ईरान पर अमेरिका और इज़राइल के हमले के बाद वैश्विक ऊर्जा संकट तेजी से गहराता जा रहा है और इसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर भी दिखाई देने लगा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति बाधित हो रही है और कई देशों की तरह भारत भी इसके दबाव को महसूस कर रहा है।
सबसे बड़ा कारण फारस की खाड़ी का रणनीतिक मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ है, जहां से दुनिया के कुल तेल और गैस का लगभग 20 प्रतिशत परिवहन होता है। युद्ध के कारण इस समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है और कई जहाजों ने जोखिम के कारण इस मार्ग से गुजरना बंद कर दिया है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है।
युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत हाल में 30 प्रतिशत बढ़कर लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई और अभी भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है, जो 2022 के बाद का उच्च स्तर है।
इस संकट का भारत पर सीधा असर पड़ रहा है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और इसमें से आधे से अधिक आपूर्ति पश्चिम एशिया से होती है। ऐसे में क्षेत्र में युद्ध या आपूर्ति बाधित होने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा पैदा हो जाता है।
ऊर्जा संकट के कारण भारत में एलपीजी, एलएनजी और तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। सरकार ने घरेलू रसोई गैस की कमी रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कदम उठाते हुए रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और अन्य हाइड्रोकार्बन प्रवाह को एलपीजी उत्पादन की ओर मोड़ने का आदेश दिया है। देश की सबसे बड़ी निजी रिफाइनरी चलाने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और घरेलू गैस को प्राथमिक क्षेत्रों की ओर मोड़ने की घोषणा की है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होरमुज से एलएनजी आपूर्ति बाधित होने लगी है।
युद्ध का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। गैस की कमी के कारण उर्वरक, सिरेमिक और टाइल उद्योगों में उत्पादन प्रभावित होने लगा है और कुछ कंपनियों ने उत्पादन कम करने की चेतावनी दी है। इससे कृषि और निर्माण क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है।
आर्थिक मोर्चे पर भी दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती हैं तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर लगभग 7 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत तक आ सकती है और महंगाई बढ़ सकती है। उधर विदेशी निवेशकों ने भी बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम के कारण भारतीय शेयर बाजार से करीब 21,000 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ी है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक भंडार की स्थिति की समीक्षा की है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ लंबे समय तक बाधित रहती है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर गहरा असर डाल सकता है।
इस तरह ईरान युद्ध केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह तेजी से वैश्विक ऊर्जा संकट में बदल रहा है, जिसका प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था से लेकर आम लोगों की रसोई तक महसूस किया जा रहा है।
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