भारत इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए बड़ा लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, जिसमें 72,000 फास्ट चार्जरों की तैनाती शामिल है, जिससे ईवी अपनाने की रफ्तार बढ़ाने की कोशिश तेज़ होगी। यह जानकारी भारी उद्योग मंत्रालय (एमएचआई) के अतिरिक्त सचिव हनीफ़ कुरैशी ने एसआईएएम (SIAM) 5वीं ग्लोबल इलेक्ट्रीफिकेशन मोबिलिटी समिट में दी। केंद्र सरकार ने चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 2,000 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं और पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत कई राज्यों, तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) और सार्वजनिक उपक्रमों से चार्जर नेटवर्क के प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं।
कुरैशी ने कहा कि राज्यों को क्रियान्वयन के तरीकों का चयन अपनी मर्जी से करने की आज़ादी है, लेकिन सबसे कम लागत पर उपभोक्ताओं को सुविधा उपलब्ध कराने पर ज़ोर दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि पहले यह चिंता थी कि वाहनों और चार्जरों के बीच संतुलन नहीं बन पाएगा, लेकिन अब यह समस्या हल हो चुकी है। सरकार का यह कदम ईवी अपनाने में रेंज चिंता को कम करने और देशभर में चार्जिंग नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में एक अहम प्रयास माना जा रहा है।
चीन, अमेरिका में मंदी से वैश्विक स्तर पर ईवी बिक्री में गिरावट
दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की बिक्री जनवरी में 3 प्रतिशत घट गई। कंसल्टेंसी बेंचमार्क मिनरल इंटेलिजेंस के आंकड़ों के अनुसार चीन में खरीद टैक्स और सब्सिडी घटने तथा अमेरिका में नीतिगत बदलावों से मांग कमजोर हुई। जनवरी में वैश्विक ईवी पंजीकरण करीब 12 लाख रहे। चीन में बिक्री 20 प्रतिशत घटकर दो साल के निचले स्तर पर पहुंच गई, जबकि उत्तरी अमेरिका में 33 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई। यूरोप में 24 प्रतिशत वृद्धि हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि सख्त पर्यावरण नियमों और बाजार की अनिश्चितता के बीच कई खरीदार अब हाइब्रिड वाहनों को बेहतर विकल्प मान रहे हैं।
ईवी नीतियों में यू-टर्न से वैश्विक ऑटो उद्योग को 65 अरब डॉलर का झटका
अमेरिका में जलवायु नीतियों में बदलाव और ईवी इंसेंटिव में कटौती के बाद वैश्विक ऑटो उद्योग को बीते एक साल में कम से कम 65 अरब डॉलर का झटका लगा है। कई कंपनियों ने अपनी इलेक्ट्रिक वाहन योजनाएं घटाई या बदली हैं। स्टेलैंटिस ने 26 अरब डॉलर का प्रावधान करते हुए कुछ इलेक्ट्रिक मॉडल बंद कर पेट्रोल इंजन दोबारा शुरू करने का फैसला किया। फोर्ड मोटर कंपनी, फॉक्सवैगन और होंडा ने भी भारी घाटे की सूचना दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि मांग घटने और नीतिगत अनिश्चितता के कारण कंपनियां अब हाइब्रिड और पेट्रोल वाहनों पर फिर से जोर दे रही हैं।
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