उत्तराखंड में 60 घंटे तक लगातार हुई बारिश के कारण भूस्खलन की सैकड़ों घटनाएं हुई। तस्वीर कोटद्वार-पौड़ी हाईवे की है। फोटो: त्रिलोचन भट्ट

उत्तराखंड में 60 घंटे तक लगातार भारी बारिश, नदियों का जलस्तर बढ़ा

लगभग 60 घंटे तक लगातार हुई भारी बारिश के कारण उत्तराखंड में हालात काफी खराब हो गए हैं। कई इलाकों में 200 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई। इस वजह से पहाड़ी क्षेत्रों में ज्यादातर सड़कें बंद हैं, नदियां और बरसाती नालों का उफान पर हैं। नदियों के किनारे बसे लोग सुरक्षित जगहों पर चले गये हैं। इस दौरान भूस्खलन की कई छोटी-छोटी घटनाएं हुई हैं, हालांकि अभी तक कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। 

मौसम विभाग से मिले आंकड़े बताते हैं कि 20 जून की सुबह तक सबसे ज्यादा बारिश चमोली में दर्ज की गई। यहां लगातार 60 घंटों के दौरान 239 मिमी बारिश हो चुकी थी। चमोली जिले के ही गैरसैंण में इस दौरान 203 मिमी बारिश हुई। रुद्रप्रयाग जिले के जखोली में 145 मिमी और ऊखीमठ में 129 मिमी बारिश हुई है। नैनीताल में 171.5 मिमी और इसी जिले में मुक्तेश्वर में 224.0 मिमी बारिश दर्ज की गई। पौड़ी में 193 मिमी बारिश हुई। अल्मोड़ा में 211 मिमी और इसी जिले के चैखुटिया में 165 मिमी बारिश दर्ज की गई।

गंगा और यमुना सहित सभी प्रमुख नदियों का चेतावनी निशान से ऊपर पहुंच गया था। कई जगहों पर यह खतरे के निशान तक पहुंचा। ऋषिकेश में गंगा नदी का जलस्तर 340.35 मीटर तक पहुंच गया। यहां खतरे का निशान 340.50 मीटर है। देहरादून के डाकपत्थर में यमुना का जलस्तर 455.06 मीटर था, जबकि खतरे का निशान 455.37 मी है। टौंस का जलस्तर 644.15 मीटर था, जबकि खतरे का निशान 644.75 मी है। रुद्रप्रयाग में मन्दाकिनी 626 मीटर पर और अलकनंदा 627 मीटर पर बह रही थी। यह दोनों चेतावनी के स्तर से ऊपर और खतरे के स्तर से कुछ नीचे थी। अलकनन्दा की दो और सहायक नदियां पिंडर और नन्दाकिनी खतरे के स्तर से ऊपर बह रही थी। नन्दाकिनी 868.65 मीटर पर और पिंडर 770.28 मीटर तक पहुंच गई। पिथौरागढ़ में काली नदी का जलस्तर भी खतरे के निशान से कुछ नीचे 889.60 मीटर मापा गया। 7 फरवरी को तबाही का कारण बनी चमोली जिले की ऋषिगंगा फिर उफान पर पहुंच गई और रैणी गांव का पुल फिर खतरे की जद में आ गया है।


पहाड़ों की इस बारिश से हरिद्वार और यूपी में भी गंगा भी पानी का स्तर बढ़ गया। टिहरी बांध से अतिरिक्त पानी छोड़े जाने के बाद हरिद्वार में 19 जून की दोपहर 3 लाख 92 हजार 404 क्यूसेक पानी बह रहा था। बताया जाता है कि इससे पहले गंगा में इतना पानी 2013 की आपदा के दौरान आया था। हरिद्वार में सभी गंगाघाट में पानी में डूब गये। ऋषिकेश में भी त्रिवेणी घाट, माया कुंड और चंद्रेश्वर घाट पानी में दो दिन पानी में डूबे रहे। रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और श्रीनगर में अलकनन्दा के किनारे की बस्तियां खतरे की जद में हैं। ,

भारी बारिश के बीच भूस्खलन की कोई बड़ी घटना नहीं हुई। लेकिन, पूरे पहाड़ी इलाके में हर जगह बड़ी संख्या में छोटी-बड़ी भूस्खलन की घटनाएं हुई हैं। भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में रहने वाले ज्यादातर लोग अपने घरों को छोड़कर दूसरों के घरों में रह रहे हैं। चमोली के रैणी, रुद्रप्रयाग के सेमी और पांजणा जैसे सैकड़ों गांवों के लोग रात का पहरा दे रहे हैं, ताकि कोई घटना होने पर लोगों को घरों से बाहर निकाला जा सके। इस दौरान राज्य में दो लोगों की मौत हुई। पिथौरागढ़ में निर्माणाधीन सड़क पर पहाड़ी का मलबा जेसीबी पर गिर जाने से ड्राइवर की मौत हो गई। पौड़ी जिले के रिखणीखाल में एक महिला बरसाती नाले में बह गई।

राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में सबसे बुरी स्थिति सड़कों की है। संपर्क मार्ग तो दूर पहाड़ों को जोड़ने वाले ज्यादातर मुख्य मार्ग भी बंद हो गये हैं। राज्य आपदा परिचालन केन्द्र के आंकड़ों के अनुसार राज्य की 170 सड़कें अब भी बंद हैं और 500 गांव अपने जिला मुख्यालयों से कटे हुए हैं। आॅल वेदर रोड के नाम से प्रचारित नेशनल हाईवे-58 ऋषिकेश से बदरीनाथ तक तीन दर्जन से ज्यादा जगहों पर अब भी टूटा हुआ है। चार धाम सड़क परियोजना के तहत इस सड़क को चैड़ा करने के लिए की गई खुदाई से एक तरफ जहां पुराने स्लाइडिंग जोन फिर से सक्रिय हुई हैं, वहीं 50 से ज्यादा नये स्लाडिंग बनने की भी संभावना जताई जा रही है।

ये स्टोरी डाउन टू अर्थ हिन्दी से साभार ली गई है।

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