इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने प्रशासन की गंभीर लापरवाही को उजागर किया है। इस घटना में 15 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक लोग बीमार पड़े। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, शहर के लोग लंबे समय से गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने समय पर ध्यान नहीं दिया। जांच में सामने आया कि सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नल का पानी सीधे पीने लायक नहीं है और उसे फिटकरी व क्लोरीन से शुद्ध करना पड़ता है। 2019 में आई कैग रिपोर्ट में भी इंदौर और भोपाल की जल प्रबंधन व्यवस्था में कई कमियां बताई गई थीं, लेकिन सुधार नहीं हुआ।
एक साल में दूषित पानी से 34 मौतें, 5,500 लोग बीमार
पिछले एक साल में देश के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 26 शहरों में दूषित नल का पानी पीने से कम से कम 34 लोगों की मौत हुई है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच करीब 5,500 लोग बीमार पड़े। इनमें सबसे अधिक मामले डायरिया के थे, इसके बाद टाइफाइड, हेपेटाइटिस और लंबे समय तक बुखार की शिकायत सामने आई।
जांच में पाया गया कि लगभग हर जगह सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया था। इसकी मुख्य वजह पुराने और जर्जर पाइप हैं, जो सीवर लाइनों के पास बिछे हैं। कई शहरों में 40 साल से अधिक पुराने पाइप अब भी इस्तेमाल हो रहे हैं, जिससे बार-बार प्रदूषण का खतरा बना रहता है।
44% शहरों में वायु प्रदूषण गंभीर, एनसीएपी की पहुंच सीमित: रिपोर्ट
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (क्रिया) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के करीब 44 प्रतिशत शहर लंबे समय से गंभीर वायु प्रदूषण का सामना कर रहे हैं। 4,041 शहरों के उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि 1,787 शहरों में हर साल पीएम2.5 मानक से ऊपर रहा। चिंता की बात यह है कि इनमें से केवल 4 प्रतिशत शहर ही राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के दायरे में हैं।
2025 में असम का बर्नीहाट, दिल्ली और गाजियाबाद सबसे प्रदूषित शहर रहे। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक ऐसे शहर हैं जो मानकों पर खरे नहीं उतरते। क्रिया का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक और क्षेत्रीय स्तर पर ठोस सुधार जरूरी हैं।
दिल्ली में पीएम2.5 प्रदूषण का एक-तिहाई कारण सेकेंडरी एयरोसोल
दिल्ली में पीएम2.5 प्रदूषण का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अब सेकेंडरी एयरोसोल से बन रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ये कण सीधे नहीं निकलते, बल्कि गैसों के रासायनिक बदलाव से बनते हैं। नमी, तापमान और धूप की वजह से ये गैसें सूक्ष्म कणों में बदल जाती हैं, जो फेफड़ों तक पहुंचती हैं। इससे स्मॉग के दौरान हवा की हालत तेजी से बिगड़ जाती है।
दो साल पहले, हमने अंग्रेजी में एक डिजिटल समाचार पत्र शुरू किया जो पर्यावरण से जुड़े हर पहलू पर रिपोर्ट करता है। लोगों ने हमारे काम की सराहना की और हमें प्रोत्साहित किया। इस प्रोत्साहन ने हमें एक नए समाचार पत्र को शुरू करने के लिए प्रेरित किया है जो हिंदी भाषा पर केंद्रित है। हम अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नहीं करते हैं, हम अपनी कहानियां हिंदी में लिखते हैं।
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