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सीआरआई रिपोर्ट 2026: भारत जलवायु आपदाओं से सर्वाधिक प्रभावित 10 देशों में
क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 (सीआरआई) की नई रिपोर्ट के अनुसार, 1995–2024 की अवधि में भारत दुनिया के उन शीर्ष 10 देशों में रहा है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन से जुड़े चरम मौसम-कार्यों (बाढ़, तूफान, हीटवेव, सूखा आदि) का सबसे ज़्यादा सामना करना पड़ा है। अतिरिक्त जानकारी के अनुसार, इस 30-वर्षीय अवधि में भारत में करीब 430 आपदाएं हुईं, जिनमें लगभग 80,000 लोगों की मौत हुई और 1.3 अरब से अधिक लोग प्रभावित हुए। अनुमानित आर्थिक हानि लगभग $170 अरब रही।
सीआरआई रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि भारत ‘लगातार खतरे’ (continuous threat) की श्रेणी में आता है — देश में जलवायु आपदाएँ इतनी बार-बार हो रही हैं कि एक घटना के प्रभाव से पूरी तरह उबरने से पहले ही अगली आ जाती है।
नहरों, हिमालयी नदियों, समुद्री तटीय इलाकों और कृषि-प्रधान क्षेत्रों के लिए यह विशेष रूप से चिंता की बात है। रिपोर्ट बताती है कि अगर जलवायु-स्मार्ट नीतियाँ, आपदा-प्रबंधन, हरित अवसंरचना, जल संरक्षण, तट रेखा रक्षा और ग्रामीण विकास पर त्वरित व सक्रिय कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में भारत की संवेदनशीलता और बढ़ सकती है।
इस लिहाज़ से, सीआरआई 2026 केवल एक आंकड़ा नहीं – चेतावनी है। यह दर्शाता है कि जलवायु संकट अब किसी भविष्य की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। अब समय है कि भारत जलवायु-अनुकूल विकास, कड़े सुधार और हरित तैयारी के साथ आगे बढ़े, नहीं तो ‘डिसास्टर-रीयलिटी’ आम जीवन बन सकती है।
कॉप30: अनुकूलन के लिए तिगुना फंड लेकिन जीवाश्म ईंधन पर निराशा
ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित कॉप30 जलवायु सम्मेलन दो सप्ताह की कठिन बातचीत के बाद एक समझौते के साथ समाप्त हुआ। सम्मलेन में गरीब और विकासशील देशों की मदद के लिए अनुकूलन वित्त (अडॉप्टेशन फाइनेंस) को 2035 तक तीन गुना करने पर सहमति जताई, लेकिन इसमें कोई स्पष्ट राशि तय नहीं की गई। कई देशों और विशेषज्ञों ने कहा कि यह मदद बहुत देर से मिलेगी, जबकि जलवायु आपदाएं अभी ही गंभीर रूप ले चुकी हैं।
सबसे बड़ी निराशा जीवाश्म ईंधन ट्रांज़िशन पर हाथ लगी। तेल, गैस और कोयले से दूर जाने की प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से अंतिम दस्तावेज़ में जगह नहीं मिली। यूरोपीय संघ, कोलंबिया और कई लैटिन अमेरिकी देशों ने इसका विरोध किया, लेकिन सऊदी अरब और अन्य बड़े उत्पादक देशों की आपत्तियों के कारण समझौता कमजोर पड़ा।
अंत में ब्राजील ने सम्मेलन के बाहर एक अलग ‘रोडमैप’ प्रक्रिया की घोषणा की, जिसमें जीवाश्म ईंधन से ट्रांज़िशन और वनों की सुरक्षा पर काम करने की बात कही गई है, लेकिन यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।
सम्मेलन ने ‘जस्ट ट्रांज़िशन’ पर एक नया बेलेम एक्शन मैकेनिज़म भी शुरू किया, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो। व्यापार और जलवायु नीतियों के तालमेल पर भी आगे वार्षिक चर्चाएं होंगी।
अफ्रीकी देशों और लघुद्वीपीय देशों ने अनुकूलन के सूचकांकों और धनराशि पर गंभीर आपत्ति जताई। कार्यकर्ताओं ने कहा कि वादे तो किए गए हैं, लेकिन ज़रूरी संसाधनों का अभाव गरीब देशों को असुरक्षित छोड़ देगा।
भारत ने BASIC (ब्राज़ील, साउथ अफ्रीका, भारत और चीन) समूह की ओर से सम्मेलन की अध्यक्षता की सराहना की और कहा कि यह परिणाम जलवायु कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करेगा।
तेज़ी से तप रहा भारत, एक दशक में तापमान 0.9°C बढ़ा
एक नये अध्ययन के अनुसार, भारत का औसत तापमान पिछले एक दशक (2015-2024) में लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है, जबकि देश के अधिकांश हिस्सों में गर्म दिनों की संख्या हर दशक में 5–10 दिनों तक बढ़ रही है। पश्चिमी और पूर्वोत्तर भारत में साल के सबसे गर्म दिन का तापमान 1950 के दशक की तुलना में 1.5–2 डिग्री तक बढ़ चुका है। अध्ययन से पता चलता है कि यह तेजी से बढ़ती गर्मी अत्यधिक मौसम घटनाओं—जैसे हीटवेव, अत्यधिक वर्षा, समुद्री चक्रवात और सूखे—का मुख्य कारण बन रही है।
क्षेत्रवार विश्लेषण बताता है कि हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में तेज़ तापवृद्धि और हिमनद पिघलाव बढ़ रहा है, जबकि गंगा के मैदानी भाग में हीट-स्ट्रेस बढ़ने के साथ मानसूनी बारिश (JJAS) में कमी दर्ज की जा रही है। पश्चिमी भारत में चरम वर्षा, अरब सागर में तेज उष्णकटिबंधीय चक्रवात, समुद्री जलस्तर में वृद्धि और लगातार गर्म होते समुद्र अब सामान्य होते जा रहे हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि अरब सागर में प्री-मानसून चक्रवातों की अधिकतम तीव्रता हाल के दशकों में 40% बढ़ी है।
दूसरी ओर, एक वैश्विक मॉडलिंग अध्ययन चेतावनी देता है कि यदि दुनिया नेट-ज़ीरो उत्सर्जन में देरी करती है, तो हीटवेव और भी लंबी, तीव्र और बार-बार होंगी। अध्ययन बताता है कि नेट-ज़ीरो हासिल होने के बाद भी, हीटवेव कम से कम 1,000 वर्षों तक पूर्व-औद्योगिक स्तरों पर वापस नहीं आएंगी। यदि नेट-ज़ीरो 2050 या इसके बाद हासिल होता है, तो दक्षिणी गोलार्ध और भूमध्य रेखा के नज़दीक देश — जैसे भारत — में ऐतिहासिक रूप से दुर्लभ हीटवेव हर साल आने लगेंगी।
शोधकर्ताओं का कहना है कि समवर्ती चरम घटनाएँ (compound extremes) — यानी हीटवेव और सूखा एक साथ — आने वाले वर्षों में भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती हैं, जो कृषि, जल-प्रबंधन और स्वास्थ्य-प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित करेंगी। अध्ययन में कहा गया है कि भारत को तुरंत क्लाइमेट-स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, मजबूत अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम, और जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाए।
जलवायु परिवर्तन प्रभाव वाले जिलों में बच्चों में 25% अधिक कुपोषण
भारत में के उन जिलों में जहां जलवायु परिवर्तन से संवेदनशीलता अधिक है — यानी बाढ़, सूखा, गर्मी, अन्य चरम मौसम की घटनाओं का खतरा — वहां बच्चों के लिए पोषण की स्थिति चिंताजनक पाई गई है। एक नये अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि जलवायु के दृष्टि से संकटग्रस्त (Climate Vulnerable) जिलों में बच्चों का वज़न कम (underweight) होने का खतरा उन जिलों से लगभग 25 % अधिक है जिनकी जलवायु संवेदनशीलता कम है।
खाद्य-पोषण के अलावा, अध्ययन ने यह भी पाया कि इन संवेदनशील जिलों में wasting (कम वजन/ऊँचाई अनुपात) और स्टंटिंग (कुपोषण से कम विकास) की संभावना क्रमशः 6 % और 14 % अधिक है। साथ ही, गैर-संस्थागत प्रसव (non-institutional deliveries) की दर भी 38 % अधिक पाई गई है, जो दिखाता है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में कमी भी एक बड़ी वजह है।
शोधकर्ताओं ने कहा है कि यह परिणाम पारम्परिक आर्थिक या सामाजिक असमानता तक सीमित नहीं — बल्कि जलवायु संवेदनशीलता, मौसमी अस्थिरता और स्वास्थ्य अवसंरचना की कमज़ोरी से निकले हैं। इसलिए, बच्चों के स्वास्थ्य व पोषण सुधार के लिए जलवायु-अनुकूल सार्वजनिक स्वास्थ्य व सामाजिक नीतियाँ जरूरी हैं।
यदि समय पर कदम न उठाये गये तो जलवायु संकट से जुड़ा कुपोषण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और विकास के लक्ष्यों (SDGs) पर गहरा असर डाल सकता है।
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कॉप30 में भारत का कड़ा संदेश: क्लाइमेट जस्टिस के बिना कोई समझौता नहीं
भारत ने बेलेम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप30 में ब्राज़ील के समावेशी नेतृत्व के लिए अपना ‘दृढ़ समर्थन’ व्यक्त किया और सम्मेलन में लिए गए कई निर्णयों का स्वागत किया। भारत ने वार्ता के नतीजों पर संतोष जताया, लेकिन यह भी कहा कि इसे जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ठोस नीतिगत सफलता नहीं कहा जा सकता।
भारत ने ग्लोबल गोल ऑन अडैप्टेशन (GGA) में हुई प्रगति की सराहना करते हुए कहा कि यह विकासशील देशों की अनुकूलन जरूरतों को मान्यता देता है। भारत ने विकसित देशों की जलवायु वित्त देने की दशकों पुरानी जिम्मेदारियों पर ज़ोर दिया और पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 पर आगे बढ़ने के लिए ब्राज़ील की राष्ट्रपति पद टीम का धन्यवाद किया।
भारत ने जस्ट ट्रांज़िशन मैकेनिज़्म की स्थापना को कॉप30 का सबसे बड़ा परिणाम बताया और उम्मीद जताई कि इससे वैश्विक स्तर पर जलवायु न्याय को मजबूती मिलेगी।
भारत ने एकतरफा व्यापार-संयमित जलवायु उपायों पर चर्चा की अनुमति देने के लिए भी ब्राज़ील का आभार जताया और कहा कि ऐसे कदम विकासशील देशों के लिए हानिकारक हैं।
भारत ने निष्पक्ष, समावेशी और न्यायसम्मत जलवायु कार्रवाई के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
जलवायु संकट से भारत के निर्यात उद्योगों पर बढ़ा खतरा: बीसीजी रिपोर्ट
भारत के एल्युमिनियम, आयरन और स्टील जैसे निर्यात-आधारित उद्योग क्लाइमेट एक्शन की कमी के कारण गंभीर जोखिमों का सामना कर रहे हैं। ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म बीसीजी के अनुसार, ये जोखिम कंपनियों के मुनाफे, कामकाज और भविष्य की संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
‘क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026’ के मुताबिक भारत चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित शीर्ष 10 देशों में शामिल है। बीसीजी के सीनियर पार्टनर सुमित गुप्ता ने कहा कि ऐसे घटनाक्रम 2030 तक भारत के GDP का 4.5% तक नुकसान कर सकते हैं। सदी के अंत तक यह नुकसान 6.4% से बढ़कर 10% तक पहुंच सकता है।
बीसीजी के अनिर्बाण मुखर्जी ने बताया कि विशेष रूप से एल्युमिनियम, आयरन और स्टील जैसे क्षेत्रों पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का प्रभाव बढ़ रहा है। ईयू का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (सीबीएएम) भारत के लगभग 7.7 अरब डॉलर के निर्यात पर असर डाल सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग जलवायु जोखिम संभालने में कमजोर हैं, जिससे बड़ी कंपनियों की सप्लाई चेन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
ईयू ने 16 ‘स्ट्रैटेजिक’ खनन परियोजनाओं की समीक्षा की मांग ठुकराई
यूरोपीय संघ ने पर्यावरण समूहों की 16 खनन परियोजनाओं की समीक्षा की मांग को खारिज कर दिया है। ईयू ने इन शिकायतों को ‘आधारहीन’ बताया। ये परियोजनाएं कुल 47 रणनीतिक परियोजनाओं की सूची का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल तकनीक के लिए जरूरी खनिजों की आपूर्ति बढ़ाना है। ये परियोजनाएं स्वीडन से लेकर स्पेन तक कई देशों में स्थित हैं।
पर्यावरण समूहों का आरोप है कि यूरोपीय संघ पर्यावरण मानकों की बजाय जल्द मंजूरी देने को वरीयता दे रहा है। कई परियोजनाएं शुरुआती चरण में हैं और उनके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी पूरा नहीं हुआ है। स्थानीय समुदायों ने भी पानी, जैव विविधता और जीविका पर खतरे की आशंका जताई है।
ईयू ने कहा कि उसे केवल ‘समग्र मूल्यांकन’ करना होता है, जबकि विस्तृत जांच सदस्य देशों की जिम्मेदारी है। सामाजिक और मानवाधिकार प्रभावों की समीक्षा से भी उसने इनकार कर दिया। एनजीओ ने इसे सतही प्रतिक्रिया बताया और कहा कि सस्टेनेबिलिटी के मानदंड सिर्फ ‘औपचारिकता’ बनकर रह गए हैं।
विकाशील देशों ने की औद्योगिक मांस उत्पादन पर जीएचजी टैक्स की मांग
कॉप30 में अफ्रीका और पैसिफिक के 28 निम्न-आय वाले देशों ने मांग की है कि यदि अमीर राष्ट्र औद्योगिक पशुपालन से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को स्वेच्छा से कम नहीं करेंगे, तो उन्हें उत्सर्जन मूल्य निर्धारण (जीएचजी प्राइसिंग) के जरिए इसके नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। नाइजीरिया, फिजी, युगांडा, चाड और पापुआ न्यू गिनी सहित कई देशों ने ‘बेलेम डिक्लेरेशन’ पर हस्ताक्षर किए, जिसमें ओईसीडी देशों, यूरोपीय संघ और चीन से औद्योगिक मांस उत्पादन पर जीएचजी टैक्स लगाने की अपील की गई।
इन देशों की कुल आबादी लगभग 1.4 करोड़ है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव रोज झेल रही है। घोषणा में कहा गया कि इस टैक्स से मिलने वाली आय का 20% हिस्सा ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ में जाना चाहिए।
घोषणा में बताया गया कि वैश्विक जीएचजी उत्सर्जन का एक-तिहाई कृषि और खाद्य प्रणाली से आता है, जिसमें पशुपालन सबसे बड़ा स्रोत है। अमीर देशों में मांस उपभोग विकासशील देशों की तुलना में कई गुना अधिक है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भविष्य की कॉप बैठकों में मांस के अत्यधिक उपभोग में कमी को प्राथमिकता देने की मांग की है।
भारत में ग्राउंड वॉटर में बढ़ रहा है यूरेनियम: रिपोर्ट
केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, भारत भर में कई राज्यों में ग्राउंड वॉटर में यूरेनियम (uranium) का स्तर सुरक्षित सीमा (30 ppb यानी 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर) से अधिक पाया गया है। CGWB ने देश के अलग अलग राज्यों से कुल 15,000 सैंपलों का अध्ययन किया।
इस मामले में पंजाब देश के सबसे असुरक्षित राज्यों में है जहां 53% नमूनों में यूरेनियम का स्तर (मॉनसून पूर्व सर्वे में) सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया। मॉनसून के बाद किये गये सर्वे में तो पंजाब से लिए गये 62.5% नमूनों में यूरेनियम का स्तर सुरक्षित सीमा दिल्ली में, 86 निगरानी स्थलों पर किए गए परीक्षणों में कुल 83 नमूनों में से 24 नमूनों — यानी लगभग 13.35 % से 15.66 % — में यूरेनियम स्तर तय मानकों से अधिक पाया गया।
रिपोर्ट में यह बताया गया है कि प्रदूषण मुख्यतः उन क्षेत्रों में ज्यादा है जहाँ भूजल की खपत अधिक है और aquifer (भूजल स्तर) गिर चुका है — जैसे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि। यह भी स्पष्ट किया गया है कि मानसून-पूर्व और मानसून-पश्चात दोनों मौसमों में नमूनों में यूरेनियम पाया गया और कई नमूनों में यह 30 पीपीबी (पार्ट्स प्रति बिलियन) से अधिक था, जो कि सुरक्षित सीमा से ऊपर है। विश्लेषकों का कहना है कि यह स्थिति स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है — क्योंकि लंबे समय तक यूरेनियम युक्त जल पीने से गुर्दे और हड्डियों को नुकसान, कैंसर या अन्य बीमारियाँ हो सकती हैं।
सीजीडब्ल्यूबी रिपोर्ट इस उभरते खतरे की ओर चेतावनी देती है: भूजल की नियमित निगरानी, दूषित जल स्रोतों की पहचान, और प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित जल उपलब्ध कराने के लिए तुरंत कार्रवाई की जरूरत है।
भारत का कोई बड़ा शहर 10 सालों में हासिल नहीं कर पाया सेफ एक्यूआई लेवल
भारत के किसी भी बड़े शहर ने पिछले दस वर्षों (2015–20 नवंबर 2025) में सुरक्षित वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) हासिल नहीं की। एक नए अध्ययन में दिल्ली को दशकभर देश का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया, जहाँ 2025 में औसत एक्यूआई लगभग 180 रहा।
दिल्ली स्थित क्लाइमेट ट्रेंड्स के अध्ययन में पाया गया कि कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, चंडीगढ़ और विशाखापट्टनम में प्रदूषण स्तर ‘मध्यम लेकिन असुरक्षित’ श्रेणी में रहा। बेंगलुरु की हवा सबसे साफ रही, लेकिन उसका एक्यूआई भी ‘गुड’ श्रेणी से ऊपर ही रहा।
अध्ययन के अनुसार, 2020 के बाद कई शहरों में मामूली सुधार दिखा, लेकिन कोई शहर सुरक्षित एक्यूआई के करीब भी नहीं पहुँचा। उत्तर और पश्चिम भारत के शहर — लखनऊ, वाराणसी और अहमदाबाद — लगातार खतरनाक प्रदूषण दर्ज करते रहे।
दिल्ली में इस वर्ष पराली जलने में भारी कमी के बावजूद हवा में सुधार नहीं हुआ, जिससे स्पष्ट है कि स्थानीय प्रदूषण स्रोत + मौसम विज्ञान मिलकर सर्दियों की स्मॉग को और घातक बना रहे हैं। अक्टूबर में बारिश की कमी और कमजोर पश्चिमी विक्षोभों ने प्रदूषकों की प्राकृतिक सफाई को रोका, जिससे स्मॉग जल्द बन गया।
अध्ययन ने कहा कि भारत का प्रदूषण संकट ‘राष्ट्रीय, स्थायी और संरचनात्मक’ है — जिसके लिए सख्त नीति, विज्ञान-आधारित समाधान, और दीर्घकालिक शहरी योजना सुधार जरूरी हैं।
वायु-प्रदूषण से फेफड़ों का संकट हृदय रोग से अधिक तेज़ी से बढ़ रहा
भारत में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियाँ — खासकर Chronic Obstructive Pulmonary Disease (COPD) — अब हृदय की बीमारियों से भी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। हालिया रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वायु-प्रदूषण, धूल, स्मॉग और औद्योगिक प्रदूषक हवा में फैल रहे हैं, जो सांस की नली व फेफड़ों को धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त कर रहे हैं।
पिछले दशकों में भारत में फेफड़ों की क्षमता विश्व के अन्य देशों की तुलना में हमेशा कम रही है। अब, बढ़ती कार्बन उत्सर्जन, प्रदूषित हवा, वाहन व उद्योगों से निकलने वाले धुएँ व पार्टिकुलेट्स के कारण, फेफड़ों की रक्षा के लिए जिस सीमित जमीनी बचाव-क्षमता थी वह धीरे-धीरे खो रही है। विशेषज्ञ कहते हैं कि अब COPD सिर्फ धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं रही — अधिकतर मरीज वे हैं जो कभी सिगरेट तक नहीं पीते, लेकिन हवा या घरेलू प्रदूषण के संपर्क में लगातार रहते हैं।
हृदय रोगों पर भारी निवेश व ध्यान दिया गया है, लेकिन फेफड़ों की सेहत पर जो संकट मंडरा रहा है, उसे बहुत ही कम समझा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फेफड़ों से जुड़ी गिरावट एक बार शुरू हो जाए, तो उसे वापस लाना मुश्किल है — उपचार से केवल लक्षणों में राहत मिलती है, लेकिन नलियाँ व वायु-मार्ग पहले जैसी नहीं रह पाते।
इसलिए विशेषज्ञ अब वायु-गुणवत्ता सुधार, प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा व जलवायु-स्मार्ट नीतियों को प्राथमिकता देने की सख्त वकालत कर रहे हैं। क्योंकि अगर हवा नहीं साफ हुई, तो फेफड़ों की बढ़ती बीमारियों के कारण लाखों लोग धीरे-धीरे दम तोड़ देंगे।
जलवायु परिवर्तन से माइक्रोप्लास्टिक का खतरा बढ़ा
एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन वैश्विक माइक्रोप्लास्टिक संकट को और गंभीर बना रहा है। फ्रंटियर्स इन साइंस में प्रकाशित इस विश्लेषण में सैकड़ों अध्ययनों की जांच की गई और पता चला कि बढ़ता तापमान, चरम मौसम और जंगल की आग से हवा, पानी, मिट्टी और वन्यजीवों में प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि आमतौर पर प्लास्टिक को केवल ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने वाले कारक के रूप में देखा जाता है, लेकिन अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन भी प्लास्टिक को ज्यादा खतरनाक बना रहा है। गर्मी से प्लास्टिक तेजी से टूटता है, जबकि तूफान और बाढ़ उसे दूर-दूर तक फैलाते हैं। हांगकांग में आए टाइफून के बाद समुद्री तटों पर माइक्रोप्लास्टिक 40 गुना बढ़ गया था।
जंगल की आग इमारतों और वाहनों को जलाकर प्लास्टिक कण और विषैले रसायन हवा में छोड़ देती है। अध्ययन ने चेताया है कि पिघलती समुद्री बर्फ भी जल्द ही बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक छोड़ सकती है। वैज्ञानिकों ने वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक उपयोग घटाने और एक बाध्यकारी वैश्विक प्लास्टिक संधि की मांग की है।
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ग्रीन एनर्जी पर सख्ती टली? मंत्रालय ने कहा- ‘कड़े नियमों से सेक्टर में निवेश रुकेगा’
भारत सरकार का अक्षय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने बिजली नियामक सीईआरसी से अनुरोध किया है कि पवन और सौर ऊर्जा कंपनियों के लिए लाए जा रहे सख्त नए नियमों को धीमी गति से लागू किया जाये।
ये नियम विचलन निपटान तंत्र (डीएसएम ) से जुड़े हैं। इसके तहत, ग्रीन एनर्जी कंपनियों को अपनी बिजली आपूर्ति का जो अनुमान (forecasting) देना होता है, और जो वे वास्तव में ग्रिड को सप्लाई करते हैं, उसके बीच का अंतर (विचलन) कम करने का प्रस्ताव है। अगर यह विचलन ज्यादा होता है, तो कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाने की तैयारी थी।
मंत्रालय और उद्योग जगत का कहना है कि ये नियम जल्दबाजी में लागू हुए तो ग्रीन एनर्जी में निवेश धीमा हो जाएगा। जो मुख्य कारण बताये गये हैं उनमें पहला है मौसम की मार: पवन और सौर ऊर्जा का उत्पादन सीधे मौसम की अनिश्चितता पर निर्भर करता है। कंपनियों के लिए 100% सटीक पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है।
दूसरा कारण है छोटे डेवलपर्स को खतरा: उच्च जुर्माने से छोटे और मध्यम डेवलपर्स का मुनाफा खत्म हो जाएगा, जिससे वे नई परियोजनाएं लगाने से कतराएंगे।
मंत्रालय ने सीईआरसी को सुझाव दिया है कि जुर्माने लगाने के बजाय, भविष्य की परियोजनाओं में ऊर्जा भंडारण (Storage) को अनिवार्य किया जाए। इससे आपूर्ति स्थिर होगी और भारत के 500 गीगावाट ग्रीन एनर्जी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
भूमि सीमित होने के कारण फ्लोटिंग सोलर और फार्म-PV पर जोर दे रहा भारत
भारत अब नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार में नए मॉडल अपना रहा है — जहाँ जमीन कम है, वहाँ फ्लोटिंग सोलर (Floating Solar) और खेतों-पर स्थापित सोलर PV (Farm PV) योजनाओं को बढ़ावा मिल रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित समाचार के मुताबिक भारत बढ़ती ऊर्जा मांग, भूमिसंकीर्णता और जलवायु लक्ष्यों के मद्देनज़र इन विकल्पों को कारगर मान रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, तैरते सोलर प्लांट जलाशयों, बांधों और जलाश्रित क्षेत्रों पर स्थापित होते हैं, इसलिए कृषि-भूमि व जंगलों पर दबाव नहीं पड़ता। यह जमीन व जल दोनों बचाता है, साथ ही जलमंडल तापवृद्धि को धीमा कर आर्थिक-पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखता है।
Farm PV मॉडल में खेतों या कृषि योग्य जमीन पर ही सोलर पैनल लगाए जाते हैं – इससे किसानों को खेती व ऊर्जा दोनों का लाभ मिलता है, और भूमि उपयोग संघर्ष कम होते हैं। Experts मानते हैं कि इस तरह के संयोजन से भारत का 500 GW नॉन-फॉसिल ऊर्जा लक्ष्य अधिक व्यावहारिक हो जाएगा।
हालांकि अभी ये विकल्प बड़े पैमाने पर नहीं फैले हैं, पर सरकारी नीतियाँ, टेक्नोलॉजी सुधार और निवेश प्रवृत्ति इस ओर संकेत दे रही हैं। आने वाले सालों में तैरते सूर्य-पावर और फार्म-PV देश की ऊर्जा क्रांति की कुंजी बन सकते हैं।
भारत की रूफटॉप सोलर क्षमता में 161% बढ़ी
भारत ने वर्ष 2025 के पहले नौ महीनों में 4.9 गीगावॉट रूफटॉप सोलर क्षमता जोड़ी, जो पिछले साल की इसी अवधि में दर्ज 1.9 गीगावॉट के मुकाबले 161% अधिक है। यह जानकारी मेरकॉम इंडिया की Q3 2025 रूफटॉप सोलर मार्केट रिपोर्ट में दी गई है।
तीसरी तिमाही में देश ने 2.1 गीगावॉट रूफटॉप सोलर क्षमता जोड़ी, जो पिछली तिमाही के 1.6 गीगावॉट की तुलना में 29% ज्यादा और सालाना आधार पर 164% अधिक है। तिमाही के दौरान जोड़ी गई कुल सौर क्षमता में रूफटॉप सोलर की हिस्सेदारी 24.1% रही।
भारत में बिजली उत्पादन 4% बढ़ा, नवीकरणीय ऊर्जा ने दिलाई बढ़त
जुलाई-सितंबर 2025 तिमाही में भारत का बिजली उत्पादन 3.6% बढ़कर 484.07 बिलियन यूनिट पर पहुंच गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में 18.6% की तेज वृद्धि हुई, जिसने कोयला आधारित बिजली में 1.6% और परमाणु उत्पादन में 18.6% की गिरावट की भरपाई कर दी।
इस तिमाही में देश ने रिकॉर्ड 16,071 मेगावॉट नई क्षमता जोड़ी, जिसमें 83% हिस्सा गैर-फॉसिल स्रोतों का रहा। भारत की कुल स्थापित क्षमता सितंबर के अंत तक 500.9 गीगावॉट हो गई, जिसमें आधे से ज्यादा हिस्सा अब स्वच्छ ऊर्जा का है। निवेश भी मजबूत बना हुआ है, जिससे ऊर्जा बदलाव की रफ्तार और बढ़ी है।
गुजरात: सभी सरकारी वाहनों को ईवी में बदलने की योजना तैयार
गुजरात सरकार ने सभी सरकारी पेट्रोल-डीजल वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) में बदलने की योजना तैयार की है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, सभी विभागों को जल्द ही पेट्रोल और डीजल वाहनों को हटाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे। यह प्रस्ताव वलसाड में चल रहे चिंतन शिविर में भी चर्चा के लिए रखा जाएगा।
सूत्रों ने बताया कि गुजरात नवीकरणीय ऊर्जा में अग्रणी रहा है, लेकिन इलेक्ट्रिक मोबिलिटी अपनाने में राज्य काफी पीछे है। इंडिया इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडेक्स के अनुसार, गुजरात वर्तमान में 16वें स्थान पर है, जो दर्शाता है कि सुधार की बड़ी गुंजाइश है।
अधिकारियों का कहना है कि राज्य की ईवी नीति कई इंसेंटिव देती है, लेकिन सरकारी विभागों में ईवी का इस्तेमाल अब भी काफी सीमित है। अधिकतर सरकारी और नगर निकायों के वाहन अभी भी पेट्रोल पर चलते हैं, जबकि चार्जिंग स्टेशन मुख्य रूप से शहरी इलाकों तक सीमित हैं।
सरकार जीएसआरटीसी की बसों को भी चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक में बदलने पर विचार कर रही है, खासकर उन रूटों पर जहां इलेक्ट्रिक वाहन आर्थिक और तकनीकी रूप से उपयुक्त हैं। अधिकारियों के अनुसार, विभागवार लक्ष्य तय कर, जिलों में चार्जिंग नेटवर्क बढ़ाकर और सार्वजनिक परिवहन में ईवी पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर स्वच्छ परिवहन के लक्ष्य को तेजी से हासिल करने की योजना है।
भारत: ईवी पंजीकरण 20 लाख यूनिट के पार
भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार 2025 में नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। इस साल ईवी पंजीकरण 2.02 मिलियन (20 लाख) यूनिट पार कर गया, जो 2024 के पूरे साल के आंकड़े — 1.95 मिलियन (19.5 लाख) — से अधिक है। यह बढ़ोतरी मजबूत मांग, नए मॉडल और स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने वाली नीतियों के कारण हुई है।
इलेक्ट्रिक दोपहिया सबसे आगे रहे, जिनकी बिक्री 12 लाख यूनिट तक पहुंच गई। इलेक्ट्रिक कारों और SUVs के 1.56 लाख पंजीकरण हुए, जो पिछले साल से 57% ज्यादा है। ई-रिक्शा और ई-थ्री-व्हीलर की बिक्री लगभग स्थिर रही।
एक रिपोर्ट के अनुसार, टाटा, मारुति, हुंडई और एमजी जैसी कंपनियां तेजी से अपने ईवी मॉडल और उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं, जबकि बेहतर चार्जिंग सुविधाएं भी ग्राहकों का भरोसा बढ़ा रही हैं।
‘बैकडोर बैन’ के ज़रिए ईवी अनिवार्य करने की योजना बना रहा ईयू
यूरोपीय संघ 2030 तक किराए और कॉर्पोरेट कार बाजारों में तेज़ी से इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अनिवार्य करने की योजना बना रहा है।
वाहन उद्योग इसे पेट्रोल गाड़ियों पर ‘बैकडोर बैन’ बता रहा है। मौजूदा प्रस्ताव के तहत बड़े व्यवसायों को ज्यादातर ईवी खरीदने की बाध्यता होगी, जबकि 2035 के अंतर्दहन इंजन (आईसीई) प्रतिबंध में ढील देने पर भी विचार चल रहा है। जर्मनी ने इस कोटा प्रणाली का विरोध किया है। उद्योग का कहना है कि चार्जिंग ढांचे और मांग की कमी से फ्लीट नवीनीकरण धीमा होगा, पुरानी पेट्रोल कारें सड़कों पर बनी रहेंगी, और ईवी की रीसेल वैल्यू पर भी दबाव पड़ेगा।
फोटो: Agência Brasil/Flickr
कॉप30 में जीवाश्म ईंधन छोड़ने का रोडमैप बना रहस्य
ब्राज़ील के बेलेम में सम्पन्न कॉप30 जलवायु सम्मेलन ने फॉसिल फ्यूल (कोयला, तेल-गैस) को चरणबद्ध तरीके से बंद करने का कोई स्पष्ट रोडमैप तय नहीं किया, जिससे वैश्विक जलवायु कार्रवाई की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है।
समापन दस्तावेज – जिसे ‘Mutirão (मुटिराव)’ कहा गया — में फॉसिल ईंधन का नाम ही नहीं आया। कइयों की उम्मीदों के बावजूद, कोयला व ग़ैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन से हटने का कोई तय समय-सारिणी या प्रतिबद्धता शामिल नहीं की गई।
हालाँकि सम्मेलन ने जलवायु अनुकूलन (adaptation) के लिए फंडिंग बढ़ाने, वनों की रक्षा और शुद्ध-ऊर्जा संक्रमण की चर्चा शुरू करने जैसे कदम उठाए, लेकिन फॉसिल ईंधन पर निर्भरता समाप्त किए बिना तापमान वृद्धि और जलवायु अस्थिरता की चुनौतियों से निपटना मुश्किल बनेगा। विशेषज्ञों और जलवायु कार्यकर्ताओं ने इस समझौते को ‘कमज़ोर और असंतोषजनक’ बताया है, क्योंकि जीवाश्म ईंधन बंद करने पर विचार न करना – 1.5° C लक्ष्य को पुख्ता अंदाज़ा देने में विफलता है।
कॉप30 दिखाता है कि राजनीतिक सहमति, तेल-गैस उत्पादक देशों के प्रभाव और अर्थव्यवस्था की भूख के बीच संतुलन बनाए रखना, जलवायु आपातकाल (climate emergency) से निपटने से कहीं ज़्यादा कठिन हो गया है। अब अधिक दृढ़, वैज्ञानिक-निर्धारित और जवाबदेह कदमों की दरकार है।
फॉसिल-फ्यूल लॉबी के कारण क्लाइमेट एक्शन से भटक रहा विश्व
एक ताज़ा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वैश्विक जलवायु एक्शन अब ‘समय से पूरी तरह पीछे’ है — और इसका प्रमुख कारण है जीवाश्म ईंधन उद्योग की राजनीति व ज़बरदस्त लॉबिंग।
रिपोर्ट के अनुसार, 194 देशों द्वारा हिस्सा लेने वाले हाल के COP30 सम्मेलन में, कोई ठोस योजना नहीं बन सकी कि कोयला-तेल-गैस जैसे फॉसिल ईंधन का चरणबद्ध बंद कैसे हो। फॉसिल-फ्यूल पर निर्भरता, लॉबिस्ट दबाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने हर प्रयास को कमजोर कर दिया।
फॉसिल फ्यूल के खिलाफ बने मंच (Fossil Fuel Non-Proliferation Treaty initiative) के निदेशक ने स्पष्ट रूप से कहा कि कॉप30 के परिणाम से स्पष्ट है कि हम ‘जलवायु आपात काल’ से निपटने के पथ से भटक गए हैं। उन्होंने आगाह किया कि यदि फॉसिल-फ्यूल पर निर्भरता नहीं छोड़ी गई, तो जलवायु संकट और गहरा होगा — विशेषकर गरीब और संवेदनशील देशों के लिए।
रिपोर्ट ने यह भी दिखाया कि दुनिया के कई हिस्सों में ‘ग्रीन एनर्जी’ के प्रति रुचि है और उसकी ओर संक्रमण हो रहा है, लेकिन औद्योगिक लॉबी, आर्थिक हित और रणनीतिक संकुचन के कारण बदलाव बहुत धीरे हो रहा है। अगर अब सक्रिय और न्यायपूर्ण “फॉसिल-फ्यूल से मुक्ति के साथ हरित ऊर्जा, नयी नीति नहीं अपनाई गई – तो जलवायु आपदा की तीव्रता और सामान्य हो जाएंगी।






