
भारत में भीषण गर्मी की आशंका, आगे और बढ़ेंगी हीटवेव: आईएमडी
भारत में मार्च महीने में हल्की बारिश और तेज़ हवाओं से कुछ जगह गर्मी से थोड़ी राहत भले ही मिली हो, लेकिन इसके बाद मई तक देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है। मौसम विज्ञान विभाग ने यह जानकारी दी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मौसम विभाग ने कहा कि मार्च से मई 2026 के बीच पूर्वी और पूर्व-मध्य भारत के अधिकांश हिस्सों, दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कई क्षेत्रों तथा उत्तर-पश्चिम और पश्चिम-मध्य भारत के कुछ हिस्सों में हीटवेव वाले दिनों के सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।
हालांकि देश के बाकी हिस्सों में हीटवेव के दिनों की संख्या सामान्य रहने की संभावना जताई गई है। मार्च 2026 के दौरान गुजरात और आंध्र प्रदेश के कुछ अलग-थलग क्षेत्रों में सामान्य से अधिक हीटवेव दिनों की संभावना है, जबकि बाकी क्षेत्रों में स्थिति सामान्य रह सकती है।
मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार मार्च-अप्रैल-मई (MAM) के दौरान बढ़ती हीटवेव परिस्थितियां सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल संसाधनों, बिजली की मांग और आवश्यक सेवाओं पर गंभीर असर डाल सकती हैं। खासकर बुजुर्गों, बच्चों, खुले में काम करने वाले श्रमिकों और पहले से बीमार लोगों पर इसका अधिक खतरा रहेगा।
उच्च तापमान के कारण हीट-संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है और बुनियादी ढांचे तथा संसाधन प्रबंधन प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए आईएमडी ने राज्यों और जिला प्रशासन को समय रहते तैयारी सुनिश्चित करने की सलाह दी है, जिसमें कूलिंग शेल्टर की व्यवस्था, पर्याप्त पेयजल आपूर्ति और स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली को मजबूत करना शामिल है।
पिछले 10 वर्षों में तेज हुई जलवायु संकट की रफ्तार: अध्ययन
वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन के अनुसार पिछले दस वर्षों में वैश्विक तापमान वृद्धि की गति तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने 98 प्रतिशत सांख्यिकीय भरोसे के साथ निष्कर्ष निकाला है कि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार पहले की तुलना में अधिक तेज हो गई है।
शोध के अनुसार प्राकृतिक घटनाएं जैसे एल नीनो, ज्वालामुखीय विस्फोट और सौर गतिविधियों में बदलाव भी तापमान वृद्धि के रुझान को तेज करने में योगदान दे रहे हैं। पॉट्सडैम इंस्टिट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (PIK) के मुताबिक 2015 के बाद से वैश्विक तापमान वृद्धि की दर लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक आंकी गई है, जबकि 1970 से 2015 के बीच यह दर लगभग 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक से कम थी।
यह दर 1880 में तापमान रिकॉर्डिंग शुरू होने के बाद से किसी भी दशक की तुलना में अधिक है।
इससे पहले कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (C3S) ने भी बताया था कि 2023 से 2025 के बीच वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा, जो पहली बार लगातार तीन वर्षों तक इस सीमा को पार करने की घटना है।
वहीं जलवायु विश्लेषण संस्था बर्कले अर्थ ने चेतावनी दी है कि 2023 से 2025 के बीच तापमान में हुई तेज बढ़ोतरी 1970 से 2019 के दौरान दिखे लगभग रैखिक (linear) तापमान रुझान से काफी अलग है। अध्ययन के अनुसार यदि पिछले 10 वर्षों की इसी गति से तापमान बढ़ता रहा, तो पेरिस जलवायु समझौते द्वारा निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक तापमान सीमा 2030 तक पार हो सकती है।
चेतावनियों को किया नजरअंदाज, इसलिए हुई तबाही: एनडीएमए रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
उत्तराखंड के चमोली में 2021 की हिमस्खलन त्रासदी और केरल के वायनाड में 2024 के भूस्खलन सहित कई बड़ी आपदाएं टाली जा सकती थीं, लेकिन खामियों भरे परियोजना आकलन और कमजोर योजना के कारण ऐसा नहीं हो सका। यह निष्कर्ष राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की एक नई रिपोर्ट में सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार 2021 के चमोली हिमस्खलन में 77 लोगों की मौत हुई और 127 लोग लापता हुए, जबकि 2024 के वायनाड भूस्खलन में 225 लोगों की मौत और 138 लोग लापता बताए गए। एनडीएमए का कहना है कि इन घटनाओं ने परियोजनाओं के मूल्यांकन और जोखिम आकलन की मौजूदा पद्धतियों की गंभीर कमजोरियों को उजागर किया है।
चमोली आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों के आकलन के लिए इस्तेमाल हो रही पद्धतियों की सीमाएं दिखाईं, जबकि वायनाड की घटना ने दीर्घकालिक जोखिम प्रबंधन और समुदाय की तैयारियों में बड़े अंतर को सामने रखा।
रिपोर्ट में 10 ऐसी आपदाओं का उल्लेख किया गया है जिन्हें रोका जा सकता था। इनमें सिलक्यारा टनल के निर्माण से जुड़ी समस्याएं भी शामिल हैं, जहां 2023 में सुरंग धंसने से पहले कई चेतावनी संकेत मिले थे, लेकिन उन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।
अरावली में मृदा कटाव हो रहा तेज़: 7 साल में 13% मिट्टी का नुकसान, शहरीकरण बना बड़ा कारण
भारत की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली रेन्ज में पिछले सात वर्षों के दौरान मिट्टी के कटाव में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। एक नए अध्ययन के अनुसार 2017 से 2024 के बीच अरावली क्षेत्र में मिट्टी के नुकसान में 13.8% की बढ़ोतरी हुई है। इसके पीछे तेजी से बढ़ता शहरीकरण, खनन गतिविधियां और बढ़ती वर्षा को मुख्य कारण बताया गया है।
अध्ययन में पाया गया कि तेज ढलान वाले क्षेत्र, कटाव के प्रति संवेदनशील मिट्टी और खनन क्षेत्र मिट्टी के क्षरण के बड़े हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हाल के वर्षों में वृक्षारोपण बढ़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर हो रहे भूमि परिवर्तन की भरपाई स्थानीय संरक्षण प्रयास नहीं कर पा रहे हैं।
अरावली पर्वतमाला को लंबे समय से दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों को पश्चिम में फैले राजस्थान के रेगिस्तान से बचाने वाली प्राकृतिक ढाल माना जाता है।
सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार 1967-68 से अब तक अरावली की 31 पहाड़ियां पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं, जो इस पर्वत श्रृंखला पर बढ़ते दबाव की गंभीर चेतावनी है।
अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड की लत से हड्डियां कमज़ोर होने का ख़तरा
फ्लेवर दही, फ्रोजन पिज्जा, ब्रेकफास्ट सीरियल और इंस्टेंट ओट्स जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आज लोगों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बनते जा रहे हैं, लेकिन नया अध्ययन चेतावनी देता है कि इनका ज्यादा सेवन हड्डियों के लिए खतरनाक हो सकता है।
एक बड़े अध्ययन में 1.6 लाख से अधिक लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस स्टडी के नतीजे ब्रिटिश जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशि हुए हैं। शोध में पाया गया कि जो लोग अधिक मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, उनमें हड्डियों का खनिज घनत्व (बोन मिनरल डेंसिटी) कम पाया गया और कूल्हे की हड्डी टूटने का खतरा लगभग 10.5% तक बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार रोजाना लगभग 3.7 सर्विंग से अधिक ऐसे खाद्य पदार्थ खाने से जोखिम बढ़ जाता है। इन खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और अस्वस्थ वसा की मात्रा अधिक होती है, जबकि पोषण कम होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन जारी रहा, तो आने वाले समय में कम उम्र में हड्डियों की कमजोरी और फ्रैक्चर के मामले तेजी से बढ़ सकते हैं।
पेरिस समझौते के तहत नए एनडीसी जमा नहीं करने वाले देशों पर होगी चर्चा, भारत भी सूची में
पेरिस जलवायु समझौते की निगरानी करने वाली समिति इस महीने उन 60 से अधिक देशों पर चर्चा करेगी जिन्होंने अब तक अपने नए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) जमा नहीं किए हैं। यह समयसीमा फरवरी 2025 में समाप्त हो गई थी। इन देशों में भारत भी शामिल है। पेरिस समझौते के तहत सभी देशों को हर पांच साल में अपनी संशोधित जलवायु योजना बतानी होती है कि वे वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने में कैसे योगदान देंगे।
संयुक्त राष्ट्र की पेरिस एग्रीमेंट इम्प्लीमेंटेशन एंड कंप्लायंस कमेटी (PAICC) 24 से 27 मार्च के बीच जर्मनी के बॉन शहर में बैठक करेगी। समिति देशों को सजा नहीं दे सकती, लेकिन उनसे स्पष्टीकरण मांग सकती है या सार्वजनिक रूप से उनकी देरी की जानकारी दे सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों ने नई योजना नहीं दी है, वे वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा हैं। भारत ने कहा था कि वह अपनी नई जलवायु योजना जल्द पेश करेगा।
त्वरित पर्यावरण मंजूरी के लिए नया प्राधिकरण बनाने की तैयारी में सरकार
केंद्र सरकार पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने के लिए नई व्यवस्था बनाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत स्टैंडिंग अथॉरिटी ऑन एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट (SAEIA) नामक नई संस्था बनाई जाएगी। यह संस्था उन परियोजनाओं का आकलन करेगी जहां राज्य स्तर की पर्यावरण आकलन संस्थाएं काम नहीं कर रही होंगी।
पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) किसी भी बड़े उद्योग, खनन या निर्माण परियोजना शुरू करने से पहले जरूरी होती है। अभी राज्यों में स्टेट एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) और स्टेट लेवल एक्सपर्ट अप्रेज़ल कमेटी (SEAC) यह काम करती हैं।
इन संस्थाओं का कार्यकाल तीन साल का होता है। कई बार समय पर पुनर्गठन न होने से परियोजनाओं की मंजूरी रुक जाती है और फाइलें केंद्र के पास भेजनी पड़ती हैं। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से देरी कम होगी और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।
बढ़ती गर्मी से बाहर काम करना हो रहा मुश्किल: अध्ययन
मानव गतिविधियों से बढ़ रही वैश्विक गर्मी अब एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है और इसका असर गरीब लोगों पर अधिक पड़ रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया कि दुनिया के गर्म क्षेत्रों में लोगों के सुरक्षित रूप से बाहर रहने के घंटे कम हो गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 35 प्रतिशत आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहां युवाओं के लिए भी रहने की स्थिति सीमित हो गई है, जबकि 78 प्रतिशत बुजुर्ग ऐसी जगहों पर रहते हैं जहां गर्मी के कारण जीवन कठिन हो रहा है। भारत में यह स्थिति सबसे गंभीर बताई गई है, खासकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों में। शोधकर्ताओं के अनुसार अत्यधिक गर्मी बुजुर्गों के लिए ज्यादा खतरनाक है और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण यह समस्या और बढ़ सकती है।
अमेरिका-ईरान युद्ध से भारत का बासमती निर्यात प्रभावित
अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर भारत के बासमती चावल निर्यात पर पड़ रहा है। शिपिंग बाधित होने से करीब 4 लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों पर या रास्ते में फंसा हुआ है। निर्यातकों ने सरकार से पोर्ट शुल्क माफ करने और स्थिति को ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित करने की मांग की है। एशिया-खाड़ी मार्ग पर मालभाड़ा दरें बढ़कर 3,500 से 4,500 डॉलर प्रति कंटेनर हो गई हैं। पश्चिम एशिया भारत के बासमती निर्यात का 60-70 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है, जबकि ईरान अकेले लगभग 20 प्रतिशत खरीदता है। बढ़ती ईंधन, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत से निर्यातकों के अनुबंध और नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ रहा है।
उद्योगों के लिए कैप्टिव पावर नियमों में संशोधन
सरकार ने बिजली नियमों में संशोधन की घोषणा की है जिससे विशेष रूप से उद्योगों के लिए कैप्टिव पावर उत्पादन के नियमों को अधिक स्पष्ट बनाया जा सके। बिजली मंत्रालय ने कहा कि उपभोग की जगह के पास ही बिजली उत्पादन से ट्रांसमिशन में हानि कम होगी और बिजली प्रणाली अधिक मजबूत बनेगी।
मंत्रालय के अनुसार, ये संशोधन हितधारकों से व्यापक परामर्श के बाद किए गए हैं। बिजली (संशोधन) नियम, 2026 का उद्देश्य नियमों में अस्पष्टता दूर करना और उद्योगों के लिए कारोबार को आसान बनाना है। नए प्रावधानों में स्वामित्व की परिभाषा स्पष्ट की गई है और ग्रुप कैप्टिव परियोजनाओं के नियम सरल किए गए हैं। साथ ही सत्यापन लंबित रहने तक उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से भी राहत दी गई है। इससे उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
2025 में भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में सबसे बड़ी गिरावट
2025 में भारत में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ी कमी दर्ज की गई। यह जानकारी क्लाइमेट ट्रेस के नए आंकड़ों में सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट मुख्य रूप से बिजली क्षेत्र में प्रदूषण कम होने और नवीकरणीय ऊर्जा — जैसे सौर और पवन ऊर्जा — के बढ़ते उपयोग से हुई। दुनिया के 10 बड़े उत्सर्जन क्षेत्रों में 2025 में सबसे अधिक वृद्धि जीवाश्म ईंधन से जुड़े कार्यों में हुई। परिवहन, निर्माण और इमारतों से भी उत्सर्जन बढ़ा। हालांकि बिजली क्षेत्र, जो वैश्विक प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत है, उसमें थोड़ी कमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते उपयोग से कई क्षेत्रों में उत्सर्जन घटने लगा है।
भारत में वायु प्रदूषण अब साल भर का संकट, कई शहरों में बढ़ रहा स्वास्थ्य पर खतरा
भारत में वायु प्रदूषण को लंबे समय से सर्दियों की समस्या माना जाता रहा है, खासकर दिल्ली में दिखने वाले स्मॉग के कारण।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट अब पूरे साल कई शहरों में बना रहता है। लगातार प्रदूषित हवा के संपर्क से हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों की बीमारी और अन्य दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है। क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) भारत में मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। अदृश्य प्रदूषक भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं।
सरकार ने 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम शुरू किया, जिसके तहत 130 से अधिक शहरों में निगरानी बढ़ाई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण केवल शहरों तक सीमित नहीं है और इसके समाधान के लिए क्षेत्रीय स्तर पर समन्वित कदम जरूरी हैं।
ईरान के तेल भंडार पर बमबारी से लंबे समय तक पर्यावरणीय नुकसान की आशंका
ईरान के तेल भंडारण और ईंधन ढांचे पर हुए हवाई हमलों से लंबे समय तक पर्यावरणीय नुकसान होने की आशंका जताई गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार इन हमलों से हवा, पानी और खाद्य श्रृंखला प्रदूषित हो सकती है। तेहरान के उत्तर-पूर्व में स्थित शाहरान तेल डिपो और शाहर-ए ईंधन भंडार पर हमले के दो दिन बाद भी आग जल रही है। ईरान की पर्यावरण एजेंसी ने जहरीले रसायनों के खतरे को देखते हुए लोगों को घरों में रहने की सलाह दी। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल प्रतिष्ठानों के जलने से निकलने वाले रसायन अम्लीय वर्षा (एसिड रेन) का कारण बन सकते हैं और बच्चों, बुजुर्गों तथा बीमार लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकते हैं।
बोकारो स्टील प्लांट से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन दर्ज नहीं: रिपोर्ट
एक नई रिपोर्ट के अनुसार झारखंड के बोकारो स्टील प्लांट से निकलने वाला सल्फर डाइऑक्साइड प्रदूषण आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो रहा है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की रिपोर्ट में कहा गया कि नियमों में खामी के कारण प्लांट की सिंटरिंग यूनिट से निकलने वाला यह प्रदूषण निगरानी से बाहर रह जाता है। रिपोर्ट के अनुसार इसके कारण हर साल लगभग 273 कम वजन वाले बच्चों का जन्म और 284 समय से पहले जन्म के मामले हो सकते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड एक हानिकारक गैस है जो सांस और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों ने बेहतर वायु निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण तकनीक में निवेश बढ़ाने की जरूरत बताई है।
नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार से आयातित ऊर्जा पर घटेगी निर्भरता: मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत को आयातित ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए। केरल में एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों का विस्तार इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार भारत सौर ऊर्जा क्षमता बढ़ाने जैसे कई कदम पहले ही उठा चुका है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और देश धीरे-धीरे ऊर्जा के मामले में अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा।
अमेरिकी जांच के दायरे में भारतीय सोलर मॉड्यूल
अमेरिका ने भारत सहित कुछ देशों के खिलाफ ‘सेक्शन 301’ के तहत जांच शुरू की है। इस जांच का उद्देश्य यह देखना है कि क्या इन देशों में उद्योगों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन हो रहा है, जिससे वैश्विक बाजार प्रभावित हो सकता है। जांच में सोलर मॉड्यूल, बैटरी, ऊर्जा उपकरण और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। अमेरिकी एजेंसी का कहना है कि यदि किसी देश में उत्पादन घरेलू मांग से अधिक होता है, तो कंपनियां ज्यादा निर्यात करती हैं। इससे वैश्विक कीमतें गिर सकती हैं और अन्य देशों के उद्योगों को नुकसान हो सकता है। इस जांच के बाद टैरिफ या अन्य व्यापार प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
चीन की नई पांच वर्षीय योजना में सौर ऊर्जा की भूमिका सीमित
चीन की आगामी 15वीं पांच वर्षीय योजना के मसौदे में सौर ऊर्जा का अपेक्षाकृत कम उल्लेख किया गया है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार इस योजना में 2030 तक नई सौर क्षमता के लिए कोई स्पष्ट लक्ष्य तय नहीं किया गया है।
इसके बजाय चीन ने अपतटीय पवन ऊर्जा (ऑफशोर विंड) और अन्य ऊर्जा परियोजनाओं पर अधिक ध्यान दिया है। योजना में समुद्र में लगने वाली पवन ऊर्जा क्षमता को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही 100 गीगावॉट पंप्ड-स्टोरेज जलविद्युत क्षमता जोड़ने की भी योजना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सौर ऊर्जा को कम महत्व देनेका मतलब इसे छोड़ना नहीं है, बल्कि ऊर्जा परिवर्तन की रणनीति में बदलाव का संकेत हो सकता है।
सौर मिनी-ग्रिड की सफलता बिजली आपूर्ति पर निर्भर: अध्ययन
एक नए अध्ययन में पाया गया है कि सौर मिनी-ग्रिड परियोजनाओं की सफलता बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता और लंबे समय तक अच्छे प्रबंधन पर निर्भर करती है। सौर मिनी-ग्रिड छोटे बिजली नेटवर्क होते हैं जो दूरदराज क्षेत्रों में सौर ऊर्जा से बिजली उपलब्ध कराते हैं।
कोलंबिया के द्वीप समुदायों पर किए गए अध्ययन में देखा गया कि जब बिजली की आपूर्ति भरोसेमंद नहीं रही, तो लोगों ने डीजल जनरेटर का इस्तेमाल शुरू कर दिया। इससे लागत बढ़ी और असमानता भी बढ़ी।
शोधकर्ताओं ने कहा कि केवल बिजली पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। ऐसी परियोजनाओं के लिए मजबूत तकनीकी व्यवस्था, लंबे समय तक प्रशासनिक प्रबंधन और सामाजिक ढांचे में निवेश भी जरूरी है।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का पंजीकरण 5 साल में 91% बढ़ा
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में ईवी पंजीकरण में 91 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह संख्या वित्त वर्ष 2020 में 1.74 लाख से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 19.68 लाख तक पहुँच गई। सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं को इस वृद्धि का बड़ा कारण माना जा रहा है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना के तहत 44,000 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता देकर देश में वाहनों और बैटरी निर्माण को बढ़ावा दिया गया है।
इसके अलावा पीएम ई-ड्राइव योजना से इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहन सस्ते हुए हैं, जिनकी बाजार में सबसे अधिक हिस्सेदारी है। सरकार अब बैटरी क्षमता बढ़ाने और दुर्लभ खनिजों के आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में भी काम कर रही है।
होंडा ने तीन वैश्विक इलेक्ट्रिक कार परियोजनाएं रद्द कीं
होंडा ने वैश्विक बाजार के लिए प्रस्तावित तीन इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) मॉडलों को रद्द करने की घोषणा की है। कंपनी ने यह फैसला उत्तर अमेरिका में ईवी की मांग कम होने और चीनी कंपनियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण लिया है। हालांकि भारत में कंपनी की इलेक्ट्रिक वाहन योजना जारी रहेगी। कंपनी का ‘कांसेप्ट 0 अल्फा’ प्रोजेक्ट भारत की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक पूरी तरह इलेक्ट्रिक एसयूवी होगी, जिसे भारतीय बाजार को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि होंडा अब कम मुनाफे वाले बड़े बाजारों के बजाय भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजारों और सॉफ्टवेयर-आधारित आधुनिक वाहनों पर अधिक ध्यान दे रही है।
पीएम ई-ड्राइव योजना में इलेक्ट्रिक बस और ट्रक की प्रगति धीमी: संसदीय समिति
संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की प्रमुख इलेक्ट्रिक वाहन प्रोत्साहन योजना पीएम ई-ड्राइव में भारी वाहनों के मामले में प्रगति बहुत धीमी है। रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रिक बस, ट्रक और एंबुलेंस जैसी श्रेणियों में अभी तक कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हुई है।
ये वाहन शहरों में वायु प्रदूषण कम करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जनवरी 2026 तक योजना अपने कुल लक्ष्य का लगभग 58.6 प्रतिशत ही हासिल कर पाई है। फिलहाल प्रगति मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों में हुई है। समिति ने सरकार से मध्यम वर्ग के लिए इलेक्ट्रिक कारों को भी योजना में शामिल करने और बजट में कटौती पर पुनर्विचार करने की सिफारिश की है।
प्रतिबंधों में ढील फिर भी तेल महंगा: वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें उछली
रूस से कच्चा तेल खरीदने पर लगे प्रतिबंधों में ढील के अमेरिकी फैसले के बावजूद वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 2.7% बढ़कर 103 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीद पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा के बाद भी कीमतों में गिरावट नहीं आई।
इस क्षेत्र के वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत में पिछले सप्ताह के दौरान 11% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं फरवरी के अंत में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से अब तक इसकी कीमतों में 40% से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है, जिससे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
गैस आपूर्ति पर दबाव घटाने के लिए वैकल्पिक ईंधनों की अनुमति, बढ़ सकता है वायु प्रदूषण
एलपीजी और गैस आपूर्ति चैनलों पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए भारत सरकार ने वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ाने का फैसला किया है। संसद में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि केरोसिन, बायोमास और फ्यूल ऑयल जैसे ईंधनों का उपयोग बढ़ाया जा रहा है ताकि गैस आपूर्ति पर दबाव कम किया जा सके।
सरकार के अनुसार यह कदम गैस की मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को संतुलित करने के लिए उठाया गया है। इसके अलावा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सलाह दी है कि वे व्यावसायिक रसोईघरों को नगरपालिका कचरे से बने पेलेट, कोयला, केरोसिन और बायोमास के उपयोग की अनुमति दें। हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इन ईंधनों का व्यापक उपयोग वायु प्रदूषण बढ़ा सकता है और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में हो रहे प्रयासों को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिका में बनेगी नई तेल रिफाइनरी, रिलायंस के साथ 300 अरब डॉलर का निवेश
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में पिछले पांच दशकों में पहली बार एक नई तेल रिफाइनरी बनाई जाएगी। यह परियोजना टेक्सास के ब्राउनस्विल शहर में स्थापित की जाएगी। इस रिफाइनरी परियोजना को अमेरिका की कंपनी अमेरिका फर्स्ट रीफाइनिंग विकसित करेगी, जिसमें भारत की प्रमुख कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ भी भागीदारी करेगी। रिपोर्टों के अनुसार इस परियोजना में लगभग 300 अरब डॉलर का निवेश प्रस्तावित है।
इस प्रोजेक्ट को फरवरी में तब गति मिली जब अमेरिका फर्स्ट रीफाइनिंग को एक वैश्विक ऊर्जा कंपनी से बड़ी वित्तीय निवेश सहायता मिली। इस निवेश ने परियोजना को आर्थिक मजबूती प्रदान की और इसके निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया।






