
Newsletter - February 28, 2026
जलवायु आपदाएं और मानसिक स्वास्थ्य: भारत में बढ़ता एक ‘मौन संकट’
भारत में बढ़ती जलवायु आपदाएं अब केवल भौतिक विनाश यानी जान-मान की क्षति तक ही सीमित नहीं रह गई हैं। बाढ़, भूस्खलन, हीटवेव, चक्रवात और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएँ न केवल घर, सड़कें और आजीविका नष्ट कर रही हैं, बल्कि लाखों लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डाल रही हैं। हालिया रिपोर्टों और जमीनी अध्ययन बताते हैं कि देश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाएँ एक “मौन मानसिक स्वास्थ्य संकट” को जन्म दे रही हैं — जो अभी तक नीति-निर्माण और आपदा प्रबंधन की मुख्यधारा में पर्याप्त स्थान नहीं पा सका है।
आपदाओं के बाद बढ़ती मानसिक पीड़ा
विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं के बाद मानसिक आघात (ट्रॉमा), अवसाद, चिंता, अनिद्रा और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। कई प्रभावित लोग लंबे समय तक भय, असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता की भावना से जूझते रहते हैं।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएँ लोगों को स्थायी मानसिक दबाव में रख रही हैं। कई परिवार हर मानसून के मौसम में संभावित आपदा की आशंका से भयभीत रहते हैं। विशेषज्ञ इसे “हाइपर-विजिलेंस” यानी अत्यधिक सतर्कता की मानसिक अवस्था बताते हैं, जो लंबे समय में मानसिक थकान और अवसाद को जन्म देती है।
व्यक्तिगत कहानियाँ: दर्द जो आँकड़ों से परे है
कार्बनकॉपी की इस रिपोर्ट में उत्तराखंड के एक गांव का उल्लेख है, जहां लगातार बाढ़ और भूस्खलन ने स्थानीय लोगों की आजीविका और मानसिक संतुलन दोनों को प्रभावित किया। एक स्थानीय निवासी प्रदीप पंवार ने पिछले साल अगस्त में हुई आपदा में – जिसमें 55 लोगों की जान गई और पूरा कस्बा तबाह हो गया – अपनी दुकान और टैक्सी सेवा खो दी, जो परिवार की आय का मुख्य स्रोत थी। आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि प्रदीप की मां मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या कर ली।
ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि जलवायु आपदाओं का प्रभाव केवल भौतिक ढांचे पर नहीं, बल्कि मानवीय मन पर भी पड़ता है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद किए गए अध्ययनों में पाया गया कि प्रभावित आबादी के एक बड़े हिस्से में PTSD, अवसाद और चिंता के लक्षण मौजूद थे। कई लोगों ने स्मृति हानि, बोलने में कठिनाई और सामाजिक अलगाव की शिकायत की।
बच्चों और महिलाओं पर विशेष प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु आपदाओं का प्रभाव समाज के कमजोर वर्गों पर अधिक पड़ता है। बच्चों में भयावह सपने, पढ़ाई में ध्यान की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक अलगाव के लक्षण देखे गए हैं। स्कूलों के बंद होने और विस्थापन के कारण बच्चों की दिनचर्या टूट जाती है, जिससे उनका मानसिक विकास प्रभावित होता है।
महिलाएं, विशेषकर वे जो पहले से आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर स्थिति में हैं, दोहरे बोझ का सामना करती हैं। घर के पुनर्निर्माण, बच्चों की देखभाल और आर्थिक असुरक्षा के बीच वे मानसिक तनाव झेलती हैं, परंतु सहायता के लिए आगे नहीं आ पातीं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) भी सहायता लेने में बाधा बनता है।
आर्थिक असुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध
जलवायु आपदाओं के बाद आजीविका का नुकसान मानसिक संकट को और गहरा करता है। किसान फसल नष्ट होने से कर्ज में डूब जाते हैं, छोटे व्यवसायी अपनी पूंजी गंवा बैठते हैं, और दिहाड़ी मजदूरों की आय अचानक समाप्त हो जाती है। आर्थिक असुरक्षा लंबे समय तक अवसाद और चिंता को जन्म देती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपना घर, जमीन या व्यवसाय खो देता है, तो वह केवल संपत्ति नहीं खोता — वह अपनी पहचान और सामाजिक स्थिरता भी खो देता है। यह भावनात्मक क्षति कई बार शारीरिक क्षति से अधिक गंभीर होती है।
तटीय और शहरी क्षेत्रों की स्थिति
तटीय राज्यों में चक्रवात और समुद्री तूफानों की आवृत्ति बढ़ रही है। मछुआरा समुदायों में भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। बार-बार के विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया लोगों को मानसिक रूप से थका देती है।
शहरी क्षेत्रों में भी हीटवेव और अचानक आई बाढ़ मानसिक दबाव बढ़ा रही है। अत्यधिक गर्मी के दौरान चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और थकान बढ़ती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि तापमान बढ़ने के साथ आत्महत्या दर में भी वृद्धि हो सकती है।
आपदा प्रबंधन में मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी
भारत में आपदा प्रबंधन तंत्र मुख्यतः राहत, पुनर्वास और बुनियादी ढांचे की मरम्मत पर केंद्रित रहता है। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य सहायता अक्सर अल्पकालिक और सीमित होती है। आपदा के तुरंत बाद कुछ काउंसलिंग शिविर या हेल्पलाइन शुरू की जाती हैं, लेकिन दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक सहायता की कमी बनी रहती है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि आपदा के बाद मानसिक आघात कई महीनों या वर्षों तक बना रह सकता है। ऐसे में केवल तत्काल राहत पर्याप्त नहीं है। समुदाय-आधारित समर्थन, नियमित परामर्श और सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
नीतिगत पहल और चुनौतियाँ
विश्व स्वास्थ्य संगठनों और राष्ट्रीय स्तर पर कुछ दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिनमें आपदाओं के दौरान मनोसामाजिक सहायता को शामिल करने की सिफारिश की गई है। जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के माध्यम से कुछ क्षेत्रों में सेवाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित काउंसलरों की संख्या में कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाओं की अनुपलब्धता बड़ी बाधाएं हैं। मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं किया गया है।
आगे की राह: समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य को अलग-अलग मुद्दों के रूप में नहीं देखा जा सकता। एक समग्र रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें निम्नलिखित कदम शामिल हों:
- आपदा प्रबंधन योजनाओं में मानसिक स्वास्थ्य को अनिवार्य घटक बनाना
- स्कूलों और समुदायों में मनोसामाजिक सहायता कार्यक्रम चलाना
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में काउंसलिंग सेवाओं का विस्तार
- महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सहायता योजनाएँ
- आर्थिक पुनर्वास के साथ मानसिक पुनर्वास का एकीकृत मॉडल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसिक स्वास्थ्य को अनदेखा किया गया, तो इसका प्रभाव दीर्घकाल में सामाजिक उत्पादकता, शिक्षा और सामुदायिक स्थिरता पर पड़ेगा।
निष्कर्ष
भारत में जलवायु आपदाओं की बढ़ती तीव्रता और आवृत्ति केवल पर्यावरणीय या आर्थिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह एक गहरा मानवीय संकट भी है। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव अक्सर अदृश्य रहते हैं, लेकिन उनका असर गहरा और दीर्घकालिक होता है।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में आवश्यक है कि नीति-निर्माता, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समाज मिलकर ऐसी रणनीति तैयार करें जो न केवल घरों और सड़कों का पुनर्निर्माण करे, बल्कि लोगों के मन और आत्मविश्वास को भी पुनर्स्थापित करे।
जलवायु आपदाएं प्रकृति की चेतावनी हैं — और यह समय है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता से लें जितनी भौतिक पुनर्निर्माण को।
(यह रिपोर्ट विस्तार से अंग्रेज़ी में यहां पढ़ी जा सकती है।)
2°C तापवृद्धि पर भी शहर गांवों से कहीं तेज़ गर्म हो सकते हैं
एक नए अध्ययन में पाया गया है कि वैश्विक तापमान में 2°C की वृद्धि की स्थिति में भी दुनिया के 104 उष्णकटिबंधीय शहरों में से 81% शहर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से गर्म होंगे। मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार, भारत शहरी वॉर्मिंग के बढ़ते खतरे का एक प्रमुख हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है।
अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से भारत के मध्यम आकार के शहर—जैसे पटियाला और उत्तर भारत के अन्य शहर—क्षेत्रीय अनुमानों से कहीं अधिक तापवृद्धि दर्ज कर रहे हैं। इससे यह चिंता बढ़ी है कि पारंपरिक जलवायु मॉडल शहरी इलाकों में गर्मी के वास्तविक जोखिम को कम करके आंक रहे हैं।
भारत में शीतलहर का पैटर्न बदल रहा, अब ये सर्दियों तक सीमित नहीं
डाउन टू अर्थ (DTE) के विश्लेषण के मुताबिक, फरवरी 2026 पिछले पांच वर्षों में पहला ऐसा महीना रहा जब देश में एक भी शीतलहर दर्ज नहीं की गई। जनवरी 2026 में भारत में 24 शीतलहर/कोल्ड डे घटनाएं दर्ज की गईं, लेकिन फरवरी में ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी।
28 फरवरी को आधिकारिक तौर पर सर्दी का मौसम समाप्त हो चुका है और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से 2-4°C अधिक रहने का अनुमान जताया है। इससे संकेत मिलता है कि शीतलहर की घटनाएं अब पारंपरिक शीत महीनों तक सीमित नहीं रह गई हैं और मौसम के पैटर्न में बदलाव साफ दिखाई दे रहा है।
दक्षिणी हिंद महासागर की लवणता घट रही, वैश्विक तापन जिम्मेदार: अध्ययन
कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन के हवाले से डाउन टु अर्थ ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पश्चिमी तट के पास स्थित दक्षिणी हिंद महासागर—जो वैश्विक महासागरों के सबसे खारे क्षेत्रों में से एक है—तेजी से मीठा हो रहा है। सतह पर लवणता में कमी से उथले जल में खाद्य उपलब्धता घट रही है, जिससे समुद्री जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अध्ययन के अनुसार, पिछले छह दशकों में इस अत्यधिक खारे क्षेत्र का आकार 30% तक घट गया है। यह दक्षिणी गोलार्ध में मीठे पानी की मात्रा में दर्ज की गई सबसे तेज़ वृद्धि है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस क्षेत्र में पहुंचने वाला अतिरिक्त मीठा पानी इतना है कि वह अमेरिका की पूरी आबादी को 380 वर्षों तक पेयजल उपलब्ध करा सकता है।
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव स्थानीय वर्षा में परिवर्तन के कारण नहीं, बल्कि वैश्विक तापन के चलते हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपर सतही वायु प्रवाह में बदलाव के कारण हो रहा है। इन हवाओं में परिवर्तन से समुद्री धाराएं इंडो-पैसिफिक के मीठे पानी को दक्षिणी हिंद महासागर की ओर मोड़ रही हैं।
इस प्रक्रिया के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। कम मिश्रण (मिक्सिंग) के कारण गहरे जल के पोषक तत्व सतह तक नहीं पहुंच पाते, जिससे उथले जल में रहने वाले जीवों के लिए भोजन कम हो जाता है। साथ ही, सतही जल की अतिरिक्त गर्मी गहराई में नहीं जा पाती, जिससे सतह का पानी और अधिक गर्म हो जाता है—जो पहले से तापवृद्धि से जूझ रहे समुद्री जीवों के लिए और घातक साबित हो सकता है।
वैश्विक तापमान 1.5°C लक्ष्य से आगे बढ़ना ‘टिपिंग प्वाइंट’ जोखिम बढ़ा सकता है: समीक्षा
एक नई समीक्षा में चेतावनी दी गई है कि यदि वैश्विक तापमान 1.5°C की सीमा से ऊपर चला जाता है, तो पृथ्वी प्रणाली के कई संवेदनशील ‘टिपिंग एलिमेंट्स’ अपने निर्णायक बिंदु (टिपिंग प्वाइंट) को अस्थायी रूप से पार कर सकते हैं। हाल के वर्षों में उत्सर्जन में कमी की रफ्तार धीमी रहने के कारण 2020 के दशक के अंत या 2030 के दशक में 1.5°C सीमा पार होने की आशंका बढ़ गई है।
अध्ययन में कहा गया है कि तापमान में ‘ओवरशूट’ की अवधि और तीव्रता को कम रखना जोखिम घटाने में अहम होगा। तेज़ प्रतिक्रिया समय वाले तंत्र—जैसे गर्म पानी की प्रवाल भित्तियां—ओवरशूट के प्रति बेहद संवेदनशील हैं, जबकि ध्रुवीय हिमचादर जैसे धीमी प्रतिक्रिया वाले तंत्र अस्थायी ओवरशूट से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, अमेज़न में वनों की कटाई या प्रवाल भित्तियों पर प्रदूषण और अत्यधिक मछली पकड़ने जैसी मानवीय गतिविधियां इन टिपिंग प्वाइंट्स को और नजदीक ला सकती हैं, जिससे सुरक्षित तापवृद्धि का दायरा और संकरा हो जाएगा।
समेकित रणनीतियां मिट्टी की सेहत, एंटीबायोटिक प्रतिरोध और खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं: अध्ययन
एक नए अध्ययन में जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य के बीच गहरे संबंधों की पड़ताल की गई है। शोध में कहा गया है कि पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती और सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण को एक साथ संबोधित करने वाली समेकित रणनीतियां समय की मांग हैं।
मिट्टी की सेहत सुधारने, एंटीबायोटिक प्रतिरोध कम करने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने से न केवल जलवायु संकट से निपटने में मदद मिल सकती है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और जनस्वास्थ्य में भी सुधार संभव है।
शोधकर्ताओं ने जैविक खाद के उपयोग, फसल चक्र अपनाने, कम जुताई और एंटीबायोटिक के जिम्मेदार उपयोग जैसे उपायों को प्रमुख बताया। इन उपायों से पारिस्थितिकी तंत्र की लचीलापन क्षमता बढ़ेगी और दीर्घकालिक टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलेगा।
एनजीटी ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को दी हरी झंडी, कहा पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद
नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) ने ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल को मंजूरी दे दी है और कहा है कि पर्यावरण मंजूरी की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं।
एनजीटी ने यह फैसला लंबी कानूनी सुनवाई के बाद दिया। याचिकाओं में आरोप था कि परियोजना तटीय नियमों का उल्लंघन करती है। ये नियम पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील तटीय इलाकों में बड़े निर्माण पर रोक लगाते हैं।
अदालत की ओर से गठित समिति ने मंजूरी प्रक्रिया में कोई बड़ी खामी नहीं पाई, और एनजीटी ने समिति के निष्कर्षों को स्वीकार किया। हालांकि पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों को लेकर चिंता बनी हुई है। यह भी सवाल उठ रहे हैं कि 81 हजार करोड़ रुपए की इस परियोजना द्वारा बड़े वन क्षेत्र और आदिवासी भूमि के उपयोग में किस तरह बदलाव संभव है।
सितंबर तक शुरू होगा भारत का कार्बन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म: सरकार
केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार देश में कार्बन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म सितंबर तक शुरू हो सकता है। कार्बन ट्रेडिंग एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कंपनियां अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर प्रमाण पत्र की खरीद-बिक्री कर सकती हैं। इससे नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा। भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य रखा है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अध्यक्ष घनश्याम प्रसाद ने बताया कि नवीकरणीय परियोजनाओं के लिए पावर परचेज़ एग्रीमेंट यानी बिजली खरीद समझौते कम हो रहे हैं। ऐसे में बाजार आधारित नई व्यवस्था लाई जा रही है।
कोयला-आधारित तापीय संयंत्रों को उत्पादन में लचीलापन लाने और कम उपयोग पर प्रोत्साहन देने की योजना भी प्रस्तावित है। ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने कहा कि देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता 520 गीगावाट से अधिक हो चुकी है, जिसमें आधे से ज्यादा हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों का है।
शहरी गर्मी से अर्थव्यवस्था पर बढ़ा खतरा: विशेषज्ञ
सर्दी खत्म होते ही देश के कई शहरों में दिन का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। शहरी इलाकों में बढ़ती गर्मी अब बड़ी समस्या बन गई है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक बैठक में विशेषज्ञों ने कहा कि गर्मी से जुड़ा पर्याप्त डेटा नहीं होने के कारण उद्योग जोखिम का सही आकलन नहीं कर पा रहे हैं।
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मुंबई के चेयरमैन विजय कलंत्री ने चेतावनी दी कि यदि बढ़ती गर्मी पर रोक नहीं लगी तो देश की जीडीपी में 2.5 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। जीडीपी किसी देश की कुल आर्थिक उत्पादन क्षमता को दर्शाता है।
आईटीसी लिमिटेड ने माना कि फैक्ट्रियों और गोदामों में हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है। काउंसिल फॉर एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर के विशेषज्ञों ने बेहतर शहर नियोजन और कम लागत वाले उपायों पर जोर दिया। कपड़ा उद्योग में काम करने वाले मजदूरों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ रहा है।
अफ्रीका से कूनो पहुंचे 9 और चीते
मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बोत्सवाना से लाए गए नौ चीते शनिवार को पहुंच गए। इन्हें भारतीय वायु सेना के विमान से ग्वालियर लाया गया और फिर हेलिकॉप्टर से कूनो पहुंचाया गया। केंद्रीय वन मंत्री भूपेंदर यादव ने छह मादा और तीन नर चीतों को क्वारंटीन बाड़े में छोड़ा। इसके साथ ही भारत में चीतों की कुल संख्या 48 हो गई है। यह चार साल की पुनर्वास योजना का हिस्सा है। 1950 के दशक में भारत से चीते विलुप्त हो गए थे। कूनो में अब तक 39 शावकों का जन्म हुआ, जिनमें 27 जीवित हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने बंद की प्रदूषित नदियों पर सुनवाई, एनजीटी को निगरानी का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में प्रदूषित नदियों की सफाई पर शुरू की गई स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) कार्यवाही बंद कर दी है। अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) की प्रधान पीठ को मामले पर दोबारा संज्ञान लेकर नियमित निगरानी करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ पानी और प्रदूषण-मुक्त वातावरण में जीना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है।
अदालत ने माना कि नदियों में प्रदूषण पर पहले से एनजीटी सुनवाई कर रहा था, इसलिए समानांतर कार्यवाही उचित नहीं थी। जल अधिनियम के तहत केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की जिम्मेदारी है कि बिना ट्रीटमेंट के सीवेज नदियों में न छोड़ा जाए। मामला यमुना में बढ़ते प्रदूषण से जुड़ा था, जिसे बाद में सभी प्रमुख नदियों तक बढ़ाया गया था।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण से बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित: सर्वे
दिल्ली-एनसीआर में 6 से 15 वर्ष के 1,257 बच्चों पर किए गए एक नए सर्वे में वायु प्रदूषण के गंभीर असर सामने आए हैं। ‘चिल्ड्रन अंडर सीज’ नामक यह अध्ययन दिल्ली की संस्था चिंतन ने जारी किया। सर्वे दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के अधिक प्रदूषण वाले महीनों में किया गया।
करीब 70% बच्चों ने खराब हवा के कारण तनाव और चिंता महसूस की। 77% ने कहा कि प्रदूषण से डर, चिड़चिड़ापन और घबराहट होती है। 86% बच्चों का मानना है कि प्रदूषित हवा से स्वास्थ्य बिगड़ता है। वहीं 44% बच्चों को सांस, खांसी या सिरदर्द जैसी समस्याओं के लिए डॉक्टर के पास जाना पड़ा। 55% बच्चे बीमारी के कारण स्कूल नहीं जा सके। कई बच्चों ने आंखों में जलन और थकान की शिकायत भी की।
दिल्ली-एनसीआर में उद्योगों के लिए कड़े किए गए प्रदूषण मानक
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों में स्थित उद्योगों के लिए पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) उत्सर्जन की सीमा घटाकर 50 मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर करने का प्रस्ताव दिया है। पहले यह सीमा 80 मिलीग्राम थी, जो जून 2022 में तय की गई थी। यह फैसला केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आईआईटी कानपुर के अध्ययन की सिफारिशों पर आधारित है। तकनीकी समिति ने माना कि 50 मिलीग्राम की सीमा तकनीकी रूप से संभव और पर्यावरण के लिए जरूरी है।
यह नियम 17 अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों और अन्य बड़े व मध्यम उद्योगों पर लागू होगा। बड़े और मध्यम उद्योगों को 1 अगस्त से, जबकि अन्य को 1 अक्टूबर से इसका पालन करना होगा। राज्यों को सख्ती से अमल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
मुंबई में 1,000 से अधिक निर्माण स्थलों पर काम रोका गया
मुंबई में वायु प्रदूषण रोकने के लिए राज्य सरकार और नगर निकाय ने सख्त कार्रवाई की है। पर्यावरण मानकों का उल्लंघन करने पर 1,000 से अधिक निर्माण स्थलों को काम बंद करने का नोटिस दिया गया है। यह जानकारी राज्य की मंत्री पंकजा मुंडे ने विधानसभा में दी। अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच 1,981 कारण बताओ नोटिस और 1,047 काम रोकने के आदेश जारी किए गए। 2,224 सक्रिय स्थलों में से 1,952 ने कम लागत वाले वायु गुणवत्ता सेंसर लगाए हैं। 16 जनवरी को 678 परियोजनाओं को सेंसर न लगाने पर रोका गया।
अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने भारतीय सौर उत्पादों पर 126 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। यह कदम प्रारंभिक एंटी-सब्सिडी जांच के बाद उठाया गया। एंटी-सब्सिडी जांच में देखा जाता है कि क्या किसी कंपनी को सरकार से अनुचित वित्तीय मदद मिली है। अडानी ग्रुप की दो कंपनियां – मुंद्रा सोलर एनर्जी और मुंद्रा सोलर पीवी – जांच में शामिल नहीं हुईं। उन्हें अनिवार्य उत्तरदाता माना गया था। सहयोग न करने पर ‘एडवर्स फैक्ट्स अवेलेबल’ नियम लागू किया गया। इसका मतलब है कि जांच एजेंसी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कड़ी सजा तय करती है। इस फैसले से भारतीय सौर निर्यात पर बड़ा असर पड़ सकता है।
फ्लोटिंग सोलर नीति पर केंद्र ने मांगे राज्यों के सुझाव
केंद्र सरकार ने फ्लोटिंग सोलर नीति के मसौदे पर हितधारकों से चर्चा की है। फ्लोटिंग सोलर की संभावित क्षमता की आकलन रिपोर्ट नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोलर एनर्जी ने पेश की है, जबकि नीति आईआईटी-रुड़की ने बनाई है। रिपोर्ट के अनुसार सौर परियोजनाओं के लिए जमीन की कमी के कारण फ्लोटिंग सोलर को विकल्प माना जा रहा है। अभी तक भारत में लगभग 700 मेगावाट फ्लोटिंग सोलर परियोजनाएं शुरू हुई हैं। सरकार ने राज्यों से जल, वन, कृषि और बिजली विभागों से राय लेकर सुझाव भेजने को कहा है।
मौजूदा वित्तीय वर्ष के अंत तक बिजली उत्पादन में 26% होगी नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी
रेटिंग एजेंसी इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के अंत तक कुल बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत हो जाएगी। 2026 के पहले नौ महीनों में 49 गीगावाट नई क्षमता जुड़ी। यह 2030 तक 500 गीगावाट लक्ष्य की दिशा में प्रगति दिखाता है। इस अवधि में बिजली उत्पादन वृद्धि का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से आया। इससे स्वच्छ ऊर्जा का योगदान तेजी से बढ़ रहा है।
2025 में बैटरी स्टोरेज की लागत रिकॉर्ड निचले स्तर पर
ब्लूमबर्गएनईएफ की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में बैटरी स्टोरेज परियोजनाओं की लागत रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। चार घंटे की बैटरी परियोजना की वैश्विक औसत लागत 27 प्रतिशत घटकर 78 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटा रही। बैटरी पैक सस्ते होने और तकनीक बेहतर होने से लागत घटी है। इससे सौर ऊर्जा के साथ बैटरी जोड़ने वाली परियोजनाएं बढ़ी हैं। वहीं सौर और पवन परियोजनाओं की लागत में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इलेक्ट्रिक वाहनों का ज़ीरो-एमिशन दर्जा खत्म करेगी सरकार
भारत सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों का शून्य-उत्सर्जन, यानी ज़ीरो-एमिशन का दर्जा खत्म करने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित नियमों के तहत अब इलेक्ट्रिक वाहनों में होने वाली ऊर्जा खपत को भी गिना जाएगा। मसलन यह पता लगाया जाएगा कि एक ईवी को 100 किमी कवर करने में कितने किलोवाट-ऑवर (kWh) ऊर्जा खर्च होती है, फिर उसे 100 किमी में खपत होने वाली पेट्रोल की बराबर मात्रा में बदला जाएगा।
एक किलोवाट-ऑवर 3.6 मेगाजूल ऊर्जा के बराबर होता है, जबकि एक लीटर पेट्रोल में लगभग 35 मेगाजूल ऊर्जा होती है। इससे कंपनियों की कुल ऊर्जा खपत का आकलन किया जाएगा।
यह बदलाव कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी यानी सीएएफई मानकों के तहत होगा, जिन्हें ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत लागू किया जाता है। अभी कंपनियां इलेक्ट्रिक कार बेचकर सुपर क्रेडिट पाती हैं और ज्यादा प्रदूषण वाली पेट्रोल-डीजल कारों की भरपाई कर लेती हैं। सरकार चाहती है कि सभी वाहन अधिक एनर्जी-एफिशिएंट बनें।
स्टेलांटिस, लेम्बोर्गिनी ने ठंडे बस्ते में डाली ईवी योजना
वैश्विक ऑटो उद्योग में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। स्टेलांटिस (Stellantis) ने पिछले साल 22.3 अरब यूरो का शुद्ध घाटा दर्ज किया और इलेक्ट्रिक कारों की मांग कमजोर रहने को इसकी बड़ी वजह बताया। कंपनी अब पूरी तरह ईवी पर दांव लगाने के बजाय पेट्रोल-डीजल और हाइब्रिड मॉडलों पर फिर से जोर दे रही है। इसी तरह लेम्बोर्गिनी (Lamborghini) ने अपनी पूरी तरह इलेक्ट्रिक ‘लैंजाडोर’ परियोजना रोक दी है और वी8-वी12 इंजन वाली सुपरकारें जारी रखने का फैसला किया है।
प्लग-इन हाइब्रिड में बैटरी और पारंपरिक इंजन दोनों होते हैं। उद्योग विशेषज्ञ मानते हैं कि सब्सिडी में कटौती, ऊंची लागत, बैटरी की महंगाई और धीमी ग्राहक स्वीकृति से ईवी क्षेत्र दबाव में है। कई देश अब उत्सर्जन लक्ष्यों में भी ढील दे रहे हैं।
2030 तक ईवी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चाहिए होगी 10 लाख करोड़ रुपए की फंडिंग
इंस्टिट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2020 से 2025 के बीच इलेक्ट्रिक परिवहन क्षेत्र में लगभग 2.23 लाख करोड़ रुपए निवेश किए। यह राशि विनिर्माण क्षमता, सरकारी प्रोत्साहन और पब्लिक चार्जिंग ढांचे पर खर्च हुई। लेकिन 2030 तक तय लक्ष्यों को पाने के लिए करीब 12.5 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है। यानी 10 लाख करोड़ रुपए से अधिक की कमी अभी बाकी है।
रिपोर्ट में एक ‘इंटीग्रेटेड फाइनेंसिंग प्लेटफार्म’ मंच का सुझाव दिया गया है। इसमें आंशिक क्रेडिट गारंटी, बैटरी-एज-ए-सर्विस और को-लेडिंग स्ट्रक्चर शामिल होगी, ताकि बैंकों का जोखिम घटे। क्रेडिट गारंटी का मतलब है कि कर्ज न चुकाने पर आंशिक सुरक्षा मिले। सरकार का लक्ष्य 2030 तक निजी कारों में 30 प्रतिशत और दो-तीन पहिया वाहनों में 80 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक की करना है।
ईरान हमले से बढ़ा तनाव, वैश्विक तेल आपूर्ति पर गहराया संकट
शनिवार को अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने पश्चिम-एशिया के कई तेल निर्यातक देशों पर मिसाइल दागे हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव गंभीर रूप से बढ़ा है। हमले के बाद तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं और बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। ईरान से ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें $70-$73 या उससे ऊपर पहुंच चुकी हैं, और अगर संघर्ष जारी रहा तो $80 या $110 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही बाधित हुई तो संकट और गंभीर हो सकता है। होर्मुज से दुनिया के लगभग 20% तेल की खेप गुजरती है और अगर यह मार्ग बाधित होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में बड़ी परेशानी आ सकती है।
भारत जैसे तेल आयातक देशों की लगभग आधी मासिक तेल खपत इसी मार्ग से आती है। तेल की कीमतें बढ़ने से सभी देशों के लिए ऊर्जा महंगी हो सकती है जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ेगा। वैश्विक तेल आपूर्ति पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण बाधित है, क्योंकि रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों से उसके निर्यात को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और तेल बाजार अस्थिर है; वहीं अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल टैंकर और कच्चे तेल पर नियंत्रण के लिए कार्रवाई की है, जिससे आपूर्ति चैनलों में और अनिश्चितता पैदा हो रही है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तेल कंपनियों को 467 अरब डॉलर का मुनाफा
रूस द्वारा 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों ने भारी मुनाफा कमाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बीपी, शेवरॉन, एक्सॉनमोबिल, शेल और टोटलएनर्जीज़ ने मिलकर अब तक 467 अरब डॉलर का लाभ अर्जित किया है। यह विश्लेषण 24 फरवरी को युद्ध के चार साल पूरे होने पर जारी किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि इन कंपनियों का संयुक्त मुनाफा 2021 में 87 अरब डॉलर था, जो 2022 में बढ़कर 195 अरब डॉलर हो गया। रिपोर्ट का कहना है कि कई प्रमुख तेल और गैस कंपनियों ने इस अतिरिक्त कमाई का उपयोग स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाने के बजाय जीवाश्म ईंधन के उत्पादन को और बढ़ाने तथा शेयरधारकों को अधिक लाभ देने में किया।







