क्या है साफ हवा की कीमत और प्रदूषण का कोरोना वाइरस से रिश्ता

Newsletter - April 15, 2020

लम्बी लड़ाई: कोरोना के कारण जो लॉकडाउन हुआ उसे हवा में अभूतपूर्व सुधार दिखा है। इससे हमें आने वाले दिनों के लिये रोडमैप बनाने का सुनहरा अवसर भी मिला है। फोटो - Trail Magazine

क्या है साफ हवा की कीमत और प्रदूषण का कोरोना वाइरस से रिश्ता

कोरोना महामारी ने हमें घरों में कैद कर लिया है। प्रधानमंत्री के नये ऐलान के बाद अब लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ गया है। इस दौर में लोगों को हो रही परेशानी और अर्थव्यवस्था को लगे झटके के बीच एकमात्र सकारात्मक चीज साफ होती हवा है। कुछ देर के लिये और भारी आर्थिक कीमत के बदले ही मिली हो लेकिन देश के 90 शहरों की हवा अपने रिकॉर्ड स्तर पर साफ हो गई है। देश के 5 सबसे प्रदूषित कहे जाने वाले दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोयडा, ग्रेटर नोयडा और गुड़गांव में लाकडाउन (24 मार्च) से पहले की तुलना में 50% प्रदूषण घटा है। दुनिया के दूसरे बड़े प्रदूषित शहर बीजिंग, बैंकॉक, साओ पालो और बोगोटा में भी फिज़ा साफ हो गई है।

सोशल मीडिया में साफ हवा की तस्वीरें और वीडिया शेयर करके जश्न मनाये जा रहे हैं। जालंधर से हिमालय के दृश्य पिछले दिनों यू-ट्यूब से फेसबुक और दूसरे प्लेटफॉर्म तक हर जगह देखे गये। निर्माण कार्य और ट्रैफिक मूवमेंट का रुकना हवा के साफ होने के पीछे दो बड़े कारण हैं। साल 2011 में सीपीसीबी की रिपोर्ट में कहा गया कि देश के 6 शहरों में निर्माण कार्य से उड़ने वाली धूल PM 10 कणों का 58% होती है जबकि वाहनों से निकलने वाला धुंआं PM 2.5 और NOx जैसे खतरनाक प्रदूषण की वजह है।

दिल्ली स्थित द एनर्जी एंड रिसोर्सेड इंस्टिट्यूट (टैरी) ने 2018 में जो रिपोर्ट तैयार की उसके मुताबिक दिल्ली में PM 2.5 की 39% वाहनों से था। इस शोध के मुताबिक वाहन 19% PM 10 कणों के लिये और 81% NOx के लिये ज़िम्मेदार थे। लॉकडाउन से ये सारे प्रदूषक गायब से हो गये हैं। दिल्ली, नोयडा, गुरुग्राम और जयपुर में लॉकडाउन के बाद PM 2.5 और PM 10 में 40% से अधिक गिरावट हुई है, बहुत सारे शहरों में NOx के स्तर में 50% कमी आई है। कानपुर में यह 72% गिरा है। 

“प्रदूषण में यह गिरावट ट्रैफिक, निर्माण कार्यों, उद्योग और ईंट भट्ठों का काम रुकने से हुई है लेकिन पहली बार हमारे पास यह जानने का अवसर है कि भारत में PM और अन्य गैसों का बैक ग्राउंड स्तर क्या है और मौसमी कारकों का क्या प्रभाव है।” आईआईटी दिल्ली में वायुमंडलीय कारकों का अध्ययन कर रहे प्रो. साग्निक डे कहते हैं।

हालांकि मौजूदा हाल में भारत में वायु प्रदूषण की मॉनिटरिंग की खामियां भी दिख रही हैं। पुणे, मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद के मॉनिटरिंग स्टेशन 6 अप्रैल से शुरू होने वाले सप्ताह में वायु प्रदूषण में भारी कमी दिखाते हैं लेकिन चेन्नई के चार स्टेशन 23 से 30 मार्च के  बीच ज़ीरो या बहुत कम अंतर  दिखाते हैं। फिर भी यह सच सबके सामने है कि हवा बहुत अधिक साफ हुई है। वायु प्रदूषण का स्वास्थ्य पर क्या असर है औऱ इंसानी जीवन को वह कैसे लील रहा है उस बारे में हम आपको कार्बन कॉपी में लगातार बताते रहे हैं। आप हमारी वेबसाइट पर विस्तार से ये ख़बरें पढ़ सकते हैं।

वर्तमान हालात में यह बहस तेज़ है कि क्या प्रदूषण दम घोंटू बीमारियों से आगे जाकर कोरोना जैसे वायरस का वाहक बन सकता है। “प्रदूषण कोरोना वाइरस को फैला रहा है यह तो सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से बीमार पड़ने की संभावना बढ़ती है, जो कोविड -19 को अप्रत्यक्ष रूप से अधिक ख़तरनाक बनाता है। अगर हम थ्योरी के हिसाब से देखें तो हवा में लटके प्रदूषण के कण वायरस को चिपकने के लिये एक सतह प्रदान करते हैं। इससे कोरोना को फैलने के लिये एक ज़रिया मिल सकता है और अगर लोग लंबे समय तक प्रदूषित हवा में हैं तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। प्रदूषण में एकाएक गिरावट से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं नहीं सुलझेंगी। हमें इसके लिये लंबी तैयारी करनी होगी।” दिल्ली विश्वविद्यालय में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के निदेशक अरुण शर्मा कहते हैं।

जानकारों की राय से समझ आता है कि हवा साफ करने के लिये जो नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) पिछले साल शुरू किया गया है वह कितना अहम है। लेकिन अभी इस प्रोग्राम की कवरेज और इसके लक्ष्य को काफी मज़बूत किये जाने की ज़रूरत है। NCAP के तहत अभी महज़ 122 शहर शामिल हैं जिन्हें 2024 तक केवल 30% प्रदूषण कम करना है। ज़ाहिर है प्रदूषण से हो रही बीमारियों के फैलाव का जो अलार्म बेल पिछले कुछ वक्त में  सुनाई दिया है उसे देखते हुये इस क्लीन एयर प्रोग्राम को काफी सुदृढ़ करने की ज़रूरत है। कोरोना महामारी से निकलने के बाद एक बार फिर से हम गैस चैंबर में घुस सकते हैं और तब साफ हवा का जो तात्कालिक फायदा होता दिखता है वह हमारे पास नहीं रहेगा।


क्लाइमेट साइंस

चिंता का सबब: कोरोना के कारण फील्ड रिसर्च में बाधा आ रही है और इससे जलवायु परिवर्तन का असर जानने के लिये की जा रही महत्वपूर्ण मॉनिटरिंग प्रभावित होगी। फोटो – Stripes.com

कोरोना का असर पड़ सकता है क्लाइमेट मॉनिटरिंग पर: रिसर्च

कोरोना महामारी का असर वैज्ञानिकों के फील्ड वर्क पर भी पड़ रहा है। अब इस बात का ख़तरा है कि क्लाइमेट मॉनिटरिंग और रिसर्च पर इसका असर पड़ेगा क्योंकि डाटा इकट्टा करने के बड़े प्रोजेक्ट या तो रद्द कर दिये गये हैं या फिर फिलहाल रोक दिये गये हैं। हालांकि यह लम्बे समय तक चलने वाले रिसर्च प्रोजेक्ट हैं लेकिन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर महामारी के दुष्प्रभाव लंबे समय तक चले तो मौसम और जलवायु परिवर्तन की रोज़ाना की मॉनिटरिंग पर भी असर पड़ेगा। 

उत्तरी ध्रुव: ओज़ोन परत में दिखा नया छेद

यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने आर्कटिक के ऊपर ओज़ोन की परत में एक नया छेद देखा है जो बनना शुरू हुआ है। हालांकि उत्तरी ध्रुव में ओज़ोन की परत का क्षय सामान्य बात है लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण हो रही एक्सट्रीम वेदर की घटनायें और वायुमंडलीय दबाव को इस छेद का कारण माना जा रहा है। वैज्ञानिकों को भरोसा है कि यह होल अप्रैल के अंत तक बन्द हो जायेगा फिर भी यह पर्यावरण के लिहाज से संकट का संकेत माना जा रहा है। इस छेद का क्षेत्रफल 10 लाख वर्ग किलोमीटर है जो दक्षिण ध्रुव में बने 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर के होल से काफी छोटा है।

जलवायु परिवर्तन: वन्य जीवन पर खतरा

नेचर पत्रिका में छपे एक शोध में दुनिया की उन जगहों को चिन्हित किया गया है जहां ग्लोबल वॉर्मिंग के लगातार बढ़ने से इकोसिस्टम अचानक बिगड़ जायेगा। यह शोध 100×100 किलोमीटर के टुकड़ों (ग्रिड) में की गई और इसके लिये 1850 से 2005 तक के डाटा का इस्तेमाल किया गया है। इस शोध में पक्षियों, स्तनधारियों और सरीसृप वर्ग समेत कुल 30,652 प्रजातियों का अध्ययन किया गया। 

शोधकर्ताओं ने पाया है कि किसी भी ग्रिड में प्रजातियां बढ़ते तापमान के साथ खुद को ढाल पा रही हैं लेकिन एक नियत तापमान के बाद सभी अपने एक साथ अपने असहज़ होने लगीं। इससे निष्कर्ष निकाला गया है कि अगर तापमान को इतना बढ़ाया जाये कि इकोसिस्टम उसके हिसाब से न ढले तो उस क्षेत्र की ज़्यादातर प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी।

ऑस्ट्रेलिया: ग्रेट बैरियर रीफ को  बड़ा नुकसान

ऑस्ट्रेलिया की विश्वचर्चित ग्रेट बैरियर रीफ (मूंगे की दीवार) को पिछले 5 साल में तीसरा बडा नुकसान हुआ है। जेम्स कुक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक  इस नुकसान की वजह तापमान में बढ़ोतरी बताई जा रही है जिस कारण 2000 किलोमीटर लंबाई में कोरल ब्लीचिंग हुई है। जब तापमान, प्रकाश या पोषण में बदलाव होता है तो प्रवालों पर तनाव बढ़ता है तो वे अपने ऊतकों में रह रहे सहजीवी शैवाल को छोड़ देते हैं। इसका नतीजा है कि रंग-बिरंगे मूंगे की दीवार सफेद रंग में बदल रही है। इसे ही कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि साल 2050 आते आते इस कोरल ब्लीचिंग को रोका जा सकता है लेकिन उसके लिये जलवायु परिवर्तन को रोकना होगा।


क्लाइमेट नीति

जल्दबाज़ी? : 11 राज्यों में प्रोजेक्ट्स को एक साथ दी गई वाइल्ड लाइफ क्लीयरेंस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। फोटो – The Indian Express

NBWL ने 11 राज्यों के प्रोजेक्ट्स को दी वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस

नेशनल बोर्ड फार वाइल्ड लाइफ (NBWL)  ने 11 राज्यों की विकास परियोजनाओं को वाइल्ड लाइफ क्लीयरेंस दे दी। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये हुई बोर्ड की पहली बैठक में यह मंज़ूरी दी गई है। नियमों के मुताबिक जिस भी प्रोजेक्ट में वन भूमि या संरक्षित  रिज़र्व फॉरेस्ट की ज़मीन का ज़रा सा भी हिस्सा जाता है उसे बोर्ड की मंज़ूरी हासिल करनी होती है। पर्यावरण मंत्री के ट्वीट से जानकारी मिली कि इन प्रोजेक्टस में गोवा का हाइवे प्रोजेक्ट, नागपुर मुंबई सुपर हाइवे, कोटा में खनन प्रोजेक्ट के अलावा उत्तराखंड और तेलंगाना की सिंचाई योजना शामिल है।

इस बीच सरकार ने “उद्यम में आसानी” (ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस) के लिये किसी भी नये लाइसेंसधारी को ताज़ा क्लीयरेंस लेने से पहले दो साल तक  खनन का अधिकार दिया है।

कोरोना संकट के कारण ग्लासगो में होने वाला सम्मेलन स्थगित

इस साल का जलवायु परिवर्तन महासम्मेलन COP-26 फिलहाल स्थगित कर दिया गया है और इसकी तारीखों का ऐलान कोरोना संकट के गुज़र जाने के बाद होगा। पहले यह सम्मेलन 9 नवंबर से यूनाइटेड किंगडम के ग्लासगो में होना था।  इस वार्ता से पहले होने वाली सारी वार्ताएं भी अभी रद्द कर दी गई हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुट्रिस ने पहले ही कह दिया था कि जलवायु परिवर्तन लड़ाई अहम है लेकिन फिलहाल सभी देशों को अपने सारे संसाधन इस वाइरस से निबटने में लगाने होंगे।

COP-26: सदस्य देशों पर क्लाइमेट प्लान जमा करने का दबाव कायम

भले ही जलवायु परिवर्तन का महासम्मेलन COP 26 अभी स्थगित हो गया हो लेकिन सभी देशों पर यह दबाव कायम है कि वह कार्बन इमीशन कटौती का अधिक कड़ा रोडमैप संयुक्त राष्ट्र में जमा करे। दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन पर काम कर रही संस्थाओं ने सभी देशों से 31 दिसंबर तक रोडमैप जमा करने को कहा है।

जापान ने अपनी योजना का खाका जमा किया है लेकिन उसमें इमीशन कट करने के जो लक्ष्य रखे गये हैं उनसे जानकार खुश नहीं हैं। जापान ने 2015 में बताये लक्ष्य ही दोहराये हैं और 2030 तक 26% (2010 के मुकाबले) इमीशन कट करने का वादा किया है। वैज्ञानिक कहते हैं कि यह रोडमैप अपर्याप्त होने के साथ विज्ञान की अनदेखी भी करता है।

कोरोना संकट: डूबते कारोबार के बीच एयरलाइंस ने कार्बन डील में संशोधन की मांग

एयरलाइन इंडस्ट्री ने इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गेनाइजेशन (ICAO) से मांग की है कि कोरोना संकट को देखते हुये कार्बन इमीशन से जुड़ी स्कीम में संशोधन किया जाये। इंडस्ट्री ने यह भी कहा है कि अगर ऐसा नहीं होता तो वह इस डील से खुद को अलग कर सकती हैं।  इस स्कीम के तहत एक तय सीमा से अधिक कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने पर कंपनियों को एक चार्ज देना है लेकिन एविएशन कंपनियां फिलहाल उड्डयन सेक्टर पर पड़ी मार की दुहाई दे रही हैं। हालांकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसे अपनी ज़िम्मेदारी से भागने का बहाना बताया है।


वायु प्रदुषण

संकट के साथ आई साफ हवा: कोरोना वाइरस के संक्रमण को रोकने के लिये किये गये लॉकडाउन पर इसकी भारी आर्थिक कीमत है खासतौर से गरीबों के लिये। फोटो - World Economic Forum

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से CO2 इमीशन में सबसे बड़ी गिरावट संभावना

तमाम देशों में लॉकडाउन की वजह से दुनिया के कुल कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन में इस साल 5% की गिरावट होने की संभावना है। वैज्ञानिकों के नेटवर्क ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के मुताबिक यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद ईमीशन में सबसे बड़ी गिरावट है। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा कि जीवनशैली और ऊर्जा उत्पादन के तौर तरीकों में बदलाव नहीं किये गये तो उत्सर्जन फिर उसी स्तर पर पहुंच सकतें हैं जहां यह कोरोना महामारी से पहले थे। जानकार कहते हैं कि साल 2030 तक प्रति वर्ष 6% इमीशन घटें तभी धरती की तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री  के नीचे रखा जा सकेगा।

आसमान हुआ साफ, जालंधर से दिखे धौलाधर के शिखर

इधर भारत के तमाम प्रदूषित शहरों में धुंआं कम हुआ है। जालंधर से पिछले दिनों लोगों को धौलाधर रेंज साफ दिखाई दी। धौलाधर की पहाड़ियां हिमालय पर्वत श्रंखला का हिस्सा हैं और जालंधर से करीब 160 किलोमीटर दूर हैं। पिछले कई दशकों में पंजाबवासियों ने अपने घरों की छत से यह खूबसूरत नज़ारा देखा। पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (पीपीसीबी) ने कहा कि जालंधर का एयर क्वॉलिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 52 मिलीग्राम प्रति घन मीटर था रहा जो कि पिछले 10 सालों का रिकॉर्ड है। कोरोना के कारण लॉकडाउन लागू होने से पहले यहां एक्यूआई 120 से 140 के बीच था।

खरीदार गायब, ऑटोमेकर को बेहद सस्ते बेचने पड़ रहे हैं BS6 वाहन

कोरोना वायरस के हमले पहले ही कार और दुपहिया वाहन निर्माताओं के लिये ग्राहक ढूंढना मुश्किल था लेकिन इस वायरस का संक्रमण फैलने के बाद हाल और बिगड़ गये हैं। अब कार निर्माता नये BS6 से चलने वाले वाहनों को पुराने वाहनों (BS4) की कीमत के आसपास ही बेच रहे हैं। पहली अप्रैल से नया ईंधन लागू हुआ है लेकिन महामारी ने ऑटोकंपनियों के हाल बहुत खराब कर दिये हैं। खरीदारों की कमी के कारण टोयोटा ने अपने नये BS6 वाहनों की कीमत 50% गिरा दी है।


रिन्यूएबिल

प्रोजेक्ट पर पड़ा असर: साफ ऊर्जा की योजनायें प्रभावित हो रही हैं। पवन ऊर्जा की क्षमता में 2020 के लिये अब तक 24% की गिरावट का अनुमान दर्ज किया गया है। फोटो - CNBC

पवन ऊर्जा पर लॉकडाउन का असर, लक्ष्य में 24% की कटौती

भारत के पवन ऊर्जा क्षेत्र पर लॉकडाउन का भारी असर है। टर्बाइन बनाने वाली बड़ी कंपनियों – सीमेंस गमेशा, जीई और इनोक्स विन्ड आदि – ने अभी प्रोडक्शन रोका हुआ है। इस बीच ब्लूमबर्ग एनईएफ ने साल 2020 के लिये भारत की पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता में 24% की कटौती की है। पहले 2.56 गीगावॉट की जगह अब इस साल का पूर्वानुमान 1.95 गीगावॉट रखा गया है। अब लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिये जाने के बाद इस पूर्वानुमान में और बदलाव आ सकता है। रायटर की रिपोर्ट के मुताबिक सीमेंस और वेस्तास ने अपने मुख्यालय स्पेन और डेनमार्क में भी उत्पादन रोक दिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत के हालात का असर भी विश्व बाज़ार पर पड़ा है क्योंकि यहां से होने वाली उपकरणों की सप्लाई कई देशों को जाती है। पवन ऊर्जा से जुड़े उपकरणों के मामले में चीन के बाद भारत एशिया में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

कोविड-19: आयात पर प्रभाव से लड़ने के लिये कसी कमर

सोलर इम्पोर्ट सप्लाई के प्रभाव को कम करने के लिये भारत ने सोलर मेन्युफेक्चरिंग यूनिट और एक्सपोर्ट सर्विस हब बनाने का फैसला किया है। सरकार चाहती है कि सभी राज्य और बंदरगाह 50 से 500 एकड़ तक की जगह चुनें जहां पर फैक्ट्री या एक्सपोर्ट सर्विस हब बनाये जा सकें। इस काम में लगी कंपनियों को नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) से मदद मिलेगी।

साफ ऊर्जा सेक्टर पर असर, छोटे रूफटॉप उद्यमियों पर असर  

लॉकडाउन, खासतौर से राज्यों की तालाबन्दी का असर साफ ऊर्जा के प्रोजक्ट्स पर पड़ना तय है।  विश्लेषकों के मुताबिक उत्पादकों को वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम से मिलने वाले भुगतान प्रभावित होंगे क्योंकि हर 25% उत्पादन गिरावट का मतलब डिस्कॉम के लिये 12 डालर (850 रुपये) का नुकसान है। क्रिसिल के मुताबिक सप्लाई चेन में विघटन के कारण अगले तीन महीनों में 3 से 4 गीगावॉट के प्रोजेक्ट्स में देरी होगी। रूफटॉप क्षेत्र में छोटे कारोबारियों के लिये बड़ा संकट है। इस क्षेत्र का एक चौथाई कारोबार 10-12 बड़े कारोबारियों के पास है। इकॉनोमिक टाइम्स के मुताबिक सरकार और बैंकों से मदद नहीं मिली तो छोटी फर्म इस लॉकडाउन में दिवालिया हो सकती हैं और उन्हें साफ ऊर्जा के कारोबार को ही छोड़ना पड़ सकता है।


इलेक्ट्रिक मोबिलिटी

मुश्किल में कसी कमर: यूके ने इस वक्त ट्रांसपोर्ट सेक्टर में कार्बन इमीशन कम करने की जो पहल की है उसके क्रांतिकारी नतीजे मिल सकते हैं। फोटो - Electrive

ट्रांसपोर्ट को कार्बन रहित करने में UK ने दिखाई दिलचस्पी

यूनाइटेड किंगडम सरकार ने देश के ट्रांसपोर्ट सेक्टर को कार्बन रहित बनाने का एलान किया है और इस सिलसिले में एक 80 पेज का दस्तावेज प्रकाशित किया है। योजना के मुताबिक उपभोक्ताओं से व्यापक सलाह की जायेगी। UK के कुल कार्बन उत्सर्जन में 28 प्रतिशत के लिये ट्रांसपोर्ट सेक्टर ज़िम्मेदार है। सरकार का कहना है कि वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के साथ कार्बन न छोड़ने वाले वाहनों को ही सड़क पर लायेगी। UK में इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट पर भी अध्ययन हो रहा है।

कोरोना वायरस की वजह से लोगों ने साफ हवा का स्वाद चख लिया है और नया सर्वे बताता है कि लोग अब बैटरी वाहनों के प्रति अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। सर्वे में भाग लेने वाले 45% लोगों ने बैटरी वाहन खरीदने में दिलचस्पी दिखाई जबकि पिछले साल के सर्वे में यह नंबर 41% था।

सुरक्षित कार बैटरी: चीनी कंपनी के बड़े दावे

इलैक्टिक कारों में आग की घटनायें एक बड़ी समस्या रही हैं लेकिन चीन की बैटरी कार निर्माता कंपनी BYD ने कहा है कि उसकी नई ब्लेड बैटरियों ने इस सिलसिले में कड़े टेस्ट पास कर लिये हैं। इन बैटरियों ने कील ठोंकने, भारी वजन के दबाव, मोड़े जाने और करीब 300 डिग्री तक तापमान में रखे जाने के टेस्ट पास किये हैं। यह टेस्ट बताते हैं कि  सड़क दुर्घटना के स्थिति में बैटरी वाहन में आग का खतरा नहीं रहेगा।

दिलचस्प है कि BYD इस तकनीक को दूसरी बैटरी निर्माता कंपनियों के साथ साझा करेगी ताकि सुरक्षा को लेकर दुनिया में व्यापक क्रांति आ सके। संभावना है कि बैटरी कारों को लेकर अब ग्राहकों की सोच बदलेगी क्योंकि दुर्घटना की स्थिति में बैटरी के फटने से कार में लगी आग लोगों को डराती रही है और निर्माताओं के लिये ग्राहकों को लुभाना मुश्किल होता है।

नॉर्वे की 75% ऑटो सेल हैं प्लग इन कारें, बेल्जियम में बिक्री 91% बढ़ी

नार्वे में ऑटो सेल के नये आंकड़े बताते हैं कि मार्च में वहां प्लग इन कारें कुल सेल का 75% रहीं। इनमें बैटरी EV का हिस्सा 56%  था। हाइब्रिड का हिस्सा 7% रहा। पेट्रोल और डीज़ल कारों की बिक्री कुल बिक्री की 18% से थोड़ा अधिक थी। नार्वे में प्रति व्यक्ति इलैक्ट्रिक वाहन का इस्तेमाल सबसे अधिक है। अभी कोरोना संकट में जब पूरी दुनिया में ऑटो सेल औसतन 32% गिरी है तो नॉर्वे में यह गिरावट 26.7% रही। उधर बेल्जियम में भी प्लग इन (PEV) वाहनों का कारोबार बढ़ रहा है और साल 2020 की पहली तिमाही में बिक्री 91% बढ़ी। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि कोराना संकट के कारण वाहनों की कुल सेल 48% गिरी है।


जीवाश्म ईंधन

तेल का खेल: संकट के इस मौके पर तेल की कीमतों को लेकर युद्ध चल रहा है। सऊदी अरब ने कीमतों में कटौती की और अमेरिकी ऑयल मार्केट दबाव में है - Photo: BusinessDay

सऊदी अरब ने तेल की कीमतों में की कटौती, अमेरिका पर दबाव बढ़ा

OPEC के सदस्य देशों और रूस ने तेल का उत्पादन 10 % घटाया लेकिन सऊदी अरब ने कच्चे तेल की कीमतें फिर गिरा दी हैं। सऊदी अरब एशियाई देशों खासतौर से चीन को भारी छूट के साथ कम कीमत पर तेल देने की पेशकश कर रहा है ताकि वह ऑइल मार्केट पर कब्जा बनाये रख सके। इसलिये 36 डॉलर तक पहुंचने के बाद तेल की कीमत फिर 30 डालर प्रति बैरल पर आ गई।

उधर तेल निकालने के काम लगभग बन्द होने के कारण अमेरिकी तेल बाज़ार ठंडा है और कीमतें 21 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है जो बहुत कम है। माना जा रहा है कि कोरोना संकट टलने तक अमेरिकी बाज़ार  को 30 डालर प्रति बैरल की कीमतों से संतोष करना पड़ेगा लेकिन इससे कई लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ सकता है। बाज़ार में मांग घटने के कारण अमेरिका की शेल गैस का बाज़ार भी ठंडा पड़ा है।

जर्मन कार निर्माताओं ने EU से नियमों में ढील मांगी

कोरोना संकट की वजह से कारों की सेल गिर  गई है। अब जर्मनी के परेशान कार निर्माताओं ने यूरोपियन यूनियन से कहा है कि कड़े इमीशन स्टेंडर्ड्स में कुछ राहत दी जाये। यूरोपियन यूनियन के ताज़ा नियमों के तहत कार निर्माताओं को “साफ कारें” बनानी हैं जो बेहत कम इमीशन करती हैं। इसका मकसद EU के कार्बन उत्सर्जन घटाना है लेकिन कार निर्माताओं का कहना है कि “अभी इसका वक्त नहीं है।”

उधर इन्वायरेंमेंटल एक्शन जर्मनी ने कार निर्माताओं की इस मांग की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि इंडस्ट्री महामारी को “EU के क्लाइमेट लक्ष्य में सेंध” लगाने के लिये इस्तेमाल न करे। हालांकि इस तरह की मांग सिर्फ जर्मन बाज़ार ने नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया और भारत समेत दूसरे देशों के कार निर्माताओं ने भी की है।

केलिफोर्निया में फ्रेकिंग फिर से शुरू

अमेरिका के केलिफोर्निया राज्य ने 9 महीने की पाबंदी के बाद फिर से  फ्रेकिंग के लाइसेंस जारी किये हैं। यह लाइसेंस 24 कुंओं से पेट्रोलियम उत्पाद निकालने के लिये दिये गये हैं। इससे पहले राज्य के गवर्नर गेविन न्यूसॉम ने  फ्रेकिंग पर पाबंदी का वादा किया था। माना जा रहा है कि कंपनियों को दिये गये लाइसेंस को कोर्ट में चुनौती दी जायेगी। इसके लिये UK के कानून का  हवाला दिया जा रहा है जिसे बनाने से पहले किये गये शोध में पता चला था कि फ्रेकिंग उस क्षेत्र को अस्थिर बनाती है और भूकंप की संभावना बढ़ाती है।