एक नए अध्ययन में पाया गया है कि वैश्विक तापमान में 2°C की वृद्धि की स्थिति में भी दुनिया के 104 उष्णकटिबंधीय शहरों में से 81% शहर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से गर्म होंगे। मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार, भारत शहरी वॉर्मिंग के बढ़ते खतरे का एक प्रमुख हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है।
अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से भारत के मध्यम आकार के शहर—जैसे पटियाला और उत्तर भारत के अन्य शहर—क्षेत्रीय अनुमानों से कहीं अधिक तापवृद्धि दर्ज कर रहे हैं। इससे यह चिंता बढ़ी है कि पारंपरिक जलवायु मॉडल शहरी इलाकों में गर्मी के वास्तविक जोखिम को कम करके आंक रहे हैं।
भारत में शीतलहर का पैटर्न बदल रहा, अब ये सर्दियों तक सीमित नहीं
डाउन टू अर्थ (DTE) के विश्लेषण के मुताबिक, फरवरी 2026 पिछले पांच वर्षों में पहला ऐसा महीना रहा जब देश में एक भी शीतलहर दर्ज नहीं की गई। जनवरी 2026 में भारत में 24 शीतलहर/कोल्ड डे घटनाएं दर्ज की गईं, लेकिन फरवरी में ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी।
28 फरवरी को आधिकारिक तौर पर सर्दी का मौसम समाप्त हो चुका है और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से 2-4°C अधिक रहने का अनुमान जताया है। इससे संकेत मिलता है कि शीतलहर की घटनाएं अब पारंपरिक शीत महीनों तक सीमित नहीं रह गई हैं और मौसम के पैटर्न में बदलाव साफ दिखाई दे रहा है।
दक्षिणी हिंद महासागर की लवणता घट रही, वैश्विक तापन जिम्मेदार: अध्ययन
कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन के हवाले से डाउन टु अर्थ ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पश्चिमी तट के पास स्थित दक्षिणी हिंद महासागर—जो वैश्विक महासागरों के सबसे खारे क्षेत्रों में से एक है—तेजी से मीठा हो रहा है। सतह पर लवणता में कमी से उथले जल में खाद्य उपलब्धता घट रही है, जिससे समुद्री जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अध्ययन के अनुसार, पिछले छह दशकों में इस अत्यधिक खारे क्षेत्र का आकार 30% तक घट गया है। यह दक्षिणी गोलार्ध में मीठे पानी की मात्रा में दर्ज की गई सबसे तेज़ वृद्धि है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस क्षेत्र में पहुंचने वाला अतिरिक्त मीठा पानी इतना है कि वह अमेरिका की पूरी आबादी को 380 वर्षों तक पेयजल उपलब्ध करा सकता है।
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव स्थानीय वर्षा में परिवर्तन के कारण नहीं, बल्कि वैश्विक तापन के चलते हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपर सतही वायु प्रवाह में बदलाव के कारण हो रहा है। इन हवाओं में परिवर्तन से समुद्री धाराएं इंडो-पैसिफिक के मीठे पानी को दक्षिणी हिंद महासागर की ओर मोड़ रही हैं।
इस प्रक्रिया के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। कम मिश्रण (मिक्सिंग) के कारण गहरे जल के पोषक तत्व सतह तक नहीं पहुंच पाते, जिससे उथले जल में रहने वाले जीवों के लिए भोजन कम हो जाता है। साथ ही, सतही जल की अतिरिक्त गर्मी गहराई में नहीं जा पाती, जिससे सतह का पानी और अधिक गर्म हो जाता है—जो पहले से तापवृद्धि से जूझ रहे समुद्री जीवों के लिए और घातक साबित हो सकता है।
वैश्विक तापमान 1.5°C लक्ष्य से आगे बढ़ना ‘टिपिंग प्वाइंट’ जोखिम बढ़ा सकता है: समीक्षा
एक नई समीक्षा में चेतावनी दी गई है कि यदि वैश्विक तापमान 1.5°C की सीमा से ऊपर चला जाता है, तो पृथ्वी प्रणाली के कई संवेदनशील ‘टिपिंग एलिमेंट्स’ अपने निर्णायक बिंदु (टिपिंग प्वाइंट) को अस्थायी रूप से पार कर सकते हैं। हाल के वर्षों में उत्सर्जन में कमी की रफ्तार धीमी रहने के कारण 2020 के दशक के अंत या 2030 के दशक में 1.5°C सीमा पार होने की आशंका बढ़ गई है।
अध्ययन में कहा गया है कि तापमान में ‘ओवरशूट’ की अवधि और तीव्रता को कम रखना जोखिम घटाने में अहम होगा। तेज़ प्रतिक्रिया समय वाले तंत्र—जैसे गर्म पानी की प्रवाल भित्तियां—ओवरशूट के प्रति बेहद संवेदनशील हैं, जबकि ध्रुवीय हिमचादर जैसे धीमी प्रतिक्रिया वाले तंत्र अस्थायी ओवरशूट से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, अमेज़न में वनों की कटाई या प्रवाल भित्तियों पर प्रदूषण और अत्यधिक मछली पकड़ने जैसी मानवीय गतिविधियां इन टिपिंग प्वाइंट्स को और नजदीक ला सकती हैं, जिससे सुरक्षित तापवृद्धि का दायरा और संकरा हो जाएगा।
समेकित रणनीतियां मिट्टी की सेहत, एंटीबायोटिक प्रतिरोध और खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं: अध्ययन
एक नए अध्ययन में जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य के बीच गहरे संबंधों की पड़ताल की गई है। शोध में कहा गया है कि पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती और सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण को एक साथ संबोधित करने वाली समेकित रणनीतियां समय की मांग हैं।
मिट्टी की सेहत सुधारने, एंटीबायोटिक प्रतिरोध कम करने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने से न केवल जलवायु संकट से निपटने में मदद मिल सकती है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और जनस्वास्थ्य में भी सुधार संभव है।
शोधकर्ताओं ने जैविक खाद के उपयोग, फसल चक्र अपनाने, कम जुताई और एंटीबायोटिक के जिम्मेदार उपयोग जैसे उपायों को प्रमुख बताया। इन उपायों से पारिस्थितिकी तंत्र की लचीलापन क्षमता बढ़ेगी और दीर्घकालिक टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलेगा।
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