
2025 इतिहास का तीसरा सबसे गर्म साल, 1.5 डिग्री की सीमा के करीब दुनिया
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) और यूरोपीय कॉपरनिकस क्लाइमेट सर्विस के नए आंकड़े बताते हैं कि 2025 दुनिया के सबसे गर्म सालों में शामिल रहा। डब्ल्यूएमओ के अनुसार, 2025 पिछले 176 वर्षों के जलवायु रिकॉर्ड के तीन सबसे गर्म वर्षों में गिना गया है। इससे पहले 2023 और 2024 भी अब तक के सबसे गर्म साल रहे थे।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में 1.4 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। यह स्थिति तब रही जब प्रशांत महासागर में ला नीना जैसी ठंडी मौसम प्रणाली सक्रिय थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके बावजूद तापमान का इतना अधिक रहना चिंताजनक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी मुख्य वजह वातावरण में लगातार बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें हैं, जो धरती की गर्मी को बाहर जाने से रोक रही हैं। कॉपरनिकस के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर कार्बन उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में नए तापमान रिकॉर्ड बनते रहेंगे।
बढ़ती गर्मी का असर चरम मौसम घटनाओं के रूप में भी दिख रहा है। पिछले साल जंगल की आग, भीषण गर्मी और शक्तिशाली चक्रवात जैसी घटनाएं दर्ज की गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच चुकी है। उनका साफ संदेश है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
भारत में आठवां सबसे गर्म साल रहा 2025
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि साल 2025 भारत का आठवां सबसे गर्म साल रहा। आईएमडी के अनुसार, इस साल देश का वार्षिक औसत सतही वायु तापमान 1991-2020 के औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। यह दिखाता है कि अल नीनो का मजबूत असर न होने के बावजूद, देश में वार्मिंग ट्रेंड बना हुआ है।
रिकॉर्ड के अनुसार, 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा, जब तापमान औसत से 0.65 डिग्री सेल्सियस अधिक था। भारत के पांच सबसे गर्म साल 2024, 2016, 2009, 2010 और 2017 रहे हैं। पिछले 15 वर्षों में 10 सबसे गर्म साल दर्ज किए गए हैं। 2016 से 2025 का दशक सबसे गर्म दशक रहा।
आईएमडी वैज्ञानिकों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिख रहा है। 1901 से 2025 के बीच औसत तापमान में हर सदी 0.68 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान अधिकतम और न्यूनतम तापमान में भी लगातार वृद्धि हुई है।
जुलाई-सितंबर के दौरान अल नीनो की संभावना, मानसून पर पड़ सकता है असर
शुरुआती फोरकास्ट में इस साल अल नीनो स्थितियां बनने की संभावना जताई गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई-अगस्त-सितंबर के दौरान अल नीनो की स्थिति उभर सकती है। अल नीनो समुद्र के पानी के गर्म होने की प्रक्रिया है, जिसका असर भारत के मानसून पर पड़ता है। आमतौर पर अल नीनो के दौरान मानसून कमजोर रहता है और गर्मी अधिक पड़ती है।
हालांकि, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि अभी यह तय करना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो किस महीने में बनेगा। आईएमडी के महानिदेशक एम मोहापात्रा ने कहा कि आने वाले महीनों में स्थिति साफ होगी। अमेरिका की एजेंसी एनओएए के अनुसार, मानसून के दूसरे हिस्से में अल नीनो की 48 प्रतिशत संभावना है, जबकि सामान्य स्थिति की संभावना 45 प्रतिशत बताई गई है।
एक साथ बाढ़ और सूखे के लिए जिम्मेदार अल नीनो और ला नीना
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास, ऑस्टिन के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन में कहा गया है कि सूखा और बाढ़ जैसी चरम मौसम स्थितियों के पीछे सबसे बड़ा कारण अल नीनो-साउथर्न ऑसिलेशन (ईएनएसओ) है।
यह अध्ययन एजीयू एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोध में नासा के ग्रेस और ग्रेस-एफओ उपग्रहों से कुल जल भंडारण का आकलन किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि अल नीनो और ला नीना की अवस्थाएं एक साथ कई महाद्वीपों में सूखा या बाढ़ ला सकती हैं। अध्ययन के अनुसार, 2012 के बाद दुनिया में सूखे की घटनाएं बढ़ी हैं। शोधकर्ताओं ने कहा कि जल प्रबंधन और बेहतर तैयारी से नुकसान कम किया जा सकता है।
उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड, पश्चिमी विक्षोभ से बारिश-बर्फबारी के आसार
देश के कई हिस्सों में मौसम लगातार बदल रहा है और उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, पश्चिमी विक्षोभ और तेज जेट स्ट्रीम हवाओं के कारण ठंड, कोहरा, बारिश और बर्फबारी की स्थिति बनी हुई है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में तापमान शून्य से नीचे चला गया है और 16 से 19 जनवरी के बीच हल्की से मध्यम बारिश व बर्फबारी की संभावना है।
दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शीतलहर और घना कोहरा रह सकता है। कुछ इलाकों में हल्की बारिश से ठंड और बढ़ेगी। दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मानसून धीरे-धीरे विदा ले रहा है। मौसम विभाग ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
सरकार ने वन भूमि पर निजी प्लांटेशन को दी हरी झंडी, पर्यावरण शुल्क से छूट
केंद्र सरकार ने वन संरक्षण नियमों में बदलाव करते हुए निजी और सरकारी संस्थाओं को वन भूमि पर व्यावसायिक पौधरोपण और वनीकरण की अनुमति दे दी है। इसके तहत अब ऐसे प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (एनवायरमेंटल कंपनसेशन चार्ज) नहीं देना होगा। यह फैसला 2 जनवरी 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यों को भेजे पत्र के जरिए लागू किया गया।
नए नियमों के अनुसार, राज्य सरकार की मंजूरी, स्वीकृत वर्किंग प्लान और वन विभाग की निगरानी में किए गए पौधरोपण कार्यों को ‘वन गतिविधि’ माना जाएगा। इससे पहले ऐसे कार्यों को गैर-वन गतिविधि माना जाता था जिसके लिए नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) फीस तथा प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य था।
सरकार का कहना है कि यह बदलाव क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों में बहाली के प्रयासों में मदद करेगा और लकड़ी, कागज जैसे उत्पादों के आयात पर निर्भरता घटाएगा।
हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों और आदिवासी संगठनों ने चिंता जताई है कि इससे वनों की सुरक्षा कमजोर हो सकती है और व्यावसायिक हितों को बढ़ावा मिलेगा। उनका कहना है कि शुल्क छूट से संरक्षण के लिए मिलने वाला धन कम हो जाएगा और जवाबदेही पर सवाल खड़े होंगे।
9 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी में धकेल सकता है क्लाइमेट चेंज: रिपोर्ट
नेचर में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से गरीबी और असमानता में बड़ा इजाफा हो सकता है। अध्ययन में 130 देशों के पिछले एक दशक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के मुताबिक, तापमान बढ़ने से गरीबी दर में 0.63 से 1.18 प्रतिशत अंक तक वृद्धि हो सकती है। इससे 2030 तक दुनिया में 6.23 से 9.87 करोड़ और लोग गरीबी में जा सकते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि सब-सहारन अफ्रीका के देश इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे। कृषि पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाएं भी जलवायु बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाई गईं। नेचर में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से गरीबी और असमानता में बड़ा इजाफा हो सकता है। अध्ययन में 130 देशों के पिछले एक दशक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के मुताबिक, तापमान बढ़ने से गरीबी दर में 0.63 से 1.18 प्रतिशत अंक तक वृद्धि हो सकती है। इससे 2030 तक दुनिया में 6.23 से 9.87 करोड़ और लोग गरीबी में जा सकते हैं। रिपोर्ट बताती है कि सब-सहारन अफ्रीका के देश इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे। कृषि पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाएं भी जलवायु बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील पाई गईं।
कीटनाशक प्रबंधन विधेयक 2025 का नया मसौदा जारी, पुरानी चिंताएं बरकरार
केंद्र सरकार ने पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल, 2025 का नया मसौदा जारी किया है। इसका उद्देश्य कीटनाशकों के निर्माण, आयात, बिक्री और उपयोग को नियंत्रित करना है। यह विधेयक 1968 के कीटनाशक कानून और नियमों की जगह लेगा।
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, नए मसौदे में धाराओं की संख्या 65 से घटाकर 55 कर दी गई है, लेकिन कई पुरानी कमियां अब भी बनी हुई हैं। विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों का कहना है कि नियमन, निगरानी और जवाबदेही को लेकर स्पष्टता नहीं है।
मसौदे में जोखिम ‘कम करने का प्रयास’ करने की बात कही गई है, जबकि पहले इसे सीधे ‘कम करने’ की मांग की गई थी। सरकार ने इसे किसान-केंद्रित कानून बताया है। हालांकि राज्यों को कीटनाशकों पर स्थायी प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं दिया गया है।
खनन पट्टों में तेजी के लिए सरकार ने एक ही वन सर्वे का निर्देश दिया
केंद्र सरकार ने खनन पट्टों की प्रक्रिया तेज करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को केवल एक ही वन सर्वे कराने का निर्देश दिया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि बार-बार किए जाने वाले सर्वे से देरी और अनावश्यक खर्च होता है। मंत्रालय ने 11 दिसंबर के पत्र में बताया कि अलग-अलग एजेंसियों और बोली लगाने वालों के सर्वे से खनन पट्टों के क्रियान्वयन में बाधा आ रही थी। हालांकि विशेषज्ञों ने इस कदम की आलोचना की है। उनका कहना है कि हर सर्वे का उद्देश्य अलग होता है और एक संयुक्त सर्वे से कानूनी संरक्षण कमजोर पड़ सकता है।
आईपीसीसी समेत 66 वैश्विक निकायों से बाहर हुआ अमेरिका
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़े फैसले के तहत अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संधियों से बाहर निकाल लिया है।
व्हाइट हाउस के अनुसार, इन संस्थाओं को अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ माना गया है। सूची में 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र और 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संगठन शामिल हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आईपीसीसी, आईयूसीएन, इरेना और कई यूएन एजेंसियां हैं।
अमेरिका ने यूएन जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन से भी हटने का फैसला किया है, जिससे वैश्विक जलवायु सहयोग पर असर पड़ सकता है। इस कदम से अमेरिका की भागीदारी और वित्तीय सहायता समाप्त होगी। विशेषज्ञों ने फैसले की आलोचना की है और इसे कानूनी चुनौती का विषय बताया है।
माधव गाडगिल का निधन, सन्नाटे में हुई अंतिम विदाई
प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् और पद्म भूषण से सम्मानित माधव गाडगिल का 7 जनवरी 2026 को पुणे में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ थे। उनका अंतिम संस्कार पुणे के वैकुंठ श्मशान घाट में राजकीय सम्मान के साथ हुआ, लेकिन अंतिम यात्रा बेहद शांत रही। इसमें केवल 40–50 लोग शामिल हुए और कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी मौजूद नहीं था।
कई लोगों ने इस सादगी भरी विदाई पर हैरानी जताई। लेखकों और सहयोगियों ने इसे समाज की उदासीनता बताया। माधव गाडगिल पश्चिमी घाट विशेषज्ञ समिति के प्रमुख रहे और जैव विविधता संरक्षण व सतत विकास के लिए आजीवन कार्य किया। उनका निधन भारतीय पर्यावरण आंदोलन के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है।
इंदौर में डायरिया से मौतें: दूषित पानी पर कैग ने दी थी चेतावनी
इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने प्रशासन की गंभीर लापरवाही को उजागर किया है। इस घटना में 15 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक लोग बीमार पड़े। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, शहर के लोग लंबे समय से गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन प्रशासन ने समय पर ध्यान नहीं दिया। जांच में सामने आया कि सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नल का पानी सीधे पीने लायक नहीं है और उसे फिटकरी व क्लोरीन से शुद्ध करना पड़ता है। 2019 में आई कैग रिपोर्ट में भी इंदौर और भोपाल की जल प्रबंधन व्यवस्था में कई कमियां बताई गई थीं, लेकिन सुधार नहीं हुआ।
एक साल में दूषित पानी से 34 मौतें, 5,500 लोग बीमार
पिछले एक साल में देश के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 26 शहरों में दूषित नल का पानी पीने से कम से कम 34 लोगों की मौत हुई है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच करीब 5,500 लोग बीमार पड़े। इनमें सबसे अधिक मामले डायरिया के थे, इसके बाद टाइफाइड, हेपेटाइटिस और लंबे समय तक बुखार की शिकायत सामने आई।
जांच में पाया गया कि लगभग हर जगह सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया था। इसकी मुख्य वजह पुराने और जर्जर पाइप हैं, जो सीवर लाइनों के पास बिछे हैं। कई शहरों में 40 साल से अधिक पुराने पाइप अब भी इस्तेमाल हो रहे हैं, जिससे बार-बार प्रदूषण का खतरा बना रहता है।
44% शहरों में वायु प्रदूषण गंभीर, एनसीएपी की पहुंच सीमित: रिपोर्ट
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (क्रिया) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के करीब 44 प्रतिशत शहर लंबे समय से गंभीर वायु प्रदूषण का सामना कर रहे हैं। 4,041 शहरों के उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि 1,787 शहरों में हर साल पीएम2.5 मानक से ऊपर रहा। चिंता की बात यह है कि इनमें से केवल 4 प्रतिशत शहर ही राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के दायरे में हैं।
2025 में असम का बर्नीहाट, दिल्ली और गाजियाबाद सबसे प्रदूषित शहर रहे। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक ऐसे शहर हैं जो मानकों पर खरे नहीं उतरते। क्रिया का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक और क्षेत्रीय स्तर पर ठोस सुधार जरूरी हैं।
दिल्ली में पीएम2.5 प्रदूषण का एक-तिहाई कारण सेकेंडरी एयरोसोल
दिल्ली में पीएम2.5 प्रदूषण का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अब सेकेंडरी एयरोसोल से बन रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ये कण सीधे नहीं निकलते, बल्कि गैसों के रासायनिक बदलाव से बनते हैं। नमी, तापमान और धूप की वजह से ये गैसें सूक्ष्म कणों में बदल जाती हैं, जो फेफड़ों तक पहुंचती हैं। इससे स्मॉग के दौरान हवा की हालत तेजी से बिगड़ जाती है।
फोटो: Andreas Troll/Pixabay
भारत ने 2025 में रिकॉर्ड सौर क्षमता जोड़ी
भारत ने वर्ष 2025 में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में नया रिकॉर्ड बनाया है। पीवी मैगजीन के अनुसार, जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच देश में 37.9 गीगावाट सौर और 6.3 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई। यह अब तक का सबसे बड़ा वार्षिक इजाफा है।
2024 की तुलना में सौर क्षमता में 54.7 प्रतिशत और पवन ऊर्जा में 85.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के आंकड़ों के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 तक भारत की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 258 गीगावाट पहुंच गई। इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी सबसे अधिक करीब 53 प्रतिशत है। इसके बाद पवन ऊर्जा, बड़े जलविद्युत, बायो पावर और स्मॉल हाइड्रोपॉवर का स्थान है।
जीआईबी संरक्षण से प्रभावित सौर परियोजनाओं को केंद्र की राहत
केंद्र सरकार ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पक्षी के संरक्षण से प्रभावित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को अतिरिक्त समय देने का फैसला किया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान और गुजरात में इन परियोजनाओं में देरी को ‘फोर्स मेज्योर’ (अप्रत्याशित, अनियंत्रित घटनाएं जो अनुबंध दायित्वों को पूरा करने में बाधक होती हैं) माना जाएगा। इससे डेवलपर्स को परियोजनाएं चालू करने की तय समय-सीमा बढ़ाने का मौका मिलेगा।
यह निर्णय दिसंबर 2025 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लिया गया है, जिसमें एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी गई थी। समिति ने जीआईबी आवास क्षेत्रों में नई पवन और बड़ी सौर परियोजनाओं पर सख्त सीमाएं लगाने की बात कही थी। साथ ही, बिजली लाइनों को भूमिगत करने और मार्ग बदलने का सुझाव दिया गया था।
भारत में 50% बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट ही आर्थिक रूप से लाभकारी: रिपोर्ट
मेरकॉम इंडिया रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 50 प्रतिशत स्टैंडअलोन बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) परियोजनाएं ही आर्थिक रूप से लाभकारी पाई गई हैं। ये परियोजनाएं जुलाई से नवंबर 2025 के बीच नीलामी के जरिए आवंटित की गई थीं।
पीवी मैगजीन में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि अध्ययन में ऊर्जा भंडारण की मौजूदा लागत और नीलामी में लगाई गई बोलियों की तुलना की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, कई परियोजनाओं में लागत, राजस्व और बाजार जोखिमों के कारण मुनाफा सीमित दिखा। इससे संकेत मिलता है कि भारत में बैटरी स्टोरेज सेक्टर को टिकाऊ बनाने के लिए नीतिगत समर्थन और लागत में और कमी की जरूरत है।
चीन ने अमेरिकी सोलर-ग्रेड सिलिकॉन पर एंटी-डंपिंग शुल्क की अवधि बढ़ाई
चीन ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया से आयात होने वाले सोलर-ग्रेड सिलिकॉन पर एंटी-डंपिंग शुल्क को आगे भी जारी रखने का फैसला किया है। पीवी मैगजीन के अनुसार, चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने 2014 में लगाए गए इन शुल्कों को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ा दिया है। अमेरिकी उत्पादकों पर यह शुल्क 53.3 से 57 प्रतिशत के बीच रहेगा, जबकि दक्षिण कोरियाई कंपनियों पर 2.4 से 48.7 प्रतिशत तक शुल्क लागू होगा। चीन का कहना है कि इन आयातों से घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंच रहा था। इस फैसले का वैश्विक सौर आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है, क्योंकि सिलिकॉन सौर पैनलों का एक अहम कच्चा माल है और चीन इस क्षेत्र में बड़ा उत्पादक है।
दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की बिक्री की रफ्तार इस साल धीमी पड़ सकती है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, चीन में सब्सिडी कम होने, यूरोप में पेट्रोल-डीजल गाड़ियों को हटाने की नीति पर असमंजस और अमेरिका में नीतिगत बदलाव इसका कारण हैं। ब्लूमबर्गएनईएफ का अनुमान है कि 2026 में करीब 2.4 करोड़ यात्री ईवी बिकेंगे, जो 2025 के मुकाबले 12 प्रतिशत अधिक हैं। हालांकि, यह वृद्धि पिछले साल की 23 प्रतिशत वृद्धि से काफी कम है।
अमेरिका में ईवी बाजार पहले से दबाव में है, क्योंकि सितंबर के बाद 7,500 डॉलर तक की टैक्स छूट खत्म की जा रही है और ईंधन दक्षता मानकों को भी कमजोर किया गया है। इससे ईवी अपनाने की गति प्रभावित हो सकती है।
पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए ईवी में अलर्टिंग सिस्टम अनिवार्य
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए बड़ा फैसला लिया है। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, मंत्रालय ने इलेक्ट्रिक वाहनों में ‘अकूस्टिक व्हीकल अलर्टिंग सिस्टम’ (एवीएएस) लगाना अनिवार्य किया है। यह नियम ‘एम’ और ‘एन’ श्रेणी के ईवी पर लागू होगा। मंत्रालय का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों में आवाज़ नहीं होती है, जिससे पैदल यात्रियों को खतरा रहता है। यह व्यवस्था चरणबद्ध तरीके से लागू होगी। अक्टूबर 2026 से सभी नए इलेक्ट्रिक वाहनों में यह सिस्टम अनिवार्य होगा। वहीं, पुराने वाहनों में यह अक्टूबर 2027 तक फिट कराना होगा। सरकार का मानना है कि इससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा कम होगा।
सड़क हादसे घटाने के लिए वाहनों के बीच ‘बातचीत’ तकनीक लाएगी सरकार
घने कोहरे जैसी कम विजिबिलिटी वाली स्थितियों में होने वाले सड़क हादसों को कम करने के लिए सरकार जल्द ही वाहन-से-वाहन (V2V) संचार तकनीक लागू करेगी। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि इस तकनीक में गाड़ियों में एक ऑन-बोर्ड यूनिट लगेगी, जिससे वाहन आपस में गति, स्थान और ब्रेक जैसी जानकारी साझा कर सकेंगे। इससे ड्राइवरों को समय रहते चेतावनी मिलेगी और टक्कर से बचाव होगा। मंत्रालय के अनुसार, इससे दुर्घटनाओं में 80 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इस यूनिट की लागत करीब 5,000 से 7,000 रुपए होगी। सरकार इसके मानक तय कर रही है और जल्द अधिसूचना जारी की जाएगी। साथ ही, सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए कैशलेस इलाज योजना भी पूरे देश में लागू की जाएगी।
वेनेजुएला पर आक्रमण कर पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के 11 दिन बाद अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल की पहली बिक्री की है। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कहा था कि वेनेजुएला के तेल भंडार अब अमेरिका के नियंत्रण में हैं और वह अमेरिकी कंपनियों को वहां निवेश के लिए आमंत्रित करेंगे।
गुरुवार को न्यूयॉर्क-स्थित समाचार वेबसाइट सेमाफोर ने खबर दी कि अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल की पहली बिक्री पूरी कर ली है जिसकी कीमत करीब 50 करोड़ डॉलर बताई गई है। यह बिक्री काराकास और वाशिंगटन, डीसी के बीच हुए 2 अरब डॉलर के सौदे का हिस्सा है। ट्रंप प्रशासन ने एक कार्यकारी आदेश के जरिए यह भी तय किया है कि तेल बिक्री से होने वाली आय अमेरिकी ट्रेजरी के नियंत्रित खातों में रखी जाएगी। अधिकारियों के अनुसार, यह राशि फिलहाल कतर स्थित एक खाते में जमा है।
अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला के तेल के दोहन से ख़त्म हो सकता है 13% कार्बन बजट
वेनेजुएला के तेल को लेकर अमेरिका की योजनाएं जलवायु लक्ष्यों के लिए गंभीर चिंता पैदा कर सकती हैं। द गार्जियन में छपे एक विश्लेषण के अनुसार, अगर अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला के तेल का बड़े पैमाने पर उत्पादन करती हैं, तो 2050 तक वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के लिए बचा हुआ करीब 13 प्रतिशत कार्बन बजट खत्म हो सकता है।
इस बीच, फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी तेल कंपनियां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से निवेश से पहले मजबूत कानूनी और वित्तीय गारंटी की मांग कर रही हैं। हाल ही में ट्रंप ने कहा था कि वेनेजुएला में निवेश करने वाली अमेरिकी कंपनियों को मुआवजा दिया जाएगा। फिलहाल शेवरॉन ही इकलौती अमेरिकी कंपनी है, जिसके पास वेनेजुएला का कच्चा तेल निर्यात करने का लाइसेंस है।
52 साल में पहली बार चीन और भारत में कोयला बिजली में गिरावट
कोयला आधारित बिजली उत्पादन के मामले में भारत और चीन में एक ऐतिहासिक बदलाव देखा गया है। कार्बन ब्रीफ के विश्लेषण के अनुसार, 1973 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब दोनों देशों में एक ही साल में कोयले से बिजली उत्पादन घटा है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दोनों देशों ने रिकॉर्ड स्वच्छ ऊर्जा क्षमता जोड़ी। इसी दौरान भारत में कोयला बिजली उत्पादन में 3 प्रतिशत और चीन में 1.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
द गार्जियन ने इसे वैश्विक उत्सर्जन में कमी की दिशा में अहम मोड़ बताया है। हालांकि ब्लूमबर्ग ने कहा कि यह गिरावट स्थायी होगी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, भारत में अपेक्षाकृत हल्की गर्मी और बिजली मांग में धीमी बढ़ोतरी भी इसकी वजह रही।






