सड़क की धूल के प्रबंधन में खर्च की गई एनसीएपी की 64% फंडिंग: सीएसई

Editorial Team21 जुल॰. 2024
फोटो: XJ/Flickr

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राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) का सर्वाधिक ध्यान सड़क की धूल को कम करने पर केंद्रित रहा है, जबकि प्रदूषण करने वाले वाहनों और अन्य उत्सर्जक स्रोतों के लिए बहुत कम फंडिंग दी गई है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के विश्लेषण में यह बात सामने आई है। एनसीएपी की शुरुआत 2019 में 131 प्रदूषित शहरों के लिए स्वच्छ वायु लक्ष्य निर्धारित करने और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टिकुलेट प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से की गई थी। 

कुल 10,566 करोड़ रुपए की धनराशि का 64% सड़क बनाने, चौड़ीकरण, गड्ढों की मरम्मत, पानी का छिड़काव, और मशीनों से सफाई करने आदि में खर्च किया गया है। केवल 14.51% धनराशि का उपयोग बायोमास प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए किया गया है, जबकि वाहनों से होनेवाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए12.63% और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के लिए मात्र 0.61% का उपयोग किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़क की धूल होनेवाले प्रदूषण का नियंत्रण फंडिंग के केंद्र में रहा है।

एनसीएपी का लक्ष्य है 2019-20 के स्तर से 2025-26 तक पार्टिकुलेट प्रदूषण को 40% तक कम करना। यह भारत में वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए पहला प्रदर्शन-लिंक्ड फंडिंग कार्यक्रम है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीएपी में 131 शहरों के लिए वित्त वर्ष 2019-20 से 2025-26 की अवधि के लिए 19,711 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं। इसमें से लगभग ₹3,172.00 करोड़ 82 शहरों के लिए और लगभग ₹16,539.00 करोड़ सात शहरी समूहों और 42 दस लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों के लिए आवंटित किए गए हैं। एनसीएपी कार्यक्रम और पंद्रहवें वित्त आयोग दोनों के तहत वित्त वर्ष 2019-20 और वित्त वर्ष 2023-24 (3 मई 2024 तक) के बीच 131 शहरों को लगभग ₹10,566.47 करोड़ जारी किए गए थे।

सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि एनसीएपी के उद्देश्य और लक्ष्य हमेशा सराहनीय रहे हैं, लेकिन इसके तहत ध्यान और निवेश काफी हद तक धूल नियंत्रण पर केंद्रित है, न कि उद्योगों या वाहनों के उत्सर्जन पर।

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