जलवायु परिवर्तन: बच्चों पर हो रहा है बड़ा हमला

Newsletter - November 13, 2019

विरोध प्रदर्शन बेवजह नहीं – लांसेट की नई रिपोर्ट बताती है कि हाल में दुनिया भर में हुए विरोध प्रदर्शन बेवजह नहीं थे। जलवायु परिवर्तन की कीमत हमारी अगली पीढ़ी को चुकानी है। छोटे-छोटे बच्चे इसके निशाने पर हैं।

ग्लोबल वॉर्मिंग के शिकार मासूम

जाने माने मेडिकल जर्नल लांसेट ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को केंद्र में रखा है। लांसेट ने 41 पहलुओं को ध्यान में रखकर लिखी रिपोर्ट में बताया है कि कैसे क्लाइमेट में बदलाव और वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियां बच्चों के लिये घातक है। रिपोर्ट बताती है कि लंबे संघर्ष के बाद कुपोषण और संक्रामक बीमारियों के खिलाफ मिली थोड़ी बहुत कामयाबी को क्लाइमेट चेंज मिट्टी में मिला देगा।

भारतीय समय के मुताबिक गुरुवार अल-सुबह रिलीज़ हुई इस रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया भर में 9-10 साल के बच्चों में साल 2000 से डेंगू बुखार का पैटर्न बढ़ रहा है। डायरिया जैसी बीमारियां दोगुनी हो गई हैं।  

भारत के मामले में साफ कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही सूखे की घटनाओं से महंगाई बच्चों के पोषण के लिये एक समस्या बन रहा है। उनको अनाज मिलना मुश्किल हो रहा है। महत्वपूर्ण है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों की दो-तिहाई कुपोषण के कारण होती हैं। बदलती जलवायु में डायरिया या हैजे जैसी बीमारियों के बैक्टीरिया आसानी से पनप रहे हैं और ज़िन्दा रहते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किशोरावस्था के दौरान प्रदूषण का सेहत पर प्रभाव बढ़ता है।

जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं पर भी लांसेट रिपोर्ट में चिन्ता जताई गई है और कहा गया है कि 2001-04 से अब तक करीब 2.1 करोड़ अधिक लोग जंगलों में आग से प्रभावित हो रहे हैं। ज़ाहिर है जंगलों का जलना वायु प्रदूषण के साथ- साथ तापमान वृद्धि में बढ़ा रोल अदा करता है।

पेरिस समझौते के वादों के मुताबिक अगर दुनिया के देश धरती की तापमान-वृद्धि 2 डिग्री से कम रखने में कामयाब होते हैं तो आज पैदा होने वाला बच्चा 31 साल की उम्र में कार्बन न्यूट्रल दुनिया में सांस लेगा लेकिन बदकिस्मती यह है कि वर्तमान हालात में से ऐसा होता नहीं दिख रहा।


क्लाइमेट साइंस

एक और तबाही: चक्रवाती तूफानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बुलबुल ने भारत और बांग्लादेश में कम से कम 24 लोगों की जान ले ली और कई लाख लोग बेघर हो गये। Photo: Skymet Weather

चक्रवाती तूफान बुलबुल ने ले ली भारत और बांग्लादेश में ली 24 लोगों की जान

चक्रवाती तूफान बुलबुल ने अब तक भारत और बांग्लादेश में कम से कम 24 लोगों की जान ले ली है। बंगाल की खाड़ी से उठे इस तूफान ने पहले पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में कहर बरपाया जिसमें 12 लोग मारे गये और फिर तूफान ने बांग्लादेश का रुख किया। इस चक्रवात के कारण लाखों लोग बेघर हो गये। हर साल अप्रैल से दिसंबर तक बंगाल की खाड़ी से चक्रवाती तूफानों के उठने की संभावना बनी रहती है। बंगाल और उड़ीसा में तबाही करने के बाद जब बुलबुल ने बांग्लादेश की ओर रुख किया तो वह कमज़ोर पड़ गया। उड़ीसा और पूर्वी तट पर पिछले कुछ सालों में चक्रवाती तूफानों की मार बढ़ी है। इनकी बढ़ती संख्या के पीछे जलवायु परिवर्तन को एक वजह बताया जाता है। 

ग्लोबल वॉर्मिंग: दक्षिण एशिया में मौसम अधिक खुश्क होगा

एक नये शोध के मुताबिक ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ने के साथ दक्षिण एशिया में अधिक क्षेत्रफल और जनसंख्या खुश्क मौसम की चपेट में आयेंगे। इसकी मार कितनी अधिक होगी यह इस बात पर निर्भर करता है कि धरती का तापमान कितनी जल्दी 1.5 °C, 2 °C या 2.5 °C तक पहुंचता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती के तापमान में 1.5 °C की औसत बढ़ोतरी करीब आधे दक्षिण एशिया में मौसम में खुश्की बढ़ायेगी जिससे 79 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं। इसी तरह 2 डिग्री तापमान बढ़ने पर 89 करोड़ लोगों पर असर पड़ सकता है लेकिन 2.5 डिग्री की बढ़ोतरी तो 196 करोड़ लोगों को प्रभावित करेगी। यह संख्या भले ही दिखने में डरावनी हो लेकिन सच्चाई से दूर नहीं है। शिकागो विश्वविद्यालय में टाटा सेंटर फॉर डेवलपमेंट की एक रिसर्च कहती है कि अगर भारत में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन यूं ही जारी रहा तो साल 2100 के बाद हर साल 15 लाख लोग मरेंगे।

11 हज़ार वैज्ञानिकों ने एक सुर में की “क्लाइमेट इमरजेंसी” घोषित करने की मांग

पहली बार दुनिया के 11,000 वैज्ञानिकों ने एक साथ विश्व की तमाम सरकारों से कड़े क्लाइमेट एक्शन लेने और क्लाइमेट इमरजेंसी घोषित करने की मांग की है। इनमें 69 वैज्ञानिक भारत के हैं। इन साइंसदानों ने बायोसाइंस जर्नल में एक पत्र लिखकर यह मांग की है। यह घोषणा पिछले 40 सालों के शोध पर आधारित आंकड़ों के मद्देनज़र की गई है जिनसे बिजली की बढ़ती खपत के लिये कोयले और गैस जैसे ईंधन को जलाने, जनसंख्या वृद्धि, जंगलों का कटान, ध्रुवों पर बर्फ पिघलना और मरुस्थलीकरण जैसे विषयों का पता चलता है। इस चिट्ठी में बिजली, प्रदूषण , प्रकृति, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के साथ जनसंख्या को लेकर आपात कदम उठाने को कहा गया है।


क्लाइमेट नीति

पल्ला झाड़ने की तैयारी: अमेरिका ने पेरिस समझौते से बाहर निकलने की आधिकारिक और औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। Photo: ClimateAnalytics.org

पेरिस समझौता: दुनिया के 75% देशों के वादे हैं नाकाफी

दुनिया के 184 देशों ने धरती के तापमान को 1.5ºC से कम रखने के लिये जो वादे किये हैं वह क्या वह पर्याप्त हैं। बिल्कुल नहीं। अमेरिका स्थित यूनिवर्सल इकोलॉजिकल फंड के एक नये अध्ययन में पता चला है कि इनमें से करीब 75% देशों ने जो प्रतिज्ञा की है वह जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को कम करने के लिये काफी नहीं है। दुनिया में आधी से अधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन चार देश – चीन (26.8%), अमेरिका (13.1%), भारत (7%) और रूस (4.6%) – मिलकर कर रहे हैं।

भारत और चीन ने अपने बिजली उत्पादन में साफ ऊर्जा को अधिक से अधिक शामिल करने की बात कही है लेकिन सच यह है कि आने वाले दिनों में इन दो देशों के इमीशन बढ़ते ही जाने हैं। इसलिये भारत और चीन के वादे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव रोकने के लिये काफी नहीं हैं। उधर राष्ट्रपति ट्रम्प के रुख के कारण अमेरिका तो जीवाश्म ईंधन को और बढ़ाने की बात कर रहा है। अब  जबकि रूस ने तो अभी तक यह भी नहीं बताया है कि वह पेरिस समझौते के तहत इमीशन कम करने के लिये क्या कदम उठायेगा। अमेरिका ने तो आधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र को सूचित भी कर दिया है कि वह पेरिस समझौते से हट रहा है लेकिन इसके बावजूद अभी क्लाइमेट वार्ता में उसकी सदस्यता फिलहाल बनी रहेगी।

RO पर पाबंदी: NGT ने केंद्र सरकार को लताड़ा

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पर्यावरण मंत्रालय को इस बात के लिये फटकारा है  कि अब तक उन जगहों पर RO सिस्टम के इस्तेमाल पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई गई जहां पानी में कठोरता (TDS) 500 मिलीग्राम/ लीटर से कम है। कोर्ट ने इस बारे में आदेश जारी करने के लिये सरकार को 31 दिसंबर तक का वक्त दिया है। RO सिस्टम से 80% पानी की बर्बादी होती है। NGT ने कहा है कि अगर अधिकारी आदेश नहीं जारी करते हैं तो उनकी तनख्वाह रोक ली जायेगी।

संयुक्त राष्ट्र महासम्मेलन: चिली के पीछे हटने के बाद स्पेन ने संभाली कमान

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का सालाना महासम्मेलन (COP-25 ) अब स्पेन की राजधानी मेड्रिड में होगा। पहले यह सम्मेलन चिली में होना था लेकिन देश के भीतर भड़की हिंसा के बाद चिली ने इसे आयोजित करने में असमर्थतता ज़ाहिर की। स्पेन में दिसंबर 2 से 13 के बीच हो रहे सम्मेलन की अध्यक्षता चिली ही करेगा।

न्यूज़ीलैंड ने 2050 तक “ज़ीरो-नेट इमीशन” के लिये बनाया क़ानून न्यूज़ीलैंड ने 2050 तक देश का नेट कार्बन इमीशन ज़ीरो करने के लिये क़ानून बनाया है। हालांकि यह कानून जानवरों से मीथेन इमीशन को लेकर थोड़ा ढुलमुल बताया जा रहा है। पशुपालन न्यूज़ीलैंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। न्यूज़ीलैंड ने अगले 10 सालों में 100 करोड़ पेड़ लगाने का फैसला किया है और कहा है कि 2035 देश में सारा बिजली उत्पादन साफ ऊर्जा स्रोतों से ही होगा।  यह मिशन एक क्लाइमेट चेंज कमीशन की देखरेख में चलाया जायेगा।


वायु प्रदूषण

साफ हवा की कीमत: अब दिल्ली और महानगरवासियों के लिये मॉस्क जीवन का अभिन्न हिस्सा बनता दिख रहा है। Photo: Hindustan Times

दिल्ली में सांस लेना मुश्किल, AQI पहुंचा 999 पर

दिल्ली में हर साल की तरह इस साल भी जाड़ों की शुरुआत में वायु प्रदूषण आसमानी ऊंचाई पर पहुंच गया। पिछली 3 नवंबर को वायु गुणवत्ता का सूचकांक (AQI) 999 (मिलीग्राम प्रति घनमीटर) को पार कर गया। कई उड़ानें रद्द करनी पड़ी और राजधानी में पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित करनी पड़ी और सड़क पर कारों की संख्या घटाने के लिये ऑड-ईवन स्कीम लागू कर दी गई। हालांकि प्रदूषण के लिये कई कारण ज़िम्मेदार हैं लेकिन तात्कालिक हालात के लिये राजधानी के पड़ोसी राज्यों (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और यूपी) में जलाई जा रही पराली का अहम रोल है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों के साथ दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के अधिकारियों ने वीडियो कांफ्रेंस की लेकिन कुछ खास होता नहीं दिख रहा है। हालांकि वायु प्रदूषण को काबू में करने के लिये 300 टीमें जगह जगह तैनात की गई हैं और सारा ध्यान औद्योगिक इकाइयों पर कड़ी नजर रखने में है।

वायु प्रदूषण: केंद्र और राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

उत्तर भारत में दमघोंटू हवा वाले हालात पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को फटकार सुनाई है। कोर्ट की फटकार तब पड़ी जब अधिकारियों ने वायु प्रदूषण के लिये किसानों को ज़िम्मेदार ठहराया और कहा कि खुंटी (पराली) जलाने से हवा इतनी प्रदूषित हो गई है। “… यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह किसानों के हितों का खयाल रखे।” कोर्ट ने कहा। अदालत ने कहा कि सरकार के पास पराली को लेकर कोई नीति नहीं है। कुछ करने के बजाय वह “शीशमहल” में बैठी और उसने लोगों को “मरने के लिये छोड़ दिया है”। लेकिन यह कहने के साथ अदालत ने “पूरी पुलिस मशीनरी” को काम पर लगाने के लिये भी कहा ताकि पराली जलाने से किसानों को रोका जा सके।

NGT: वायु प्रदूषण एक दिन में नहीं खड़ा हुआ, लगातार अनदेखी का नतीजा

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कहा है कि प्रदूषित हवा की समस्या एक दिन में खड़ी नहीं हुई बल्कि यह केंद्र और राज्य सरकारों की लगातार अनदेखी और उदासीनता के कारण है। NGT ने कहा कि भोपाल गैस त्रासदी एक दिन हुई और वायु प्रदूषण हर रोज़ हो रहा है। पहले कोई समाधान नहीं सोचा गया और अब सरकार “यहां-वहां भाग रही है।” उत्तर भारत में मची त्राहि-त्राहि के बाद NGT  ने दिल्ली सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी और केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों को तलब किया था।  उधर दक्षिण भारत में भी हवा बेहद खराब हो गई जब चेन्नई में 9 नवंबर को वहां PM 2.5 “बहुत खराब” (Very Poor) स्तर पर पहुंच गया। शहर के मनाली इलाके में AQI 358 माइक्रोग्राम/घन मीटर नापा गया।

AQI: महाराष्ट्र ने पहली बार रियल-टाइम डाटा दिये, दिवाली में शोलापुर की हवा सबसे ख़राब

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) ने पहली बार पूरे राज्य में एयर क्वॉलिटी को लेकर रियल टाइम और मैन्युअल डाटा जारी किये। महाराष्ट्र ने 15 महीने पहले एयर क्वॉलिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों का उद्घाटन किया था। जानकार कहते हैं कि अगले साल से MPCB इस बात को पहले ही बता पायेगा कि किन इलाकों में प्रदूषण स्तर अधिक रहने वाला है जिससे वहां पर एहतियाती कदम उठाये जा सकें।   इस साल दिवाली पर जहां मुंबई की एयर क्वॉलिटी 92 पर “संतोषजनक” रिकॉर्ड की गई वहीं शोलापुर सबसे खराब 115 “मॉड्रेट” पर था।


साफ ऊर्जा 

सरहद पर बिजलीघर: केंद्र ने गुजरात सरकार से कच्छ ज़िले में प्रस्तावित सौर और पवन ऊर्जा बिजलीघरों के लिये जल्दी ज़मीन देने को कहा है। Photo: Maui News

केंद्र ने गुजरात से पाकिस्तान सीमा पर प्रोजेक्ट के लिये जल्द ज़मीन देने को कहा

केंद्र ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया है कि कच्छ ज़िले में भारत-पाक सीमा पर प्रस्तावित सौर-पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट के लिये 60,000 हेक्टेयर ज़मीन आबंटन करने की प्रक्रिया को तेज़ किया जाये। सरकार का कहना है कि इस प्रोजक्ट के लिये ज़मीन मिलना कोई समस्या नहीं है। 30,000 MW का यह प्रोजेक्ट गुजरात में 30 GW क्षमता के उन संयंत्रों के अलावा है जो 2022 तक लगाये जाने हैं। आज गुजरात में करीब 10 GW साफ ऊर्जा के प्रोजेक्ट हैं जिसमें 7 GW पवन ऊर्जा है और बाकी सौर ऊर्जा है।

महाराष्ट्र: “एकतरफा” साफ ऊर्जा शुल्क नीति से लोग नाराज़

महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी रेग्युलेटरी कमीशन (MERC) ने सौर ऊर्जा के लिये जो नई ड्राफ्ट शुल्क नीति बनाई है उससे जनता नाराज है। लोगों का कहना है कि यह “एकतरफा” नीति है और रूफटॉप सोलर के ज़रिये घरों में बनने वाली अतिरिक्त बिजली का फायदा उन्हें नहीं मिलेगा। नई ड्राफ्ट पॉलिसी में सौर पैनल लगाने के लिये सारा खर्चा उपभोक्ता को ही करना होगा। इसके बाद भी उपभोक्ता को इलेक्ट्रिसिटी  बोर्ड से  उस कीमत के तीन गुना रेट पर बिजली खरीदनी होगी जितना उसे ग्रिड को भेजने पर मिल रहा है। माना जा रहा है कि इस नीति के लागू होने से लोग छतों पर सोलर पैनल लगाने में रुचि नहीं दिखायेंगे। महाराष्ट्र का रूफ टॉप सोलर लक्ष्य 4 GW (4000 MW) है जबकि अभी वह रूफ टॉप से 266 मेगावॉट बिजली ही बना रहा है।

सितंबर में साफ ऊर्जा का उत्पादन गिरा, ‘सालाना $3000 करोड़ का निवेश चाहिये’

भारत के क्लीन एनर्जी सेक्टर को हर साल $3000 करोड़ के निवेश की ज़रूरत है लेकिन मौजूदा सालाना निवेश $1,100 करोड़ का ही है। यह बाद दिल्ली स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, इन्वायरेंमेंट एंड वॉटर (CEEW) के CEO अरुनभ घोष ने कही है। घोष के मुताबिक बोली लगाने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाये जाने की ज़रूरत है ताकि जो अनुबंध किये जाते हैं उनकी विश्वसनीयता बनी रही। निवेशक उन्हीं प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाते हैं जिनकी रेटिंग ऊंची होती है।

सोलर पम्प लगाने पर केंद्र की 75% सब्सिडी की योजना

केंद्र सरकार की योजना है कि वह सिंचाई के लिये सोलर पम्प का इस्तेमाल करने वाले किसानों को 75% छूट देगी ताकि प्रदूषण फैलने वाले डीज़ल पम्पों का इस्तेमाल खत्म हो सके। सोलर पम्प के इस्तेमाल पर हर रोज़ का खर्च डीज़ल पम्प से कम है जिससे किसानों की खेती पर लागत कम होगी। नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय ने तय किया है कि वह 3 हॉर्स पावर से लेकर 10 हॉर्स पावर तक के पंप पर यह छूट देगी लेकिन इस सब्सिडी का फायदा उन्हीं किसानों को मिलेगा जिनके खेत में तालाब होगा और माइक्रो इरीगेशन तकनीक (कम पानी में सिंचाई के तरीके) का इस्तेमाल करते हों। 

जापान: फुकुशिमा बनेगा सौर और पवन ऊर्जा का केंद्र

पहले भूकंप और फिर परमाणु हादसे से तबाह हुये फुकुशिमा को अब जल्द ही सौर और पवन ऊर्जा के लिये जाना जायेगा। जापान के उत्तर-पूर्वी ज़िले में साफ ऊर्जा के 21 प्लांट लगाये जा रहे हैं जिनमें 11 सोलर एनर्जी और 10 विन्ड पावर के होंगे। करीब 275 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ये प्रोजेक्ट मार्च  2024  तक पूरा होगा। इन संयंत्रों से 600 मेगावॉट बिजली उत्पादन होगा।

भारत और चीन का होगा पवन ऊर्जा में दबदबा: IRENA 

दुनिया में पवन ऊर्जा के मामले में भारत और चीन का दबदबा बना रहेगा और 2050 तक दोनों देशों की सम्मिलित पवन ऊर्जा (विन्ड पावर) पूरी दुनिया की पवन ऊर्जा के आधे से अधिक (2656 GW) होगी। यह भविष्यवाणी इंटरनेशनल रिन्यूवेबल एनर्जी एजेंसी (IRENA) ने की है। चीन 2000 GW  बिजली उत्पादन तक पहुंच जायेगा और सदी के मध्य तक विन्ड पावन के मामले में भारत 300 GW को पार कर लेगा।


बैटरी वाहन 

जर्मनी से मदद: एंजिला मार्कल की भारत यात्रा के दौरान जर्मनी ने बैटरी वाहन मिशन को आगे बढ़ाने के लिये मदद का वादा किया है। Photo: Deutsche Welle

भारत की बैटरी वाहन योजना के लिये जर्मनी ने किया € 100 करोड़ का वादा

जर्मनी शहरी इलाकों में ई-मोबिलिटी (बैटरी वाहन इस्तेमाल) योजना को बढ़ाने के लिये भारत को €100 करोड़ की मदद देगा। जर्मनी ने यह फैसला भारत के साथ क्लाइमेट एक्शन के लिये किये द्विपक्षीय समझौते के तहत किया है। इसके अलावा ग्रिड को बेहतर करने और पावर स्टोरेज बढ़ाने के लिये  €3.5 करोड़ की मदद की बात भी है। माना जा रहा है कि जर्मनी भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस में शामिल होना चाहता है।

अपने देश के भीतर बैटरी वाहनों को रफ्तार देने के लिये जर्मनी ने इस महीने सब्सिडी बढ़ाकर 50% कर दी है जो 2025 तक लागू रहेगी। यह सारे कदम क्लाइमेट प्रोटेक्शन प्रोग्राम 2030 के तहत उठाये गये हैं और उम्मीद है कि जिससे 6.5 लाख से 7 लाख नई बैटरी कारें सड़कों पर उतरेंगी। हालांकि भारत के कार बाज़ार में मंदी देखते हुये बैटरी कार बनाने वाली एक बड़ी कंपनी ने भारत में फिलहाल केवल SUV बनाने का ही फैसला किया है।

महज़ 10 मिनट में हो जायेगी 200 किलोमीटर के लिये बैटरी चार्ज

अमेरिका की पेन्सलवेनिया यूनिवर्सिटी ने लीथियम आयन बैटरियों को चार्ज करने की नई टेक्नोलॉजी विकसित की है जिसे असिमेट्रिक टेम्प्रेचर मॉड्यूलेशन (ATM) कहा जाता है। इससे महज़ 10 मिनट की इतनी चार्ज़िग हो जाती है कि आपकी कार 150-200 किलोमीटर जा सके।

ATM के ज़रिये लम्बे समय से जल्दी बैटरी चार्ज करने की समस्या का समाधान हो गया है  जिसमें काफी खर्च भी होता था। इस टेक्नोलॉजी ने बैटरी के तापमान को कम रखने की दिशा में भी कामयाबी हासिल की है।  यह प्रोग्रेम अमेरिकी ऊर्जा मंत्रालय के अत्यधिक तेज़ गति से चार्ज़िंग टेक्नोलॉजी (XFC) का हिस्सा है।

चीन फिर करेगा बैटरी वाहन सब्सिडी में कटौती

चीन चाहता है कि उसके बैटरी वाहन खुले बाज़ार में परम्परागत वाहनों से भिड़ सकें। इसलिये संभावना है कि सरकार बैटरी वाहन क्षेत्र में दी जाने वाली छूट में और कटौती करेगी। चीन दुनिया में बैटरी कारों का सबसे बड़ा बाज़ार है और उसने इस साल जून में पहली बार बैटरी वाहनों को दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती की थी जिससे इनकी बिक्री में काफी कमी आई। अगर सरकार ने फिर से कटौती का फैसला किया तो इस बाज़ार में मंदी दिखने का डर है जिससे कई बड़ी कंपनियों की बेलेंस शीट बिगड़ सकती है।

बैंगलुरू में नये ईवी प्लांट की तैयारी

बैंगलुरू $1.4 करोड़ का इलैक्ट्रिक मोटर प्लांट लग सकता है। यह प्लांट जापान की मित्सुई एंड कंपनी और ताइवान की TECO इलैक्ट्रिक & मशीनरी का होगा। यह मेक इन इंडिया के तहत विदेशी कंपनियों द्वारा उपक्रम का एक नमूना होगा। उम्मीद है कि 2020 खत्म के अंत तक या प्लांट काम उत्पादन शुरू कर देगा।


जीवाश्म ईंधन

फ्रेकिंग को मनाही: वैज्ञानिक शोध और चेतावनियों के बाद ज़मीन से शेल गैस निकालने वाली कंपनियों पर फ्रेकिंग करने पर रोक लगा दी गई है।Photo: offshore-technology.com

कावेरी डेल्टा पर तेल योजना के लिये पेट्रोलियम मंत्रालय को मद्रास हाइकोर्ट का नोटिस

मद्रास हाइकोर्ट ने केंद्रीय तेल और गैस मंत्रालय को नोटिस देकर कावेरी डेल्टा पर प्रस्तावित हाइड्रोकार्बन और मीथेन गैस निकालने की प्रस्तावित योजना पर जानकारी मांगी है। यह नोटिस एक जनहित याचिका के दायर होने के बाद मंत्रालय को भेजा गया है। इस याचिका में कहा गया था कि तमिलनाडु में कावेरी डेल्ट पर इस योजना से कृषि भूमि काफी घट जायेगी जिससे किसानों की जीविका पर संकट छा जायेगा। धान उत्पादन के कारण इस क्षेत्र को “चावल का कटोरा” कहा जाता है। मंत्रालय को 7 जनवरी 2020 तक जवाब देना है। 

UK में फ्रेकिंग पर लगी पाबंदी

यूनाइटेड किंगडम में फ्रेकिंग पर तत्काल प्रभाव से पाबंदी लगा दी गई है। कई वैज्ञानिक शोध चेतावनी दे चुके हैं कि ज़मीन से शेल गैस निकालने का यह तरीका आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिये बहुत खतरनाक है। फ्रेकिंग के तहत ज़मीन के भीतर पानी, रेत और रसायनों को ऊंचे दबाव में डालकर विस्फोट किये जाते हैं। शेल गैस हासिल करने का यह तरीका शुरू से विवादों में रहा है और सरकार का कहना है कि इस बारे में कोई जानकारी नहीं कि ऐसे विस्फोट किस स्तर के भूकंप ला सकते हैं. पर्यावरण प्रेमियों के लिये यह एक बड़ी जीत है लेकिन UK में फ्रेकिंग तकनीक अपनाने वाले सबसे बड़ी कंपनी क्युआड्रिला को उम्मीद है कि यह पाबंदी जल्दी ही हटा ली जायेगी।

ऑस्ट्रेलिया: बड़ी कोयला खनन कंपनियों के उत्सर्जन हैं एविएशन के तीन-चौथाई  

ऑस्ट्रेलिया की 10 बड़ी खनन कंपनियां सालाना 67 करोड़ CO2  उत्सर्जन कर रही हैं जो दुनिया भर के एविएशन सेक्टर के कार्बन इमीशन का 75% है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इनमें से 10 कंपनियां ही करीब 55 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन कर रही हैं जो ऑस्ट्रेलिया के कुल इमीशन से अधिक है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनियां उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में अधिक कोयला निकाल कर उसे एशिया में बेचना चाहती है। हालांकि ऑस्ट्रेलिया अपने पहले ऑफ शोर विंड फार्म (समुद्र में स्थित पवन चक्कियां) की तैयारी भी कर रहा है।  दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया समुद्र तट पर 2 GW का यह विंड फार्म 2017 तक तैयार हो जायेगा।

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