Vol 2, January 2026 | वायु प्रदूषण नियंत्रण से भारत को हो सकता है 220 अरब डॉलर का फायदा

आर्थिक सर्वेक्षण में फसल प्राथमिकताओं में बदलाव को लेकर शुरुआती चेतावनी

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम फसलों की प्राथमिकताओं को बदल रहा है। किसान दालों और तिलहनों की बजाय मक्का को तरजीह दे रहे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है। मौजूदा रुझानों को ‘शुरुआती चेतावनी संकेत’ बताते हुए सर्वेक्षण ने खाद्य तेल आयात पर बढ़ती निर्भरता और खाद्य कीमतों में अस्थिरता की आशंका जताई है। इसमें ऊर्जा आत्मनिर्भरता और खाद्य आत्मनिर्भरता के बीच टकराव की ओर भी इशारा किया गया है। 

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, मक्का तेजी से भारत के एथेनॉल कार्यक्रम का एक प्रमुख लेकिन विवादास्पद कच्चा माल बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2025 के बीच मक्का उत्पादन में 8.77 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) दर्ज की गई, जबकि इसके तहत क्षेत्रफल में 6.68 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

इसी अवधि में दालों के उत्पादन और रकबे में गिरावट देखी गई, जबकि तिलहनों के उपज क्षेत्रफल में सालाना केवल 1.7 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई। मक्का को छोड़कर अन्य अनाजों की वृद्धि 2.9 प्रतिशत रही। सर्वेक्षण ने चेताया है कि ये सभी भारत की विभिन्न फलों की खपत टोकरी (Consumption Basket) और पोषण परिणामों के लिए बेहद अहम हैं, लेकिन किसानों की प्राथमिकता सूची में नीचे खिसकते जा रहे हैं। खपत टोकरी उन वस्तुओं और सेवाओं का समूह है, जिन्हें किसी देश के आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नियमित रूप से उपभोग करते हैं। यह टोकरी बताती है कि लोग क्या खाते हैं, क्या इस्तेमाल करते हैं और किन बुनियादी चीज़ों पर खर्च करते हैं। लंबे समय में यह असंतुलन खाद्य तेल आयात पर निर्भरता को पुख्ता कर सकता है और आपूर्ति झटकों के दौरान घरेलू खाद्य कीमतों को अधिक अस्थिर बना सकता है।

हिमालय–काराकोरम में ग्लेशियल बाढ़ जोखिम का आकलन और निगरानी कमजोर: अध्ययन

वैश्विक तापवृद्धि के कारण हिमालय–काराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों का विस्तार जोखिम आकलन और अनुकूलन प्रयासों से कहीं तेज हो रहा है। इससे लगभग दस लाख लोग ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे में हैं।

इस महीने NPJ Natural Hazards जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि ग्लेशियल झीलों की बढ़ती संख्या, आकार और जल मात्रा के बावजूद उनके जोखिम का समुचित आकलन नहीं किया गया है, जबकि विनाशकारी बाढ़ की आशंका बनी हुई है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि डेटा की कमी, सीमित फील्ड अध्ययन और कमजोर प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां अनुकूलन को बाधित कर रही हैं।

धरती के गर्म होने के साथ ग्लोबल साउथ में एसी की मांग में तेज़ उछाल

नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस जैसे अपेक्षाकृत गरीब देशों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंचने से पहले ही शीतलन यानी कूलिंग की मांग तेज़ी से बढ़ेगी। इसके लिए शुरुआती स्तर पर ही बड़े पैमाने पर अनुकूलन उपायों की जरूरत होगी। अध्ययन के प्रमुख लेखक के अनुसार, अगले पांच वर्षों में कई घरों में एयर कंडीशनर लगाने की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि, यदि वैश्विक तापवृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचती है, तो इसके बाद भी तापमान बढ़ता रहेगा। 

अध्ययन के हवाले से बताया गया कि 2050 तक, यदि वैश्विक तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो करीब 3.8 अरब लोगों — यानी दुनिया की लगभग आधी आबादी — को अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ेगा। 

जब तापवृद्धि 1 डिग्री से 2 डिग्री सेल्सियस तक जाएगी तो भारत में ही कूलिंग डिग्री डेज़ (दिनों) में 13.4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। कूलिंग डिग्री डेज़ 18.3 डिग्री सेल्सियस के आधार तापमान से औसत तापमान के अंतर को मापते हैं और एसी की जरूरत का संकेतक माने जाते हैं। इसके उलट, कनाडा, रूस, नॉर्वे और स्वीडन जैसे समृद्ध उत्तरी देशों में बिजली के बिलों में बचत हो सकती है, जबकि विकासशील देशों को कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली ग्रिड विस्तार और एसी चलाने की ऊर्जा लागत का भारी बोझ उठाना पड़ेगा — खासकर उन क्षेत्रों में जहां बिजली की आपूर्ति पहले से ही अनिश्चित है।

पेरिस समझौते से ऑटो सेक्टर की रणनीतियों में बड़ा बदलाव नहीं: अध्ययन

साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक नए अध्ययन के मुताबिक, पेरिस समझौते का उद्योगों — खासतौर पर ऑटोमोबाइल क्षेत्र — की कारोबारी रणनीतियों पर सीमित असर पड़ा है। अध्ययन में दुनिया के 12 बड़े वाहन निर्माताओं का विश्लेषण किया गया, जो वैश्विक वाहन उत्पादन के लगभग 80 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं।

शोधकर्ताओं ने रणनीतिक बदलाव का आकलन करने के लिए छह तरह के प्राथमिक साक्ष्यों का इस्तेमाल किया। नतीजों में पेरिस समझौते से सीधे जुड़ी डीकार्बनाइजेशन रणनीतियों के केवल सीमित संकेत मिले। अध्ययन के अनुसार, कंपनियों की प्रतिक्रियाएं अधिकतर क्रमिक (इंक्रीमेंटल) रहीं, न कि परिवर्तनकारी (ट्रांसफोरमेटिव)। यह निष्कर्ष पेरिस समझौते के प्रभाव को लेकर आशावादी दावों को चुनौती देता है और जलवायु परिवर्तन से निपटने में अंतरराष्ट्रीय समझौतों की सीमाओं को समझने की जरूरत पर जोर देता है।

क्लाइमेट एक्शन भारत की विकास रणनीति का अहम हिस्सा: आर्थिक सर्वे

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, क्लाइमेट एक्शन अब केवल पर्यावरण से जुड़ा अतिरिक्त मुद्दा नहीं है बल्कि भारत की विकास रणनीति का मूल हिस्सा बन चुका है। सर्वे में कहा गया है कि ग्लोबल नार्थ के देश अपने जलवायु वादों पर ढिलाई बरत रहे हैं, ऐसे में भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास की उपलब्धियां प्रभावित न हों। भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर वैश्विक औसत से कम है, फिर भी जलवायु परिवर्तन आजीविका, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा करता है। सर्वे के मुताबिक, अनुकूलन (एडॉप्टेशन) भारत की जलवायु नीति का केंद्र है, जिसे सार्वजनिक निवेश और समुदाय आधारित प्रयासों से आगे बढ़ाया जा रहा है। साथ ही, वित्त और तकनीक के पर्याप्त वैश्विक सहयोग के बिना उत्सर्जन कटौती की महत्वाकांक्षा बढ़ाना न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत।

एनर्जी ट्रांज़िशन: क्रिटिकल मिनरल्स बने नए रणनीतिक ‘चोकपॉइंट’

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि वैश्विक ऊर्जा ट्रांज़िशन अब केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण से तय हो रहा है। तांबा, लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मैटेरियल लो-कार्बन अर्थव्यवस्था के लिए नए ‘रणनीतिक चोकपॉइंट’ बन गए हैं। इंडोनेशिया, कांगो और चिली में खनन बाधाओं के कारण तांबे की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। सर्वे ने चेताया कि विकसित देशों द्वारा मानक और प्रमाणन लागू करने से विकासशील देशों के लिए लागत बढ़ सकती है और वे केवल कच्चे माल का निर्यातक बनकर रह सकते हैं। भारत ने राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के जरिए घरेलू क्षमता और वैश्विक सहयोग के संतुलन पर जोर दिया है।

तात्कालिक जोखिम के तौर पर जलवायु संकट की प्राथमिकता घटी: डब्ल्यूईएफ

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, बढ़ते जिओ-पॉलिटिकल और जिओ-इकोनॉमिक तनावों के कारण चरम मौसम और जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों को अब तात्कालिक वैश्विक जोखिम के तौर पर वरीयता नहीं दी जा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव से संवेदनशील देशों के लिए जलवायु वित्त और अनुकूलन सहायता धीमी पड़ सकती है। हालांकि, दीर्घकाल में जलवायु परिवर्तन अब भी दुनिया का सबसे गंभीर जोखिम बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा अगले दशक में पार हो सकती है, जिससे हीटवेव, सूखा और जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ेंगी। मल्टीपोलर वैश्विक व्यवस्था और संरक्षणवाद के कारण पर्यावरणीय मुद्दों पर वैश्विक सहयोग कमजोर पड़ रहा है।

कमजोर क्लाइमेट डिस्क्लोजर के कारण वैश्विक पूंजी से वंचित रह सकती हैं भारतीय कंपनियां: रिपोर्ट

एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) व्यवस्था वैश्विक अंतरराष्ट्रीय सस्टेनेबिलिटी मानक बोर्ड (आईएसएसबी) के ढांचे के अनुरूप नहीं है। इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कंपनियों के क्लाइमेट डिस्क्लोज़र (वे जानकारियां जिनमें कंपनियां अपने कार्बन उत्सर्जन, जलवायु जोखिम और उन्हें कम करने की योजनाओं को सार्वजनिक करती हैं) सामान्य और असंगठित बने रहे तो उन्हें पूंजी जुटाने में दिक्कत आ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नेट-जीरो लक्ष्यों की विश्वसनीयता के लिए स्पष्ट, मानकीकृत और भविष्य-उन्मुख रिपोर्टिंग जरूरी है। हालांकि बीआरएसआर में सामाजिक पहलुओं पर जोर दिया गया है, लेकिन जलवायु ट्रांज़िशन योजना से जुड़े अहम तत्व इसमें कमजोर पाए गए हैं।

अप्रैल से लागू होंगे नए ठोस कचरा प्रबंधन नियम

केंद्र सरकार ने नए ठोस कचरा (अपशिष्ट) प्रबंधन नियमों को अधिसूचित कर दिया है, जो 1 अप्रैल से लागू होंगे। इन नियमों के तहत सोर्स पर कचरे का चार श्रेणियों –गीला, सूखा, सेनेटरी और स्पेशल केयर कचरे — में विभाजन अनिवार्य किया गया है। बड़े अपशिष्ट उत्पादकों की जिम्मेदारियां स्पष्ट की गई हैं, जिनमें सरकारी विभाग, सार्वजनिक उपक्रम, संस्थान, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आवासीय सोसायटियां शामिल हैं। नियमों का उद्देश्य शहरी निकायों पर बोझ कम करना और विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देना है। उल्लंघन पर ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ के तहत पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है।

शहरी सीवेज में मिले एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया

भारतीय शहरों की सीवर लाइनों और खुले नालों में बह रहा गंदा पानी अब एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी खतरनाक बैक्टीरिया का बड़ा स्रोत बन रहा है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, अस्पतालों, घरों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले एंटीबायोटिक अवशेष सीवेज में बैक्टीरिया को दवाओं से बचना ‘सिखा’ रहे हैं। शोध में पाया गया कि यमुना नदी सहित कई जल स्रोतों में दूषित अपशिष्ट पहुंच रहा है। चिंताजनक रूप से, कुछ दवाओं के प्रति प्रतिरोध अस्पतालों की तुलना में सीवेज में अधिक मिला, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे की आशंका जताई गई है।

वायु प्रदूषण से निपटने से भारत को हो सकता है 220 अरब डॉलर का फायदा: रिपोर्ट

वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण हासिल करने से भारत को 2030 तक करीब 220 अरब डॉलर का आर्थिक लाभ हो सकता है। डाउन टू अर्थ में एक नए अध्ययन के हवाले से यह जानकारी दी गई है कि वायु प्रदूषण कम करने से पीएम 2.5 स्तर को लगभग 20 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है, जिससे स्वास्थ्य और उत्पादकता को होने वाले बड़े नुकसान रोके जा सकते हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इससे 14 लाख नए रोजगार और जॉब ट्रांजिशन के अवसर पैदा होंगे, जबकि व्यवसायों को होने वाले करीब 85 अरब डॉलर के नुकसान से भी बचाव होगा। अध्ययन ने वायु गुणवत्ता सुधार को आर्थिक और विकास प्राथमिकता बताया है।

बीएमसी ने 106 सरकारी, निजी निर्माण स्थलों को काम रोकने का नोटिस दिया

मुंबई में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच बृहन्मुम्बई महानगरपालिका (बीएमसी) ने अनिवार्य एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं लगाने पर 106 निर्माण स्थलों को ‘स्टॉप वर्क’ नोटिस जारी किया है। इनमें निजी परियोजनाएं, रेलवे ब्रिज निर्माण, एसआरए और म्हाडा के प्रोजेक्ट शामिल हैं। बीएमसी के अनुसार मई 2025 से बार-बार चेतावनी देने के बावजूद इन निर्माण स्थलों पर नियमों का उल्लंघन जारी था। 1,000 करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं को उच्च-स्तरीय मॉनिटर लगाने के निर्देश दिए गए हैं। अनुपालन नहीं करने पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। यह कार्रवाई सिर्फ निर्माण स्थलों तक सीमित नहीं रहेगी।

भारत ने 2025 में 2.3 टेरावॉट-ऑवर सौर ऊर्जा की कटौती की

भारत ने 2025 में तेजी से बढ़ती सौर क्षमता के बावजूद 2.3 टेरावाट-घंटे (TWh) सौर बिजली की कटौती की। वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक एंबर की रिपोर्ट के अनुसार, दिन के समय सौर उत्पादन बढ़ने और मांग कमजोर रहने से बिजली प्रणाली उस ऊर्जा को समायोजित नहीं कर पाई। यह कटौती लगभग चार लाख घरों की सालाना बिजली खपत के बराबर है। रिपोर्ट बताती है कि 2025 में भारत ने रिकॉर्ड 38 गीगावाट सौर क्षमता जोड़ी और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता कुल स्थापित क्षमता का 50 प्रतिशत हो गई। लेकिन कोयला संयंत्रों की सीमित फ्लेक्सिबिलिटी, खासकर न्यूनतम तकनीकी लोड की बाध्यता, एक बड़ी अड़चन बनी। इसके कारण स्वच्छ बिजली का उपयोग नहीं हो सका, कार्बन उत्सर्जन में अपेक्षित कमी भी नहीं आई और सिस्टम को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।

नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार के लिए भूमि, ग्रिड से जुड़ी बाधाएं दूर करना आवश्यक: आर्थिक सर्वे

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि भारत में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की रफ्तार बनाए रखने के लिए उच्च-पूंजी लागत, भूमि अधिग्रहण में देरी और ग्रिड से जुड़ी बाधाओं को दूर करना जरूरी है। सर्वे में बैटरी स्टोरेज और पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं के बड़े पैमाने पर विस्तार पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया कि उद्योगों की प्रतिस्पर्धा के लिए ऊर्जा लागत उतनी ही अहम है जितनी पूंजी लागत। नवंबर 2025 तक देश की स्थापित बिजली क्षमता बढ़कर 509.74 गीगावाट हो गई, जो सालाना 11.6 प्रतिशत की वृद्धि है। सर्वे में इंडिया एनर्जी स्टैक को एक अहम डिजिटल सुधार बताया गया है, जिससे उपभोक्ता बिजली बाजार में सीधे भाग ले सकेंगे।

सर्वे के अनुसार, डिस्कॉम्स की वित्तीय स्थिति में बड़ा सुधार हुआ है और पहली बार उन्होंने मुनाफा दर्ज किया। नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 50 प्रतिशत हो गई है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोयला अभी भी अहम बना रहेगा।

भारत 100 गीगावाट पंप्ड स्टोरेज विकसित करेगा

भारत 2047 तक 100 गीगावाट की हाइड्रो पंप्ड स्टोरेज क्षमता विकसित करने की योजना बना रहा है ताकि तेजी से बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा को स्थिर किया जा सके। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 5–6 लाख करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि पंप्ड स्टोरेज पीक डिमांड को संभालने और ग्रिड की विश्वसनीयता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। इसे भारत के नेट जीरो लक्ष्य की दिशा में एक जरूरी कदम माना जा रहा है। योजना के तहत बड़े निवेश और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की भी उम्मीद जताई गई है।

अब हर साल स्वच्छ ऊर्जा टेंडर का लक्ष्य तय नहीं करेगा भारत

भारत सरकार स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए हर साल टेंडर लक्ष्य तय करना बंद करेगीरॉयटर्स के अनुसार, पिछले साल लक्ष्य चूकने और बिना खरीदार वाली परियोजनाओं का बड़ा बैकलॉग बनने के बाद यह फैसला लिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि डेवलपर्स के पास करीब 43 गीगावाट नवीकरणीय क्षमता के अधिकार हैं, लेकिन अभी खरीदार नहीं मिले हैं। राज्य बिजली कंपनियां ट्रांसमिशन में देरी और कीमतें घटने की उम्मीद में खरीद टाल रही हैं। हालांकि सरकार को भरोसा है कि बैकलॉग की काफी बिजली आगे बिक सकेगी।

भारत-यूरोप एफटीए से कारें होंगी सस्ती, ईवी पर छूट 2032 तक

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच होने वाला मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) कार खरीदारों के लिए राहत लेकर आएगा। समझौते के तहत यूरोप में बनी कारों पर आयात शुल्क 110 प्रतिशत तक से घटकर 10 प्रतिशत तक आ सकता है। हालांकि, इस रियायत के तहत हर साल अधिकतम 2.5 लाख कारें ही बेची जा सकेंगी। इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को फिलहाल इसका लाभ नहीं मिलेगा। ईवी पर शुल्क में कटौती पांच साल बाद, यानी 2032 के आसपास संभव है। सरकार का कहना है कि यह फैसला देश के शुरुआती ईवी निर्माण उद्योग को संरक्षण देने के लिए लिया गया है।

बैटरी पीएलआई योजना लक्ष्य से काफी पीछे, चार साल में सिर्फ 2.8% प्रगति

भारत में बैटरी सेल निर्माण को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है। आईईईएफए और जेएमके रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, चार साल में योजना अपने 50 गीगावाट-ऑवर लक्ष्य का सिर्फ 2.8 प्रतिशत ही हासिल कर सकी है। 2021 में शुरू हुई एसीसी पीएलआई योजना के लिए 18,100 करोड़ रुपए तय किए गए थे। लेकिन अक्टूबर 2025 तक केवल 1.4 गीगावाट-ऑवर क्षमता ही शुरू हो पाई है। यह पूरी क्षमता सिर्फ ओला इलेक्ट्रिक ने स्थापित की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि घरेलू बैटरी निर्माण को लेकर भारत की रफ्तार काफी धीमी है।

ईयू में पहली बार ईवी की बिक्री पेट्रोल कारों से अधिक

यूरोपीय संघ (ईयू) में दिसंबर 2025 में पहली बार इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री ने पेट्रोल कारों को पीछे छोड़ दिया। ऑटो उद्योग संगठन एसीईए के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर में पंजीकृत कुल कारों में ईवी की हिस्सेदारी 22.6 प्रतिशत रही, जबकि पेट्रोल कारों की हिस्सेदारी 22.5 प्रतिशत थी। हाइब्रिड और प्लग-इन हाइब्रिड वाहनों का दबदबा सबसे ज्यादा रहा, जिनकी हिस्सेदारी 44 प्रतिशत रही। आंकड़े दिखाते हैं कि ईवी और हाइब्रिड धीरे-धीरे लोगों की पसंद बन रहे हैं। यह रुझान ऐसे समय में अहम है, जब नीति निर्माता उत्सर्जन नियमों में ढील देने पर विचार कर रहे हैं।

वियतनाम में $130 मिलियन बैटरी प्लांट लगाएंगे किम लॉन्ग मोटर और बीवाईडी

वियतनाम की ऑटो कंपनी किम लॉन्ग मोटर ने चीनी ईवी कंपनी बीवाईडी के साथ मिलकर $130 मिलियन का बैटरी प्लांट लगाने का समझौता किया है। रॉयटर्स के अनुसार, इस परियोजना में किम लॉन्ग मोटर निर्माण का खर्च उठाएगी, जबकि बीवाईडी तकनीकी सहयोग देगी। मध्य वियतनाम में 4.4 हेक्टेयर में बनने वाले इस प्लांट की शुरुआती क्षमता 3 गीगावाट-ऑवर होगी। भविष्य में इसे 10 हेक्टेयर तक फैलाकर क्षमता 6 गीगावाट-ऑवर करने की योजना है। यहां बस, ट्रक, मिनीबस और यात्री इलेक्ट्रिक कारों के लिए बैटरियां बनाई जाएंगी।

रूस पर निर्भरता घटाने के लिए यूरोपीय संघ एलएनजी आयात बढ़ाएगा

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के हवाले से रॉयटर्स ने ख़बर दी है कि यूरोप रिकॉर्ड मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) आयात करने की तैयारी में है, जबकि वैश्विक आपूर्ति भी ऊंचे स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। यह कदम यूरोपीय संघ के उस फैसले से जुड़ा है, जिसके तहत वह रूसी ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता कम कर अमेरिका सहित अन्य देशों से एलएनजी आयात बढ़ा रहा है। अनुमान है कि 2026 में यूरोप 185 अरब घन मीटर एलएनजी आयात करेगा, जो 2025 के रिकॉर्ड 175 अरब घन मीटर से अधिक होगा।

तेल बिक्री को आसान बनाने के लिए अमेरिका ने वेनेजुएला पर कुछ प्रतिबंध हटाए

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने वेनेजुएला के तेल उद्योग पर लगाए गए कुछ प्रतिबंध हटा दिए हैं, ताकि अमेरिकी कंपनियों के लिए तेल की खरीद-बिक्री आसान हो सके। साथ ही संकेत दिया गया है कि आने वाले समय में और प्रतिबंध भी हटाए जा सकते हैं।

इन ढीलों के तहत अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला के कच्चे तेल को खरीदने, बेचने, परिवहन करने, भंडारण और परिशोधन (रिफाइनिंग) कर सकेंगी। हालांकि, तेल उत्पादन पर लागू अमेरिकी प्रतिबंध अभी भी बरकरार रहेंगे।

क्यूबा को तेल आपूर्ति करने वाले देशों पर टैरिफ की धमकी: ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा को तेल आपूर्ति करने वाले किसी भी देश पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है। यह कदम द्वीपीय देश क्यूबा के खिलाफ दबाव अभियान को और तेज़ करता है। यह फैसला राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के तहत लिया गया है, हालांकि इसमें न तो टैरिफ की दरें बताई गईं और न ही किसी देश का नाम लिया गया। जवाबी कार्रवाई में क्यूबा ने भी ऐसे आदेश जारी किए हैं, जिनसे बिजली उत्पादन, कृषि गतिविधियां, जल आपूर्ति और स्वास्थ्य सेवाएं ठप पड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

खनन उत्पादन बढ़ाने के लिए देरी करने वाली कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर सकता है भारत

भारत सरकार खनन उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से खनन नीलामी से जुड़े नियमों को सख्त करने की योजना बना रही है। इसके तहत नीलामी में खनन ब्लॉक जीतने के बाद भी समय पर मंज़ूरी न लेने वाली कंपनियों को सूची से बाहर किया जा सकता है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2015 से अब तक सरकार ने 594 खनन ब्लॉकों की नीलामी की है, लेकिन इनमें से केवल 82 ब्लॉक ही चालू हो पाए हैं।

भारत–कनाडा के बीच 10 साल का यूरेनियम आपूर्ति समझौता संभव

प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की प्रस्तावित भारत यात्रा के दौरान भारत और कनाडा के बीच 10 वर्षों का यूरेनियम आपूर्ति समझौता होने की संभावना है। यह समझौता उनकी यात्रा का सबसे बड़ा नतीजा हो सकता है। इस दौरे में कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी जैसी दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर भी समझौते होने की उम्मीद जताई जा रही है।

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