आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम फसलों की प्राथमिकताओं को बदल रहा है। किसान दालों और तिलहनों की बजाय मक्का को तरजीह दे रहे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है। मौजूदा रुझानों को ‘शुरुआती चेतावनी संकेत’ बताते हुए सर्वेक्षण ने खाद्य तेल आयात पर बढ़ती निर्भरता और खाद्य कीमतों में अस्थिरता की आशंका जताई है। इसमें ऊर्जा आत्मनिर्भरता और खाद्य आत्मनिर्भरता के बीच टकराव की ओर भी इशारा किया गया है।
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, मक्का तेजी से भारत के एथेनॉल कार्यक्रम का एक प्रमुख लेकिन विवादास्पद कच्चा माल बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2025 के बीच मक्का उत्पादन में 8.77 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की गई, जबकि इसके तहत क्षेत्रफल में 6.68 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
इसी अवधि में दालों के उत्पादन और रकबे में गिरावट देखी गई, जबकि तिलहनों के उपज क्षेत्रफल में सालाना केवल 1.7 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई। मक्का को छोड़कर अन्य अनाजों की वृद्धि 2.9 प्रतिशत रही। सर्वेक्षण ने चेताया है कि ये सभी भारत की विभिन्न फलों की खपत टोकरी (Consumption Basket) और पोषण परिणामों के लिए बेहद अहम हैं, लेकिन किसानों की प्राथमिकता सूची में नीचे खिसकते जा रहे हैं। खपत टोकरी उन वस्तुओं और सेवाओं का समूह है, जिन्हें किसी देश के आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नियमित रूप से उपभोग करते हैं। यह टोकरी बताती है कि लोग क्या खाते हैं, क्या इस्तेमाल करते हैं और किन बुनियादी चीज़ों पर खर्च करते हैं। लंबे समय में यह असंतुलन खाद्य तेल आयात पर निर्भरता को पुख्ता कर सकता है और आपूर्ति झटकों के दौरान घरेलू खाद्य कीमतों को अधिक अस्थिर बना सकता है।
हिमालय–काराकोरम में ग्लेशियल बाढ़ जोखिम का आकलन और निगरानी कमजोर: अध्ययन
वैश्विक तापवृद्धि के कारण हिमालय–काराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों का विस्तार जोखिम आकलन और अनुकूलन प्रयासों से कहीं तेज हो रहा है। इससे लगभग दस लाख लोग ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे में हैं।
इस महीने NPJ Natural Hazards जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि ग्लेशियल झीलों की बढ़ती संख्या, आकार और जल मात्रा के बावजूद उनके जोखिम का समुचित आकलन नहीं किया गया है, जबकि विनाशकारी बाढ़ की आशंका बनी हुई है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि डेटा की कमी, सीमित फील्ड अध्ययन और कमजोर प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां अनुकूलन को बाधित कर रही हैं।
धरती के गर्म होने के साथ ग्लोबल साउथ में एसी की मांग में तेज़ उछाल
नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस जैसे अपेक्षाकृत गरीब देशों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंचने से पहले ही शीतलन यानी कूलिंग की मांग तेज़ी से बढ़ेगी। इसके लिए शुरुआती स्तर पर ही बड़े पैमाने पर अनुकूलन उपायों की जरूरत होगी। अध्ययन के प्रमुख लेखक के अनुसार, अगले पांच वर्षों में कई घरों में एयर कंडीशनर लगाने की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि, यदि वैश्विक तापवृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो इसके बाद भी तापमान बढ़ता रहेगा।
अध्ययन के हवाले से बताया गया कि 2050 तक, यदि वैश्विक तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो करीब 3.8 अरब लोगों — यानी दुनिया की लगभग आधी आबादी — को अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ेगा।
जब तापवृद्धि 1 डिग्री से 2 डिग्री सेल्सियस तक जाएगी तो भारत में ही कूलिंग डिग्री डेज़ (दिनों) में 13.4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। कूलिंग डिग्री डेज़ 18.3 डिग्री सेल्सियस के आधार तापमान से औसत तापमान के अंतर को मापते हैं और एसी की जरूरत का संकेतक माने जाते हैं। इसके उलट, कनाडा, रूस, नॉर्वे और स्वीडन जैसे समृद्ध उत्तरी देशों में बिजली के बिलों में बचत हो सकती है, जबकि विकासशील देशों को कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली ग्रिड विस्तार और एसी चलाने की ऊर्जा लागत का भारी बोझ उठाना पड़ेगा — खासकर उन क्षेत्रों में जहां बिजली की आपूर्ति पहले से ही अनिश्चित है।
पेरिस समझौते से ऑटो सेक्टर की रणनीतियों में बड़ा बदलाव नहीं: अध्ययन
साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक नए अध्ययन के मुताबिक, पेरिस समझौते का उद्योगों — खासतौर पर ऑटोमोबाइल क्षेत्र — की कारोबारी रणनीतियों पर सीमित असर पड़ा है। अध्ययन में दुनिया के 12 बड़े वाहन निर्माताओं का विश्लेषण किया गया, जो वैश्विक वाहन उत्पादन के लगभग 80 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं।
शोधकर्ताओं ने रणनीतिक बदलाव का आकलन करने के लिए छह तरह के प्राथमिक साक्ष्यों का इस्तेमाल किया। नतीजों में पेरिस समझौते से सीधे जुड़ी डीकार्बनाइजेशन रणनीतियों के केवल सीमित संकेत मिले। अध्ययन के अनुसार, कंपनियों की प्रतिक्रियाएं अधिकतर क्रमिक (इंक्रीमेंटल) रहीं, न कि परिवर्तनकारी (ट्रांसफोरमेटिव)। यह निष्कर्ष पेरिस समझौते के प्रभाव को लेकर आशावादी दावों को चुनौती देता है और जलवायु परिवर्तन से निपटने में अंतरराष्ट्रीय समझौतों की सीमाओं को समझने की जरूरत पर जोर देता है।
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