटरियां, जीएम से मिलेगी कड़ी टक्कर

अमेरिकी मोटर कंपनी टेस्ला के सीईओ इलॉन मस्क ने योजना बताई है जिसके तहत  कंपनी कम कीमत की ऐसी वाहन बैटरी बनायेगी जो दस लाख (एक मिलियन) किलोमीटर तक चले या फिर स्टोरेज के काम आये। टेस्ला की यह योजना एक बड़ा मील का पत्थर होगी क्योंकि इलैक्ट्रिक वाहनों की वर्तमान बैटरियां एक से दो लाख किलोमीटर तक ही चल पाती हैं। इस प्रोजेक्ट में टेस्ला चीन की कंपनी CATL के साथ काम करेगी लेकिन टेस्ला को अपने ही देश की जनरल मोटर्स से कड़ी टक्कर मिलने जा रही है जिसने कह दिया है कि वह भी सस्ती मिलियन माइल बैटरियां बनाने के लिये तकरीबन तैयार है।  

हीरो इलैक्ट्रिक ने ई-स्कूटी पर दिया रिफंड ऑफर

हीरो इलैक्ट्रिक ने ई-स्कूटी पर अपनी तरह का पहला रिटर्न ऑफर दिया है। इसमें वाहन को 3 दिन के भीतर वापस लौटाया जा सकता है और ग्राहक को पूरा पैसा वापस दिया जायेगा। माना जा रहा है कि यह नीति इलैक्ट्रिक दुपहिया वाहनों की ओर अधिक ग्राहक खींचने के लिये है क्योंकि भारत के बैटरी वाहन बाज़ार में दुपहिया वाहनों का दबदबा है।  इस बीच भारत में बैटरी वाहन निर्माता संगठन (SMEV)  के प्रमुख ने कहा है कि महंगे यूरो-VI वाहनों को देखते हुये इलैक्ट्रिक स्कूटर्स की बिक्री आने वाले दिनों बढ़ेगी।


जीवाश्म ईंधन

घटी मांग: कोरोना संकट में कारोबार चौपट हो जाने से कोयला बिजलीघरों का प्लांट लोड फैक्टर 42% तक गिर गया। अनुमान है कि अगले साल के अंत तक ही बिजली की मांग पहले की तरह बहाल हो पायेगी | Photo: Earthrights.org

कोरोना: कोयला बिजलीघरों की उत्पादन क्षमता में रिकॉर्ड गिरावट

कोरोना वाइरस के कारण लागू लॉकडाउन का असर कोयला बिजलीघरों पर साफ दिख रहा है। इस साल अप्रैल में कोयला बिजलीघरों का प्लांट लोड फैक्टर (PLF) पिछले साल अप्रैल के मुकाबले औसतन 22% गिर गया। अप्रैल 2019 में जहां यह 63.1% था वहीं इस साल अप्रैल में यह घटकर 41.9% गया। यह बिजनेस और उद्योगों के ठप होने से बिजली की मांग घटने का असर है। निजी कोयला बिजली घरों में तो प्लांट लोड फैक्टर गिरकर 44% हो गया जबकि सरकारी कंपनी एनटीपीसी के बिजलीघरों का PLF गिरकर 49.9% तक पहुंचा।

कोयला खनन: अनुभवहीन कंपनियों के लिये खुले दरवाज़े

सरकारी ने कॉमर्शियल कोयला खनन के लिये नया नीतिगत खाका बनाया है जिसके तहत कोई भी कंपनी – चाहे उसके पास इस क्षेत्र की योग्यता या अनुभव न हो – अब कोयला खनन कर सकेगी। इस निर्देश का देश में कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिये है और 50 नये कोल ब्लॉक तत्काल खनन के लिये दिये जा रहे हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार अब खनन कंपनियों से प्रति टन कोयले की तय कीमत वसूलने के बजाय राजस्व की भागीदारी वाला मॉडल (रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल) अपनायेगी। सरकार का कहना है कि इससे कंपनियां आयेंगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।

साथ ही भारत कोल गैसीफिकेशन के विकल्प को भी तौल रहा है ताकि गैस आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा जा सके। इसे जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहतर कहा जाता है। कोल पावर अभी औसतन साफ ऊर्जा के मुकाबले 60-70% महंगी है फिर भी देश की दो सबसे बड़ी सरकारी कंपनियों पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) और रूरल इलैक्ट्रिफिकेशन कोर्पोरेशन (REC) ने कोयला बिजलीघरों को कर्ज़ देना जारी रखा है। ये दोनों फर्म अब तक 8.8 गीगावॉट के कोयला बिजलीघरों को कर्ज़ दे चुके हैं जबकि जानकारों ने पहले ही चेतावनी दी है कि इस पैसे की वसूली करना आसान नहीं होगा।

कार्बन इमीशन घटाने के लिये बेढप रास्ते पर कंगारू

ऑस्ट्रेलिया ने पेरिस क्लाइमेट डील के तहत 2030 तक कार्बन इमीशन कम करने के तय लक्ष्य को हासिल करने के लिये नया क्लाइमेट एक्शन प्लान बताया है जिसमें वह कार्बन टैक्स नहीं लगायेगा।  इस देश का प्रति व्यक्ति कार्बन इमीशन (17 टन) सबसे अधिक है। ऑस्ट्रेलिया ने तय किया है कि वह क्लाइमेट सॉल्यूशन फंड का सारा पैसा साफ ऊर्जा संयंत्र लगाने में खर्च नहीं करेगा बल्कि विवादित कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) टेक्नोलॉजी के साथ कोयले और गैस से बिजली बनाने के लिये भी खर्च करेगा।