
मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में लू का कहर, छत्तीसगढ़ में तापमान 40°C के पार
मध्य और प्रायद्वीपीय भारत इस समय भीषण लू की चपेट में हैं। मध्य भारत के छत्तीसगढ़ में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। राजनांदगांव जिले में 40.5°C दर्ज किया गया, जो उस समय देश के मैदानी इलाकों में दर्ज सबसे अधिक तापमानों में से एक है और महाराष्ट्र के वाशिम के बराबर है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी तापमान 40 डिग्री के करीब पहुंच गया है। हंस इंडिया के मुताबिक, हैदराबाद में तापमान 38°C दर्ज किया गया। वहीं, यूवी इंडेक्स 10 तक पहुंच गया है, जिसे ‘अत्यंत खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है, जिससे त्वचा संबंधी स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
तेलंगाना के उत्तरी जिलों — अदीलाबाद, निजामाबाद और करीमनगर — में हालात और गंभीर होने की आशंका है, जहां तापमान 40°C से ऊपर जाने की संभावना है। आंध्र प्रदेश में भी गर्मी का असर तेज हो गया है। विजयवाड़ा में अधिकतम तापमान 38°C तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि रायलसीमा क्षेत्र में गर्मी विशेष रूप से तीव्र रहने की संभावना है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने तमिलनाडु में लू चलने की संभावना जताई है। वहीं केरल में भी तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, पुनलूर में अधिकतम तापमान 38.4°C और कोट्टायम में 37.8°C दर्ज किया गया, जो इस समय के सामान्य स्तर से लगभग 3 डिग्री अधिक है।
दक्षिण-पश्चिम अमेरिका में ‘अत्यधिक दुर्लभ’ हीटवेव, जलवायु संकट के बिना यह ‘लगभग असंभव’
दक्षिण-पश्चिम अमेरिका में ‘ऐसे समय में जब सर्दी होनी चाहिए’, रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दर्ज की गई। स्क्रिप्स न्यूज़ के मुताबिक इस क्षेत्र में लगभग 2 करोड़ लोग ‘अत्यधिक गर्मी की चेतावनी’ के दायरे में हैं, जबकि अन्य 2 करोड़ लोगों को हीटवेव से संबंधित एडवाइजरी दी गई है। एरिज़ोना के फीनिक्स में तापमान 40.5°C तक पहुंच गया, जो मार्च के पिछले रिकॉर्ड से लगभग 5°C अधिक है। लास वेगास और लॉस एंजिल्स के आंतरिक क्षेत्रों में भी रिकॉर्ड स्तर की गर्मी दर्ज की गई।
शोधकर्ताओं ने कहा कि अमेरिका के पश्चिमी हिस्से में यह भीषण हीटवेव जलवायु संकट के बिना ‘लगभग असंभव’ है। द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, जीवाश्म ईंधनों के जलने से उत्पन्न जलवायु संकट ने पिछले एक दशक में इस तरह की हीटवेव की संभावना चार गुना बढ़ा दी है।
विश्लेषण के सह-लेखक बेन क्लार्क ने कहा, “मार्च के लिए ये तापमान पूरी तरह असामान्य हैं।” वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन के विश्लेषण के अनुसार, हाल ही में 2016 तक भी ऐसी हीटवेव कम तीव्र होती, जिसमें तापमान लगभग 1.4°F (0.8°C) कम होता।
सह-लेखक फ्रेडरिके ओटो ने कहा, “ये निष्कर्ष किसी भी संदेह की गुंजाइश नहीं छोड़ते। जलवायु परिवर्तन मौसम को उन चरम स्थितियों की ओर धकेल रहा है, जो औद्योगिक-पूर्व दुनिया में अकल्पनीय थीं।”
हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की दर 2000 के बाद दोगुनी: आईसीआईएमओडी रिपोर्ट
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर वर्ष 2000 के बाद दोगुनी हो गई है, जिससे अरबों लोगों के लिए विनाशकारी बाढ़ और दीर्घकालिक जल संकट का खतरा बढ़ गया है।
‘चेंजिंग डायनामिक्स ऑफ़ ग्लेशियर्स इन द हिंदुकुश हिमालयन रीजन फ्रॉम 1990 टू 2020’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में क्षेत्र के 63,761 ग्लेशियरों का मानचित्रण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ये ग्लेशियर एशिया की कम से कम दस प्रमुख नदी प्रणालियों का स्रोत हैं, जो अरबों लोगों की खाद्य, जल, ऊर्जा और आजीविका सुरक्षा को सहारा देते हैं।
समुद्र तल से 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लगभग 78% ग्लेशियर क्षेत्र ‘ऊंचाई-निर्भर ताप वृद्धि’ (एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग) के प्रभाव में है, जिसमें ऊंचे क्षेत्रों में तापमान निम्न क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ता है।
इन निष्कर्षों के पीछे हाल के वर्षों में दिखे गंभीर प्रभाव भी हैं। 2021 में उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में चमोली आपदा, जिसमें एक ग्लेशियर खंड के टूटने से 200 से अधिक लोगों की मौत हुई; अक्टूबर 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ), जिससे 50 से अधिक लोगों की जान गई; और 5 अगस्त को उत्तराखंड के धाराली में हुई आपदा, जहां ग्लेशियर-आधारित खीर गंगा ने पूरा बाजार बहा दिया — ये सभी हालिया घटनाएं ग्लेशियरों से जुड़े बढ़ते खतरे को दर्शाती हैं।
महासागरों का बढ़ता तापमान जमीन पर हीटवेव बढ़ा रहा है: अध्ययन
महासागरों के बढ़ते तापमान का असर अब जमीन पर पड़ने वाली लू पर साफ दिखाई दे रहा है। डाउन टू अर्थ (DTE) की रिपोर्ट के अनुसार, कई एजेंसियों के संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि वैश्विक स्तर पर जमीन पर पड़ने वाली हीटवेव में 50-64% तक की वृद्धि के लिए समुद्री तापमान में बढ़ोतरी जिम्मेदार है।
शोधकर्ताओं ने 1982 से 2023 के बीच के जलवायु आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए बताया कि आर्द्र (ह्यूमिड) हीटवेव की तीव्रता में वृद्धि तटीय समुद्री तापमान बढ़ने से गहराई से जुड़ी हुई है। यह निष्कर्ष ‘लार्ज-स्केल एग्रीगेशन ऑफ़ ह्यूमिड हीटवेव्स एक्सासरबेटेड बाय कोस्टल ओशनिक वार्मिंग ‘ शीर्षक वाली रिपोर्ट में सामने आया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, गर्म होती दुनिया में हीटवेव अब एक स्थायी घटना बनती जा रही है, जिससे गर्मी से होने वाली मौतों का खतरा बढ़ रहा है। इस खतरे को ‘वेट बल्ब तापमान’ (Wet Bulb Temperature) से मापा जाता है, जिसकी सीमा लगभग 31.5°C मानी जाती है। इसके ऊपर शरीर का पसीना प्रभावी ढंग से ठंडक नहीं दे पाता, जिससे हीट स्ट्रोक का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि तटीय समुद्रों का गर्म होना और आर्द्र हीटवेव का तेज होना खासतौर पर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अध्ययन के अनुसार, हिंद महासागर का बढ़ता तापमान दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में व्यापक हीटवेव को ट्रिगर करता है। इसी तरह 2023 में उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में समुद्री सतह के रिकॉर्ड तापमान ने दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में भीषण हीटवेव को जन्म दिया।
धरती की तापमान वृद्धि 2°C होने पर खाद्य संकट झेलने वाले देशों की संख्या हो सकती है तिगुनी: विश्लेषण
वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर गंभीर खाद्य असुरक्षा से जूझने वाले देशों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़कर 24 तक पहुंच सकती है। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, यह खुलासा एक नए अध्ययन में हुआ है।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट (आईआईईडी) के विश्लेषण के मुताबिक, वैश्विक तापमान बढ़ने से दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ेगा, लेकिन निम्न-आय वाले देशों में खाद्य प्रणालियां अमीर देशों की तुलना में सात गुना तेजी से बिगड़ेंगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संकट को कम करने के लिए सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना, जलवायु-सहिष्णु कृषि में निवेश बढ़ाना और जल व मिट्टी प्रबंधन में सुधार करना जरूरी है, ताकि जलवायु झटकों का तेजी से सामना किया जा सके।
सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में सोमालिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, अफगानिस्तान, हैती और मोजाम्बिक शामिल हैं। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता ऋतु भारद्वाज के अनुसार, 2°C तापमान वृद्धि की स्थिति में इन देशों में खाद्य असुरक्षा 30% से अधिक बढ़ सकती है, जबकि उच्च-आय वाले देशों में यह औसतन केवल 3% बढ़ने का अनुमान है।
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भारत ने संशोधित किए एनडीसी, 2035 तक उत्सर्जन 47% तक घटाने का लक्ष्य
केंद्र सरकार ने बुधवार को भारत के नए जलवायु लक्ष्य तय करते हुए 2031 से 2035 तक की अवधि के लिए अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को मंजूरी दे दी। ये लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) को भेजे जाएंगे।
सरकार ने 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक जीडीपी की उत्सर्जन इंटेंसिटी 47 प्रतिशत तक घटाने और कुल स्थापित बिजली क्षमता का 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा है। साथ ही 3.5 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर कार्बन सिंक बनाने की योजना है। ये नए लक्ष्य 2022 में घोषित पुराने लक्ष्यों से अधिक महत्वाकांक्षी हैं। भारत पहले ही 2030 के लक्ष्य से पहले लगभग 52 प्रतिशत बिजली क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर चुका है।
इस घोषणा के बाद एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 में भारत के CO₂ उत्सर्जन की वृद्धि दर दो दशक में सबसे धीमी रही। बिजली क्षेत्र में कोयले पर निर्भरता कम होने और सौर व पवन ऊर्जा बढ़ने से यह संभव हुआ। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर एनडीसी लक्ष्य अभी भी ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार देशों के प्रयास लक्ष्य से काफी पीछे हैं। 2015 के पेरिस समझौता के तहत सभी देशों को हर पांच साल में अपने जलवायु लक्ष्य अपडेट करने होते हैं।
खनन परियोजनाओं के लिए वन भूमि उपयोग को एफएसी की मंजूरी
केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने कई खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। मध्य प्रदेश में कोयला खदानों के लिए 1,000 हेक्टेयर से अधिक और 470 हेक्टेयर भूमि के उपयोग को मंजूरी दी गई है।
सिंगरौली जिले में प्रस्तावित गोंडबहेरा-उझेनी ईस्ट कोयला खदान को भी मंजूरी मिली है, जहां जमीन धंसने का खतरा बताया गया है। सरकार ने इसके लिए जरूरी सुरक्षा और सुधार उपाय लागू करने को कहा है।
असम में तेल की खोज के लिए 24 घंटे ड्रिलिंग की अनुमति दी गई है, लेकिन शोर कम रखने और जंगल में श्रमिक शिविर न लगाने की शर्त रखी गई है। वहीं अरुणाचल प्रदेश की एक जलविद्युत परियोजना पर फैसला फिलहाल टाल दिया गया है।
ईरान युद्ध: कीटनाशकों की लागत बढ़ने की आशंका
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। उद्योग संगठन क्रॉपलाइफ इंडिया ने चेतावनी दी है कि कीटनाशक बनाने में लगने वाली लागत 20-25% तक बढ़ सकती है। संगठन के अनुसार, प्रमुख समुद्री मार्गों में बाधा आने से जरूरी कीटनाशकों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे खेती के अहम मौसम में कमी आ सकती है और फसल की पैदावार व गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि उत्पादन घटने से छोटे उद्योगों और रोजगार पर दबाव बढ़ेगा। साथ ही बाजार में नकली और घटिया उत्पादों के बढ़ने का खतरा भी जताया गया है।
विकासशील देशों को दी जाने वाली जलवायु सहायता में 14% की कटौती करेगा ब्रिटेन
यूनाइटेड किंगडम ने विकासशील देशों को दी जाने वाली जलवायु सहायता में लगभग 14% की कटौती करने का फैसला किया है। अब यह सहायता घटकर करीब 2 अरब पाउंड प्रति वर्ष रह जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम सरकार के कुल विदेशी सहायता बजट में कमी के बाद उठाया गया है, जिसे राष्ट्रीय आय के 0.35% तक सीमित कर दिया गया है। इस कटौती की एक बड़ी वजह ईरान युद्ध के कारण बढ़ा खर्च दबाव बताया जा रहा है।
सरकार ने अगले तीन वर्षों में लगभग 6 अरब पाउंड जलवायु खर्च की बात कही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक राशि इससे कम हो सकती है। पहले पांच साल में 11.6 अरब पाउंड खर्च किए गए थे।
अमेरिका और इज़राइल के ईरान के साथ चल रहे युद्ध का असर अब जलवायु पर भी साफ दिख रहा है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले 14 दिनों में ही करीब 50 लाख टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हुआ है, जो 84 देशों के कुल उत्सर्जन से ज्यादा है।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 20,000 इमारतों के नुकसान से ही करीब 24 लाख टन CO₂ उत्सर्जन हुआ। इसके अलावा लड़ाकू विमानों और सैन्य जहाजों द्वारा 15 से 27 करोड़ लीटर ईंधन जलाया गया, जिससे करीब 5.29 लाख टन उत्सर्जन हुआ।
तेहरान में ईंधन भंडारों पर हमलों के बाद 25 से 59 लाख बैरल तेल जल गया, जिससे करीब 18.8 लाख टन CO₂ उत्सर्जन हुआ। वहीं मिसाइल, ड्रोन और सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल से भी हजारों टन अतिरिक्त प्रदूषण फैला।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध जारी रहा तो तेल ढांचे पर हमले बढ़ेंगे और इससे उत्सर्जन तेजी से बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक जलवायु संकट और गंभीर हो जाएगा।
प्रदूषण से जुड़े अर्थदंड से बनाया जाएगा नया पर्यावरण संरक्षण कोष: सरकार
केंद्र सरकार ने प्रदूषण से जुड़े जुर्मानों के उपयोग पर नई जानकारी दी है। पर्यावरण मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि वायु, जल और पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत वसूले गए सभी जुर्मानों की राशि अब पर्यावरण संरक्षण कोष में जमा होंगे। यह कोष वर्ष 2026 में बनाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को हुए नुकसान का आकलन करना है। इसके साथ ही प्रदूषित स्थलों की सफाई और सुधार के काम भी इससे किए जाएंगे।
पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सदन में यह जानकारी देते हुए कहा कि कोष की राशि का एक छोटा हिस्सा प्रशासनिक कार्यों पर खर्च किया जा सकता है। यह खर्च कुल राशि के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। इसमें कर्मचारियों का वेतन और जरूरी दफ्तर खर्च शामिल हैं।
विपक्ष ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने हितों के टकराव की आशंका जताई। यह भी पूछा गया कि क्या जुर्माने की राशि का उपयोग सीधे प्रभावित स्थलों पर होगा। सरकार ने जवाब में कहा कि कोष के उपयोग के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं और उनका पालन किया जाएगा।
पाकिस्तान सबसे प्रदूषित देश, भारत छठे स्थान पर
एक नई रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है, जबकि बांग्लादेश दूसरे और ताजिकिस्तान तीसरे स्थान पर हैं। भारत इस सूची में छठे स्थान पर है। यह जानकारी IQAir की 2025 की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 143 में से 130 देशों में वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से अधिक पाया गया। दुनिया के 25 सबसे प्रदूषित शहर भारत, पाकिस्तान और चीन में हैं।
शहरों में लोनी सबसे प्रदूषित है, जबकि दिल्ली चौथे स्थान पर है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि प्रदूषण का लोगों के स्वास्थ्य पर, विशेषकर बच्चों पर, दीर्घकालिक असर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े कचरे से पारे के रिसाव के मामले में दखल देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जाने की सलाह दी। मामला खतरनाक कचरे के निपटान और जलाए गए अवशेष से जुड़ा है। यह कचरा भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड साइट से आया था।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इस मामले की लंबे समय से निगरानी कर रहा है। अदालत ने जमीन और भूजल को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। अवशेष राख को धार जिले के पीथमपुर स्थित केंद्र में रखा गया है। याचिकाकर्ता ने पारे के रिसाव का खतरा बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ठोस सबूत के साथ हाई कोर्ट में जाएं।
900 गीगावॉट नवीकरणीय क्षमता जोड़ने के लिए ग्रिड विस्तार की योजना
मेरकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2035-36 तक 900 गीगावॉट नवीकरणीय क्षमता को ग्रिड से जोड़ना प्रस्तावित है। इसके लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार किया जाएगा। करीब 1,37,500 सर्किट किलोमीटर नई लाइनें बिछाई जाएंगी। साथ ही सबस्टेशन क्षमता भी बढ़ाई जाएगी।
इस परियोजना पर करीब 7.93 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। योजना का उद्देश्य बिजली आपूर्ति में रुकावट को कम करना है। इससे सौर और पवन ऊर्जा को बेहतर तरीके से ग्रिड में जोड़ा जा सकेगा। सरकार का कहना है कि इससे हरित ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।
2033 तक भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमता होगी 346 गीगावॉट-ऑवर: रिपोर्ट
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ऊर्जा भंडारण क्षमता में तेज बढ़ोतरी की उम्मीद है, जो 2033 तक करीब 346 गीगावॉट-ऑवर (जीडब्ल्यूएच) तक पहुंच सकती है। अभी यह एक जीडब्ल्यूएच से भी कम है। यह जानकारी एसईएसआई 2026 सम्मेलन में दी गई। इस सम्मेलन में कई देशों के विशेषज्ञ शामिल हुए।
रिपोर्ट में बताया गया कि कई बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईईएस) परियोजनाएं निर्माण की प्रक्रिया में हैं। कुल 92 जीडब्ल्यूएच क्षमता की परियोजनाएं पाइपलाइन में हैं। सरकार भी इस क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है। बिजली की बढ़ती मांग को संतुलित करने के लिए भंडारण जरूरी माना जा रहा है। इससे बिजली आपूर्ति अधिक स्थिर और भरोसेमंद बनेगी।
पीएलआई योजना: सौर उपकरण निर्माताओं को नहीं हुआ भुगतान
सरकार ने संसद में बताया कि सौर उपकरण बनाने वाली कंपनियों को अभी तक प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना के तहत प्रोत्साहन राशि नहीं मिली है। उच्च-क्षमता सोलर पीवी मॉड्यूल निर्माण हेतु पीएलआई योजना के लिए 24,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। इस योजना का उद्देश्य देश में सौर उपकरण निर्माण बढ़ाना है। सरकार ने बताया कि भुगतान एक साल बाद किया जाता है और यह अवधि अभी पूरी नहीं हुई है। इसलिए अब तक कोई राशि जारी नहीं की गई है। इस योजना के तहत कई परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं। करीब 30 गीगावाट सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता, 10.5 गीगावाट सौर सेल क्षमता और 2 गीगावाट इंगट-वेफर क्षमता स्थापित की गई है। सरकार का कहना है कि आने वाले समय में भुगतान शुरू होगा।
ट्रांसमिशन के अभाव में बेकार जा सकती है 37 गीगावाट सौर क्षमता: क्राइसिल
भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने आ रही है। रेटिंग एजेंसी क्राइसिल की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026–27 तक 35-37 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पर ‘ग्रिड कर्टेलमेंट’ का खतरा है, यानि उत्पादन के बावजूद ट्रांसमिशन के अभाव में इस क्षमता का प्रयोग नहीं किया जा सकेगा। यह समस्या खासतौर पर दिन के समय ज्यादा होती है, जब सौर ऊर्जा का उत्पादन अपने चरम पर होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्थिति का मुख्य कारण ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर का धीमा विकास है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन परियोजनाओं के पास स्थायी ट्रांसमिशन कनेक्शन नहीं है और जो ‘टेम्पररी जनरल नेटवर्क एक्सेस’ (टीजीएनए) के जरिए ग्रिड से जुड़ी हैं, वे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच भारत में कुल कर्टेलमेंट का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा ऐसे ही प्रोजेक्ट्स से जुड़ा था।
नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच इन परियोजनाओं की लगभग 39 प्रतिशत क्षमता तक बिजली को उपयोग में नहीं लाया जा सका। वहीं, 13–14 GW क्षमता वाले कुछ प्रोजेक्ट्स में कर्टेलमेंट 50 प्रतिशत तक पहुंच गया, यानी आधी बिजली तक बेकार चली गई। राजस्थान और गुजरात, जो देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
दुनियाभर में इलेक्ट्रिक कारों की रफ्तार धीमी, योजनाएं बदल रहे निर्माता
दुनियाभर में इलेक्ट्रिक कारों की ओर बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ती दिख रही है। कई बड़ी वाहन कंपनियों ने अपनी पुरानी योजनाओं में बदलाव किया है। होंडा, मर्सिडीज-बेंज, फोर्ड, स्टेलांटिस और वोल्वो ने अपने लक्ष्य पीछे खिसकाए हैं। अब पेट्रोल और हाइब्रिड कारों की मांग उम्मीद से ज्यादा बनी हुई है। लग्जरी ब्रांड भी इस बदलाव से प्रभावित हैं। रोल्स-रॉयस और बेंटले जैसी कंपनियां पेट्रोल मॉडल जारी रखेंगी। कई कंपनियां अब हाइब्रिड विकल्प पर ज्यादा जोर दे रही हैं।
इस बदलाव की एक वजह ग्राहकों की पसंद है। कई लोग अभी भी पारंपरिक इंजन को पसंद करते हैं। दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोप में सरकारी समर्थन भी कुछ कम हुआ है। इससे इलेक्ट्रिक कारों की राह मुश्किल हुई है। कंपनियों को अपनी योजनाएं बदलने में भारी लागत भी उठानी पड़ रही है। इसके बावजूद, इलेक्ट्रिक कारों की दिशा में बदलाव जारी रहेगा, लेकिन रफ्तार धीमी रहेगी।
वैश्विक ईवी बैटरी बाजार में चीनी निर्माताओं की हिस्सेदारी हुई 70%
चीन की कंपनियों ने वैश्विक इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी बाजार में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। एक रिपोर्ट के अनुसार बाजार में उनकी हिस्सेदारी अब 70 प्रतिशत से अधिक हो गई है। सीएटीएल और बीवाईडी जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में आगे हैं। सीएटीएल दुनिया की सबसे बड़ी बैटरी निर्माता बनी हुई है।
बीवाईडी ने भी तेजी से विस्तार किया है। उसने अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत किया है और अन्य कंपनियों को भी बैटरी दे रही है। इस बढ़त की वजह बड़े पैमाने पर उत्पादन और कम लागत है।
नई बैटरी तकनीक से इलेक्ट्रिक वाहनों की रेंज बढ़ने की उम्मीद
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ सरे एडवांस्ड टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने नई बैटरी डिजाइन विकसित की है। इससे इलेक्ट्रिक वाहनों और मोबाइल जैसे उपकरणों की बैटरी लाइफ बढ़ सकती है। लिथियम-आयन बैटरी स्मार्टफोन, ईवी समेत कई उपकरणों में इस्तेमाल होती है।
सामान्य बैटरियों में ग्रेफाइट होता है, जो सीमित ऊर्जा ही स्टोर कर पाता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने इस नई लिथियम-आयन बैटरी में ग्रेफाइट की जगह सिलिकॉन और कार्बन नैनोट्यूब का नया ढांचा बनाया है। यह ढांचा चार्जिंग के दौरान फैलने के बावजूद टूटता नहीं है।
परीक्षण में इस बैटरी ने बहुत अधिक ऊर्जा स्टोर की और कई बार चार्ज होने के बाद भी स्थिर रही। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में ज्यादा चलने वाली बैटरियां बनाने में मदद करेगी।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारत गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। फोटो: Anoop VS/Pexels
वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत की जद्दोजहद: सरकार हर संभव स्रोत से तेल-गैस जुटाने में जुटी
भारत इस समय पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते गहरे ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में कहा कि सरकार कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए सभी संभावित स्रोतों से खरीद कर रही है और आने वाले दिनों में भी यह प्रयास जारी रहेंगे।
प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले 11 वर्षों में 53 लाख मीट्रिक टन के रणनीतिक तेल भंडार तैयार किए गए हैं, जबकि अतिरिक्त 65 लाख मीट्रिक टन क्षमता बढ़ाने का काम जारी है। ऊर्जा परिवहन को मजबूत करने के लिए सरकार ने ₹70,000 करोड़ का जहाज निर्माण कार्यक्रम भी शुरू किया है।
केंद्र के दावों के बावजूद पंजाब में एलपीजी संकट गहराया
पंजाब के चंडीगढ़ स्थित एलपीजी वितरकों का कहना है कि केंद्र और तेल कंपनियों के पर्याप्त आपूर्ति के दावों के बावजूद गैस की भारी कमी बनी हुई है। वितरकों ने लंबित बुकिंग को पूरा करने के लिए आपूर्ति बढ़ाने की मांग की है।
फेडरेशन के अध्यक्ष के अनुसार, अचानक कीमतों में वृद्धि, बुकिंग पर अंतराल की पाबंदी और अस्थायी रूप से बुकिंग चैनलों के बंद होने से उपभोक्ताओं में घबराहट बढ़ी है और लंबित बुकिंग में तेज उछाल आया है।
एलपीजी संकट ने ‘स्वच्छ रसोई’ रणनीति की कमजोरियां उजागर कीं
एलपीजी की कमी के चलते निम्न आय वर्ग, छात्रावासों और छोटे भोजनालयों में फिर से लकड़ी के चूल्हों का उपयोग बढ़ने लगा है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध के बाद आपूर्ति बाधित होने से देरी और अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
भारत की लगभग 60% घरेलू एलपीजी खपत आयात पर निर्भर है, जिसमें से 90% पश्चिम एशिया से आता है।
दिल्ली में जलावन लकड़ी की कीमत ₹10 प्रति किलो से बढ़कर ₹20 प्रति किलो हो गई है। वहीं, काले बाज़ार में गैस सिलेंडर ऊंचे दामों पर बेचे जा रहे हैं। देश में करीब 33.2 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी कनेक्शन हैं, जिनमें 10.4 करोड़ प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत हैं। शहरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है।
एलपीजी संकट के बीच बायोगैस और वैकल्पिक ईंधनों की ओर रुख
केरल, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्य एलपीजी की कमी से निपटने के लिए बायोगैस और अन्य वैकल्पिक ईंधनों को तेजी से अपनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
मुंबई की कई संस्थाओं ने बताया कि उनके वेस्ट-टू-गैस प्लांट आपूर्ति की अनिश्चितता को संभालने में मदद कर रहे हैं। वहीं, ग्रामीण गुजरात में समुदाय स्थानीय नवीकरणीय ऊर्जा समाधान पर प्रयोग कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आयातित ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता भारत को वैश्विक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
रिलायंस ने अमेरिकी छूट के बाद ईरानी तेल खरीदा
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में दी गई छूट के बाद ईरान से 50 लाख बैरल कच्चे तेल की खरीद की है। हाल के वर्षों में ईरानी तेल मुख्य रूप से चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियों द्वारा खरीदा जाता रहा है और अक्सर इसे अन्य देशों के नाम से रीब्रांड किया जाता है।
यह सौदा मई 2019 के बाद भारत द्वारा ईरानी तेल का पहला आयात है, जब अमेरिका ने तेहरान पर प्रतिबंध दोबारा लागू किए थे।
जापान ने घरेलू मांग पूरी करने के लिए अब तक का सबसे बड़ा तेल भंडार जारी किया
जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने घोषणा की है कि 8 करोड़ बैरल कच्चा तेल रिफाइनरियों को उपलब्ध कराया जाएगा, जो देश की 45 दिनों की मांग के बराबर है। यह राष्ट्रीय भंडार से अब तक की सबसे बड़ी रिलीज़ है।
सरकार ने ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सब्सिडी भी शुरू की है, जिससे गैस की कीमत लगभग ¥170 (करीब $1.10) प्रति लीटर पर सीमित की जा सके। हाल ही में खुदरा कीमत ₹190.8 प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थी। प्रारंभिक सब्सिडी की साप्ताहिक समीक्षा की जाएगी।






