प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् और पद्म-भूषण से सम्मानित माधव गाडगिल का 7 जनवरी 2026 को पुणे में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।
माधव गाडगिल का अंतिम संस्कार पुणे के नवी पेठ इलाके में स्थित वैकुंठ श्मशान घाट में किया गया। उन्हें राजकीय सम्मान दिया गया, लेकिन अंतिम यात्रा बहुत शांत और सादगी भरी रही।
अंत्येष्टि में केवल करीब 40 से 50 लोग ही मौजूद थे। न कोई मंत्री आया और न ही कोई बड़ा अधिकारी या स्थानीय जनप्रतिनिधि।
मलयाला मनोरमा के फोटो एडिटर आर.एस. गोपन के अनुसार, उन्होंने बड़ी भीड़ की उम्मीद की थी, लेकिन वहां सन्नाटा था। उन्होंने बताया कि पुलिसकर्मी भी रास्ता भटक गए थे और कुछ समय तक गाडगिल का पार्थिव शरीर इंतजार करता रहा।
लेखक अमीर शाहुल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इसे एक ‘लोनली गुडबाय (निर्जन विदाई)’ बताते हुए कहा कि वट वृक्षों के नीचे गाडगिल को अंतिम विदाई दी गई, लेकिन समाज और सत्ता की ओर से वह सम्मान नहीं दिखा, जिसके वह हकदार थे।
माधव गाडगिल भारत के सबसे सम्मानित पर्यावरण चिंतकों में से एक थे। उन्होंने जैव विविधता संरक्षण, सतत विकास और पर्यावरण नीति पर जीवन भर काम किया। वह पश्चिमी घाट विशेषज्ञ समिति के प्रमुख भी रहे। उनके काम के कारण कई नुकसानदायक खनन और विकास परियोजनाओं पर सवाल उठे और कुछ को रोका भी गया।
प्रवीण जगताप और अनिरुद्ध कुलकर्णी जैसे उनके सहयोगियों ने उन्हें एक शांत, तार्किक और ईमानदार व्यक्ति बताया, जो विरोध के बजाय तथ्यों और शोध के आधार पर अपनी बात रखते थे।
गाडगिल को पद्म भूषण और संयुक्त राष्ट्र का ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ सम्मान मिला था। उनका जाना भारतीय पर्यावरण आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति है। उनकी अंतिम यात्रा भले ही शांत रही हो, लेकिन उनका काम और विचार आने वाली पीढ़ियों को दिशा देते रहेंगे।
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