भारत ने 2025 में करीब 50 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी है। इसके साथ ही देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा अब गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों का हो गया है। यह लक्ष्य भारत ने अपने पेरिस समझौते (2015) के तहत तय 2030 की समयसीमा से पांच वर्ष पहले प्राप्त कर लिया है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि जनवरी से नवंबर 2025 के बीच करीब 45 गीगावाट क्षमता जोड़ी गई, जिसमें से 35 गीगावाट सौर ऊर्जा से जुड़ी थी। वर्ष के अंत तक यह आंकड़ा 48–50 गीगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, “भारत का भविष्य उज्ज्वल है और यह नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित होगा।”
सरकार के मुताबिक इस तेजी के पीछे लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के निवेश की अहम भूमिका रही। उद्योग अनुमान के अनुसार, प्रति मेगावॉट 4 करोड़ रुपए की लागत से हर 50 गीगावाट के लिए लगभग यही निवेश आवश्यक होता है। भारतीय नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (इरेडा) के अध्ययन के अनुसार, 2023 से 2030 के बीच भारत को अपने 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म लक्ष्य को पूरा करने के लिए लगभग 30.54 लाख करोड़ रुपए के निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें से अब तक 10.79 लाख करोड़ रुपए का निवेश हो चुका है।
भंडारण (स्टोरेज) के क्षेत्र में भी 2025 में बड़ा सुधार देखने को मिला। सरकार द्वारा नई पूंजी सब्सिडी योजना की घोषणा के बाद स्टोरेज टेंडर और नीलामियों में तेज़ी आई। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेताया है कि नवीकरणीय ऊर्जा की तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी ने ग्रिड असंतुलन और ट्रांसमिशन देरी जैसी चुनौतियाँ पैदा की हैं – खासकर राजस्थान में परियोजनाओं के निष्पादन पर असर देखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह गति 2026 में भी बनी रही, तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में एक अग्रणी शक्ति के रूप में उभरेगा।
नवीकरणीय ऊर्जा से वैश्विक स्तर पर गिर रही हैं बिजली की कीमतें: रिपोर्ट
एक नई रिपोर्ट के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा — जैसे सौर और पवन — बिजली उत्पादन का सबसे सस्ता स्रोत बनी हुई है। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रिड से जुड़ी 10 में से 9 नई नवीकरणीय परियोजनाएं सबसे सस्ते जीवाश्म ईंधन विकल्पों से भी कम लागत पर बिजली उत्पादन कर रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑनशोर पवन ऊर्जा दुनिया में सबसे सस्ती नई बिजली है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में, जहां पवन और सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी अधिक है, वहां घरेलू बिजली दरें औसत से कम हैं। हालांकि भारत में अभी कोयले पर निर्भरता अधिक बनी हुई है।
पीएम-कुसुम 2.0 की तैयारी में सरकार, फीडर सोलराइजेशन पर ध्यान
केंद्र सरकार यूनियन बजट 2026-27 से पहले पीएम-कुसुम 2.0 शुरू करने की तैयारी कर रही है, जिससे कृषि क्षेत्र में विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अधिकारियों ने बताया कि मौजूदा पीएम-कुसुम योजना मार्च 2026 में तय समय पर समाप्त होगी, हालांकि पहले से स्वीकृत परियोजनाओं को सहायता मिलती रहेगी। वर्तमान योजना के तहत 34,422 करोड़ रुपए का प्रावधान है, जिसके जरिए करीब 34,800 मेगावाट सौर क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। नवंबर तक 10,203 मेगावाट क्षमता स्थापित की जा चुकी है। लगातार मांग को देखते हुए सरकार पुरानी योजना के विस्तार के बजाय संशोधित लक्ष्यों और प्रोत्साहनों के साथ नई योजना लाने पर विचार कर रही है।
पीएम-कुसुम 2.0 में एग्रो-फोटोवोल्टाइक मॉडल और फीडर स्तर पर सोलराइजेशन पर अधिक जोर दिया जा सकता है, जिससे किसानों को दिन में भरोसेमंद बिजली मिल सकेगी।
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